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अरविन्द घोष स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही एक राष्ट्रवादी पत्रकार भी थे – अजय मित्तल जी

मेरठ (विसंकें). अजय मित्तल जी ने कहा कि अरविन्द घोष न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी वरन् एक कुशल राष्ट्रवादी पत्रकार भी थे. अरविन्द घोष ने राष्ट्रवाद की भावना के कारण ही आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा को त्याग दिया था. वन्देमातरम् और युगान्तर जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल किया. उस समय स्वदेशी को लोगों के बीच एक हथियार के रूप में  प्रयोग  करने का महत्व  समझाते हुए शान्तिपूर्ण असहयोग और मौन को भी लोगों के बीच स्थापित करने का प्रयास किया. बंगाल विभाजन के समय उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से शान्तिपूर्ण प्रतिरोध करते हुए सात लेख लिखे, जो जनमानस के बीच अत्यंत प्रभावकारी थे.

पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग एवं विश्व संवाद केन्द्र, मेरठ द्वारा आयोजित अरविन्द घोष की लेखनी और पत्रकारिता विषयक संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में अजय मित्तल जी ने संबोधित किया. उन्होंने कहा कि उनकी दूरदृष्टि एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण इतना स्पष्ट था कि 1929 में ही कहा था – अब वैश्विक परिस्थिति ऐसी बनेगी कि भारत को स्वाधीन होने से कोई नहीं रोक सकता. अरविन्द घोष एवं स्वामी विवेकानंद दो ऐसे योगी पुरूष रहे हैं जो एक ही कालखण्ड के थे.

इस अवसर पर विभाग के समन्वयक डॉ. मनोज कुमार श्रीवास्तव ने अरविन्द घोष की असहयोग और मौन स्वीकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अरविन्द घोष ने कहा था – स्वयं सेवा और शान्तिपूर्ण प्रतिरोध हमारे दो तरीके हैं. शांतिपूर्ण प्रतिरोध की नीति सहयोग की भावना का विरोध करती है. कार्यक्रम अध्यक्ष आनंद प्रकाश अग्रवाल जी ने भी विचार व्यक्त किये. कार्यक्रम का संचालन विभाग की छात्रा तान्या गर्ग ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रशांत कुमार ने किया.

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