एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों में हों यथा शीघ्र वांछित सुधार – अतुल कोठारी जी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की पाठ्यपुस्तकों में आवश्यक सुधार के लिए भेजे गए सुझावों पर कांस्टीट्यूशन क्लब में संवाद एवं चर्चा नई दिल्ली. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की पाठ्यपुस्तकों में आवश्यक सुधार के लिए भेजे गए सुझावों पर कांस्टीट्यूशन क्लब में संवाद एवं चर्चा Rating: 0
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एन.सी.ई.आर.टी की पुस्तकों में हों यथा शीघ्र वांछित सुधार – अतुल कोठारी जी

नई दिल्ली. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की पाठ्यपुस्तकों में आवश्यक सुधार के लिए भेजे गए सुझावों पर कांस्टीट्यूशन क्लब में संवाद एवं चर्चा की गई. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी) द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में सुधार हेतु देशभर से सुझाव मांगे गए थे. इस विषय पर पत्रकारों एवं विद्वानों के साथ संवाद का यह कार्यक्रम आयोजित किया गया. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी जी द्वारा एन.सी.ई.आर.टी की कक्षा 6 से कक्षा 12 की पुस्तकों में व्याप्त त्रुटियों पर प्रतिवेदन सौंपा गया. अतुल कोठारी जी ने बताया कि यह प्रतिवेदन न्यास द्वारा कई विद्वानों व विशेषज्ञों से चर्चा के बाद बनाया गया है. प्रतिवेदन में न्यास ने एन.सी.ई.आर.टी की हिंदी, इतिहास एवं राजनीतिक विज्ञान की पुस्तकों में व्याप्त त्रुटियों एवं विसंगतियों पर ध्यान केन्द्रित किया है. इसी सन्दर्भ में न्यास द्वारा दिए गए प्रतिवेदन का उल्लेख करते हुए कुछ समाचार पत्रों, जिनमें इंडियन एक्सप्रेस विशेष रूप से शामिल है, ने गलत जानकारी छापकर विषय से ध्यान भटकाने का प्रयास किया है. इन समाचार पत्रों में यह छापा गया कि न्यास ने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की रचना को अंग्रेजी भाषा की कक्षा 10वीं से हटाने की मांग की है, जो कि वस्तुतः झूठी एवं मनगढ़ंत सूचना है. वास्तविकता यह है कि न्यास द्वारा एन.सी.ई.आर.टी को दिए गए अपने सुझाव पत्र में कहीं भी इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं किया गया है. ऐसी भ्रामक सूचना के प्रसार हेतु शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र को कानूनी नोटिस भेजा जाएगा.

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार इन समाचार पत्रों ने समुदाय विशेष/भाषा विशेष के शायरों/कवियों की रचनाओं को हटाने संबंधी न्यास के सुझाव को मनमाने ढंग से व्याख्या कर प्रस्तुत किया है. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने किसी विशेष समुदाय या भाषा के लेखकों/कवियों/रचनाकारों पर आपत्ति जाहिर नहीं की है. न्यास ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् से यह अनुरोध किया है कि भाषा के विषय की पुस्तकों को तैयार करते समय देश के संविधान में दिए गए तथा समय-समय पर राष्ट्रपति महोदय, देश की संसद एवं राजभाषा विभाग द्वारा जारी किये आदेशों का पूर्ण रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए. न्यास द्वारा हमेशा यही सुझाव रहा है कि भाषा की किताबों में उसी भाषा के शब्दों का प्रयोग हो एवं अन्य भाषा के शब्दों के प्रयोग से बचा जाए. हिंदी भाषा की किताबों में उर्दू, फ़ारसी तथा अंग्रेजी भाषा के अनेक शब्दों का उपयोग किया गया है, जो अनुचित और देश के नियमों/कानूनों का उल्लंघन है, यहाँ तक कि घोर असंवैधानिक शब्दों का भी प्रयोग किया गया है. उदाहरणार्थ – अन्तर (पृष्ठ 40) “चमार” तथा आरोह (पृष्ठ 16) में “भंगियों” शब्दों का प्रयोग है. भाषा की दृष्टि से ज़रदार, ख़ुतबाख्वां, बरकल, शोख, स्टैंज़ा, लैंडस्केप, करंट आदि शब्दों का हिंदी भाषा की विभिन्न पुस्तकों में प्रयोग किया गया है. वहीं अंग्रेजी या उर्दू की किसी पुस्तक में हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषा के शब्दों के इतनी अधिक मात्रा में प्रयोग के उदाहरण नहीं मिलते.

राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा, 2005 (नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क, 2005) के क्रियान्वयन स्वरूप एन.सी.ई.आर.टी द्वारा प्रकाशित इतिहास एवं राजनीतिक विज्ञान की पुस्तकों की पाठ्यसामग्री शिक्षण के उद्देश्यों से दूर हो चली है. यथा इतिहास की पुस्तकों में न केवल तथ्यात्मक त्रुटियां हैं, वरन् अनेकों प्रेरणादायी व्यक्तित्वों को भुला दिया गया है और कुच्छेक ही व्यक्तियों का महिमामंडन किया गया है. न्यास का मानना है कि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद, आचार्य विनोबा भावे, महर्षि कर्वे, महर्षि अरबिंद जैसे प्रेरणादायी विभूतियों के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को विस्तार से पढ़ाया जाना चाहिए. इतिहास की पुस्तकों में कई मनमानी अपुष्ट व्याख्याएं समाहित हैं जो वस्तुतः छात्रों में गलत दृष्टिकोण का निर्माण करती हैं. यथा सभी मुग़ल बादशाह, विशेषकर औरंगज़ेब को मंदिर निर्माण करने वाला व मंदिरों को दान देने वाला उदार शासक (कक्षा 12 पृष्ठ 149 एवं 234) और थॉमस मैकाले को उदारवादी औपनिवेशिक अफसर दिखाया गया है (कक्षा 10 पृष्ठ 175). जबकि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को जनता के दबाव में 1857 के संग्राम का नेतृत्व स्वीकार करने वाला शासक बताया गया है (कक्षा 12 पृष्ठ 292). वीर योद्धा शिवाजी का वर्णन मात्र दो वाक्यों में समेट दिया गया है (कक्षा 7 पृष्ठ 51). बहुत चिंताजनक है कि शिमला समझौता (2 जुलाई 1972) की तिथि तक कक्षा 12 की राजनीतिक विज्ञान की पुस्तक “स्वतंत्र भारत में राजनीति” में गलत दी गयी है (3 जुलाई 1972 – पृष्ठ 76). इन गंभीर परिस्थितियों में यह अति आवश्यक है कि इन पुस्तकों में यथा शीघ्र वांछित सुधार होने चाहिए, ताकि देश की भावी पीढ़ी को सही शिक्षण मिल सके एवं वे आत्मगौरव से परिपूर्ण विवेकशील भारतीय बन सके. न्यास इस हेतु कृतसंकल्प है.

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