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गौमाता कृषि और किसान के आर्थिक विकास का आधार –  सुरेश भय्याजी जोशी

प्रथम तथा द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का पुणे में समापन

पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि गौरक्षा केवल आस्था का विषय नहीं है. गौमाता इस देश में कृषि और किसान के आर्थिक विकास का आधार है. यह किसी संप्रदाय विशेष के विरोध में नहीं है. सरकार्यवाह जी पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग तथा पश्चिम क्षेत्र के द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के संयुक्त समारोप कार्यक्रम (03 जून) में संबोधित कर रहे थे. मराठी पत्रिका ‘अंतर्नाद’ के संपादक भानू काले कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे. पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत के संघचालक सुरेश (नाना) जाधव जी, द्वितीय वर्ष के सर्वाधिकारी अविनाश बडगे जी, प्रथम वर्ष के सर्वाधिकारी विलास चौथाई जी मंच पर उपस्थित थे.

भय्याजी जोशी ने कहा कि गौहत्या पर भी राजनीति की जा रही है, यह दुर्भाग्य की बात है. गौ केवल आस्था का विषय नहीं है. गाय हमारे विकास का मजबूत पक्ष रही है. गौरक्षा किसी संप्रदाय विशेष के विरोध में है, यह कहना असली मुद्दे से दिग्भ्रमित करना है. इस तरह संघर्ष निर्माण करना मेरी दृष्टि में सामाजिक पाप है. हिन्दुत्व का चिंतन किसी भूमि अथवा जाति का चिंतन नहीं है, यह पूरी मानवता का चिंतन है. संघ की शक्ति यानि हिन्दुत्व की शक्ति बढ़ रही है. संघ विचार के समर्थन में लोग खुलकर सामने आ रहे हैं. प्रचलित पद्धतियों से हटकर संघ ने अपनी पहचान बनाई है. प्राचीन विचारों को आधार बनाकर संघ चलता है. संघ का कार्य कार्यकर्ताओं के आधार पर है, प्रचार-प्रसार के आधार पर नहीं है. कार्यकर्ताओं को सिद्ध करना इस कार्यपद्धति की विशेषता है. इस देश के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का निर्माण करना संघ का कार्य है.

संघ हिन्दुओं के लिए क्यों काम करता है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए सरकार्यवाह जी ने कहा कि सारी विषमताओं से मुक्त समाज बनाना आज हिन्दू समाज की आवश्यकता है. दोष हिन्दू समाज में है, इसलिए उसे निर्दोष बनाने के प्रयास कई महापुरुषों ने किए. इसलिए संघ ने अपना कार्यक्षेत्र हिन्दू समाज ही माना है. इतिहास दर्शाता है कि जब-जब इस देश का उत्थान हुआ, उस समय हिन्दू समाज जागृत था. जब हिन्दू समाज निद्राग्रस्त हुआ, तब देश का पतन हुआ. उन्होंने कहा संघ मानता है कि राष्ट्र के उत्थान और पतन का कारण हिन्दू समाज है. आज कल हिन्दुत्व पर बोलना संकुचित माना जाता है. पर, क्या वसुधैव कुटुंबकम का विचार विश्व को देने वाले हिन्दुत्व को संकुचित कहना, उदारवाद कहा जा सकता है.

उन्होंने कहा कि समाज में अशांति फैले और संघर्ष हो, ऐसी शक्तियां आज विद्यमान हैं. ऐसे प्रयासों को कभी-कभी सफलता मिलती हुई भी दिखाई देती है. दो व्यक्तियों का संघर्ष न होकर उसे दो जातियों के संघर्ष का रूप दिया जाता है. लेकिन सामाजिक समस्याओं का निराकरण सरकार से होना असंभव है. कोई भी सरकार यह काम नहीं कर सकती. इसके लिए सामाजिक संस्थाओं को ही पहल करनी होगी. ऐसी स्थिति में सामाजिक संस्थाओं का उत्तरदायित्व बढ़ता है.

भानू काले जी ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी प्रकार की संस्था अथवा विचारधारा से अस्पृश्यता में विश्वास नहीं करते. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी कार्यक्रम में, मैं पहली बार सम्मिलित हुआ हूं. यहां के अनुशासन को देखकर प्रभावित हूं. इस वर्ग के दौरान युवा मोबाइल से दूर रहते है, यह मेरे लिए अचरज की बात है. मैं संघ का अभिनंदन करता हूं.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रनिर्माण के लिए कोई एक भाषा होना आवश्यक है. आज जब विभिन्न प्रांतों के लोग एकत्र आते हैं, तब हमें अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है. लेकिन हमें हिन्दी को बढ़ावा देना होगा. कुछ लोग मानते है कि राष्ट्र की अवधारणा दकियानूसी है, जिसकी आज कोई सार्थकता नहीं. लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता, राष्ट्र की अवधारणा का कोई विकल्प नहीं है. किसी भी सेवा के लिए समर्पण चाहिए और समर्पण के लिए अधिष्ठान चाहिए. राष्ट्र से बढ़कर कोई और अधिष्ठान नहीं होता. राष्ट्र हमारी अस्मिता है और अस्मिता न हो तो हम मानवता के सागर में खो जाएंगे. अस्मिता के लिए राष्ट्र की अवधारणा का जतन करना आवश्यक है.

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