गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने का निश्चय Reviewed by Momizat on . पुणे में राष्ट्रीय गौ सेवा परिषद संपन्न पुणे (विसंकें). देश में हर एक खेत तक गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश पहुंचाने का निश्चय कर पुणे में आयोजित पहले राष्ट्रीय पुणे में राष्ट्रीय गौ सेवा परिषद संपन्न पुणे (विसंकें). देश में हर एक खेत तक गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश पहुंचाने का निश्चय कर पुणे में आयोजित पहले राष्ट्रीय Rating: 0
You Are Here: Home » गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने का निश्चय

गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश गांव-गांव तक पहुंचाने का निश्चय

पुणे में राष्ट्रीय गौ सेवा परिषद संपन्न

पुणे (विसंकें). देश में हर एक खेत तक गौ आधारित जैविक कृषि का संदेश पहुंचाने का निश्चय कर पुणे में आयोजित पहले राष्ट्रीय गौ-सेवा परिषद का रविवार को ‘गौ माता की जय’ के नारे के साथ समापन हुआ. पुणे में बिबवेवाडी स्थित ‘यश लॉन्स’ में आयोजित परिषद में एक हजार प्रतिनिधि उपस्थित थे. परिषद के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष पुणे जिले के पालक मंत्री गिरीश जी बापट थे. देश में गौ सेवा आंदोलन को मूर्त रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी हुकुमचंद जी सावला भी उपस्थित थे. अगले एक वर्ष में महाराष्ट्र में ‘जहां गांव वहां बड़ी गौशाला और जहां घर वहां गाय’ का संकल्प किया गया.

इसमें केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम जी रुपाला ने कहा कि रासायनिक खाद के खर्च के 10वें हिस्से में उससे भी अधिक प्रभावी उत्पादन देने वाली कृषि की जा सकती है, यह परिषद देश के कृषि इतिहास में नया युग शुरू कर रही है. दूसरे दिन परिषद में उपस्थित राज्य के पशुपालन मंत्री महादेव जानकर जी ने कहा कि इस योजना को सहयोग देने हेतु सरकार कहीं भी पीछे नहीं रहेगी. परिषद का समापन सांसद अनिल जी शिरोले ने किया.

देसी गाय के 10 किलो गोबर में एक एकड़ खेती – विषय स्वाभाविक ही परिषद में उपस्थित प्रतिनिधियों की उत्सुकता का विषय रहा. इस विषय में पिछले पांच वर्षों में व्यापक प्रयोग करने वालों ने गो-जैविक कृषि के सत्र में बताया कि किसान मित्रों, यह विषय केवल संगोष्ठी में सुनने का नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देखने और साथ-साथ अपने खेतों में करने का है. पिछले पांच वर्षों में हमने 10-15 किसानों के 1200 गुट स्थापन कर ऐसी खेती की है. इसलिए  रासायनिक खाद की तुलना में एक-दहाई खर्चा आता है. इतना ही नहीं, बल्कि वह कृषि माल हमने राज्य में साप्ताहिक बाजार में बेचने की योजना भी बनाई.

शोधकार्य विषय पर संगोष्ठी में गोमूत्र पर कई अमेरिकन पेंटट प्राप्त करने वाले देवलापार स्थित गौशाला के  सुनिल मानसिंगका जी ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में गोमूत्र के जो चिकित्सकीय लाभ स्पष्ट हुए हैं, वे जनता और रोगियों को जानने चाहिए. लेकिन साथ ही देश के वैद्य और डॉक्टरों को भी जानने चाहिए. गोमूत्र की मदद से कैंसर जैसी बीमारियां भी काबू में लाई जा रही है. दूसरी तरफ एक बात की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है कि लोगों में कैंसर जैसे रोग का फैलाव बढ़ रहा है. कोल्हापुर जिले में शिरोण तहसील में एक सरकारी सर्वेक्षण में पाया गया कि 18 हजार लोग कैंसर से पीड़ित हैं. यह आंकड़ा इतना  भयानक है, कि अन्य जिलों या तहसीलों में ऐसे सर्वेक्षण करने से भी डर लग रहा है. यह शायद पिछले 50-60 वर्षों में रासायनिक खाद की कृषि से उपजे अन्न-पदार्थों का परिणाम होगा. हम अगर इन सारे विषयों की ओर गौ – जैविक अध्ययन की नज़र से देखें, तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस चुनौती का सामना करने में गौ – जैविक पंचगव्य चिकित्सा समर्थ हैं.

देश में पाठ्यक्रमों में गाय विषय का समावेश करना चाहिए, गौशाला को अनुदान मिलने की शर्तें शिथिल करनी चाहिए. गौ हत्या पाबंदी पर कानून और सख्त होना चाहिए. इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार मोरेश्वर जोशी जी द्वारा लिखित ‘गोवंश – एक शाश्वत वरदान’ पुस्तक का विमोचन किया गया.

About The Author

Number of Entries : 3788

Leave a Comment

Scroll to top