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घुमंतु लोगों के साहित्य में भारतीय मिट्टी की सुगंध – गिरीश प्रभुणे जी

महाराष्ट्र में दो दिवसीय समरसता साहित्य सम्मेलन संपन्न

पुणे (विसंकें). समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर समरसतापूर्ण जीवन, सबके प्रति आत्मीयता रखने वाला जीवन समाज में फिर से दिखाई दे, इस उद्देश्य के साथ सामाजिक समरसता मंच पिछले तीन दशकों से कार्यरत है. इसी दिशा में प्रयास के रूप में समरसता साहित्य परिषद की ओर से समाज के वंचित घटकों पर लेखन करने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मेलन सन् 1998 से आयोजित किया जा रहा है. इस वर्ष का सम्मेलन महाराष्ट्र में स्व. भीमराव गस्ती साहित्यनगरी (राणीवकर पाठशाला) में संपन्न हुआ. साहित्य सम्मेलन का 18वां आयोजन था और ‘घुमंतु लोगों का साहित्य और समरसता’ विषय पर विचार विमर्श हुआ.

दो दिवसीय सम्मेलन में संगोष्ठियों के आयोजन के साथ ही शोधपत्र पढ़े गए. 09 दिसंबर को ग्रंथ दिंडी से पुस्तकों की पालकी यात्रा के साथ सम्मेलन का आरंभ हुआ. उद्घाटन सत्र में घुमंतु जाति-जनजातियों में लंबे समय से कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता गिरीश प्रभुणे जी ने अध्यक्षता की. शिर्डी संस्थान के अध्यक्ष एवं उद्यमी डॉ. सुरेश हावरे जी, सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष अशोक गांधी जी, समरसता साहित्य परिषद की अध्यक्षा डॉ. श्यामा घोणसे जी, ‘ज्ञानप्रबोधिनी’ के यशवंतराव लेले जी तथा अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित थे.

गिरीश प्रभुणे जी ने कहा कि “घुमंतु लोगों में काम करना शुरू किया, तब मुझे कुछ भी पता नहीं था. धीरे-धीरे सीखता गया और एक-एक प्रसंग से उनका जीवन समझता गया. तब ध्यान में आया कि इन लोगों का कोई देश ही नहीं है. कभी-कभी लगता था कि क्या यही जीवन है? लेकिन फिर पता चला कि घुमंतु लोगों के जीवन में ही भारत का इतिहास है.” “घुमंतु लोगों के पास आज भी अपार मौखिक साहित्य है, लेकिन प्रत्येक जाति-जनजाति का इतिहास दम तोड़ रहा है. किसानों और घुमंतु लोगों का रिश्ता मौखिक साहित्य से दिखाई देता है. जितने भी श्रमिक लोग थे, उन सबने सर्वोत्तम साहित्य का सृजन किया. पूरे भारत के घुमंतु लोगों के जीवन से समृद्धता का दर्शन होता है. इसी समृद्धता से अजंता और एलोरा जैसी कलाकृतियां बनीं. साहित्य एवं कला यही लोग जीते हैं और उनको देखने के बाद प्रश्न उठता है कि क्या उन्हें वंचित कहा जाए.” उन्होंने कहा कि ये समाज के वंचित घटक नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान व कला पूरे विश्व में फैलाने वाले साधन हैं. उनके पास अपार कौशल है, जिनका उपयोग करने हेतु उन्हें शिक्षा दी जानी चाहिए.

रमेश पतंगे जी ने कहा कि समरसता का आज कई स्थानों पर अध्ययन हो रहा है. यह हमारी विचारधारा का विजय है.

समरसता साहित्य सम्मेलन का समापन 10 दिसंबर को हुआ. सम्मेलन के समापन अवसर पर गिरीश जी ने कहा कि घुमंतु विमुक्त लोगों में से कुछ ने अपनी व्यथा साहित्य के द्वारा सामने रखी है. लेकिन घुमंतु समुदाय ने हाल ही में लिखना शुरू किया है. मुख्य धारा में उसे अभी भी स्थान नहीं है. अभी भी गांव की सीमा से बाहर हैं. अभी भी कई जातियों को लिखने की आवश्यकता है.

समरसता मंच की ओर से सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले कार्यकर्ता को प्रति वर्ष संत गाडगे बाबा पुरस्कार प्रदान किया जाता है. इस वर्ष यह पुरस्कार मुंबई में बेसहारा और अनाथ बच्चों के पुनर्वास का काम करने वाले ‘समतोल फाऊंडेशन’ के विजय जाधव को दिया गया. समरसता साहित्य परिषद की ओर से पहला स्व. भीमराव गस्ती साहित्य पुरस्कार पुणे स्थित लेखक डॉ. श्रीधर कसबेकर को उनकी पुस्तक ‘माझी माय’ के लिए दिया गया. साथ ही हनुमंत शंकर लोखंडे द्वारा लिखित ‘वैदू समाज व त्यांची जीवनशैली’ पुस्तक का विमोचन भी कार्यक्रम में किया गया.

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