जब हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ सुनाया था निर्णय Reviewed by Momizat on . सारी परिस्थितियों के बीच 23 मई 1975 को सुनवाई पूरी होने पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुरक्षित रख लिया. आखिरकार फैसले का दिन (12 जून 1975) आया. जस्टिस सि सारी परिस्थितियों के बीच 23 मई 1975 को सुनवाई पूरी होने पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुरक्षित रख लिया. आखिरकार फैसले का दिन (12 जून 1975) आया. जस्टिस सि Rating: 0
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जब हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ सुनाया था निर्णय

सारी परिस्थितियों के बीच 23 मई 1975 को सुनवाई पूरी होने पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुरक्षित रख लिया. आखिरकार फैसले का दिन (12 जून 1975) आया. जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया और 06 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया. यही फैसला देश में आपातकाल का केंद्र बिंदु बना.

“जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कोर्ट में आएं, तब कोई भी सुरक्षाकर्मी चाहे वह सुरक्षा के लिए ही तैनात क्यों न हो, उपस्थित नहीं होना चाहिए. कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री का खड़े होकर स्वागत नहीं करेगा.” – जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा

स्वतंत्र भारत के इतिहास में जस्टिस जगमोहन सिन्हा के आदेश पर ही 18 मार्च 1975 को  किसी प्रधानमंत्री को अदालत में हाजिर होना पड़ा था.

जब भारत की राजनीति की धुरी दो लोगों के बीच घूम रही थी. एक तरफ देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं तो दूसरी ओर लोक नायक जयप्रकाश नारायण. लेकिन धीरे धीरे इस कहानी में कोर्ट कचहरी का दखल बढ़ने लगा. सन् 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी 01 लाख से ज्यादा वोटों से जीतीं. इस जीत के बाद इंदिरा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले सोशलिस्ट पार्टी के राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा दर्ज करा दिया. राज नारायण के वकील थे – शांति भूषण.

शांति भूषण का कहना था कि इंदिरा ने अपना चुनाव जीतने के लिए गैरकानूनी तरीकों का इस्तेमाल किया था. यशपाल कपूर इंदिरा गांधी के सचिव थे, उन्होंने इस्तीफ़ा देने से पहले ही इंदिरा गांधी के लिए काम करना शुरू कर दिया था. नियम के मुताबिक कोई गजटेड ऑफिसर किसी प्रत्याशी के पक्ष में काम नहीं करेगा. जगमोहन लाल सिन्हा इसी मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिन्हें काफी सख्त जज माना जाता था. सवाल था कि क्या वे प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई फैसला ले सकेंगे?

इंदिरा गांधी को लगभग पांच घंटे तक अदालत में सवालों का सामना करना पड़ा था. इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों को यह लगने लगा था कि फैसला इंदिरा के खिलाफ जा सकता है. ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट में तत्कालीन चीफ जस्टिस, जस्टिस सिन्हा के घर पहुंचे. सिन्हा से कहा, – देखिए, मैं आप से एक बात करने आया हूं. सुप्रीम कोर्ट में जज के लिए आप के नाम पर विचार किया जा रहा है. आप जैसे ही राज नारायण वाले मामले में फैसला सुना देंगे, आप की नियुक्ति की घोषणा कर दी जाएगी. स्पष्ट है – कांग्रेस की ओर से जस्टिस सिन्हा को लालच दिया जा रहा था.

सारी परिस्थितियों के बीच 23 मई 1975 को सुनवाई पूरी होने पर जस्टिस सिन्हा ने फैसला सुरक्षित रख लिया. आखिरकार 12 जून 1975 का दिन आया. जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा के खिलाफ फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया और 06 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया. यही फैसला देश में आपातकाल का केंद्र बिंदु बना.

किसी को उम्मीद नहीं थी कि कोई हाईकोर्ट का जज प्रधानमंत्री के खिलाफ फैसला कर सकता है. कांग्रेस पार्टी में खलबली मची हुई थी. बैठकों का दौर जारी था. संजय गांधी का कहना था इंदिरा को इस्तीफ़ा न देकर, इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाया जाए और हुआ भी वही. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

सुप्रीम कोर्ट के जज वी.आर. कृष्ण अय्यर ने आपातकाल से एक दिन पहले 24 जून को फैसला सुनाते हुए कहा कि इंदिरा को वोट करने का अधिकार नहीं होगा. सांसदों को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी, लेकिन वे प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं. 25 जून को जब दिल्ली के रामलीला मैदान में 05 लाख से ज्यादा लोग जुटे और जयप्रकाश नारायण ने कहा कि “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”. इस नारे ने इंदिरा सरकार की चूले हिला दीं और अपना भारी विरोध देखते हुए आखिरकार इंदिरा ने देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया.

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