जम्मू कश्मीर के संविधान में ‘पंथनिरपेक्ष और समाजवाद’ जोड़ने की मांग Reviewed by Momizat on . आजादी के 64 वर्ष बाद भी जम्मू कश्मीर राज्य 'पंथनिरपेक्ष' नहीं है, क्योंकि इस राज्य के संविधान की प्रस्तावना से 'पंथनिरपेक्ष और समाजवाद' शब्द लुप्त हैं. पैंथर्स आजादी के 64 वर्ष बाद भी जम्मू कश्मीर राज्य 'पंथनिरपेक्ष' नहीं है, क्योंकि इस राज्य के संविधान की प्रस्तावना से 'पंथनिरपेक्ष और समाजवाद' शब्द लुप्त हैं. पैंथर्स Rating: 0
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जम्मू कश्मीर के संविधान में ‘पंथनिरपेक्ष और समाजवाद’ जोड़ने की मांग

आजादी के 64 वर्ष बाद भी जम्मू कश्मीर राज्य ‘पंथनिरपेक्ष’ नहीं है, क्योंकि इस राज्य के संविधान की प्रस्तावना से ‘पंथनिरपेक्ष और समाजवाद’ शब्द लुप्त हैं. पैंथर्स पार्टी के विधायक हर्षदेव सिंह ने एक बार पुन: विधानसभा में प्रस्ताव रखते हुये इन दो शब्दों को जम्मू कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने की मांग की है.

विशेष दर्जा प्राप्त राज्य होने के कारण जम्मू कश्मीर का अपना संविधान है. विधायक हर्षदेव सिंह ने पहले भी दो बार विधानसभा में ऐसा प्रस्ताव रखा लेकिन आज तक भी राज्य के संविधान में इन दो शब्दों को नहीं जोड़ा गया है.

हर्षदेव सिंह का कहना है कि 1957 के जम्मू कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ही ली गई है लेकिन ‘पंथनिरपेक्षता और समाजवाद’ जो दो मूल अवधारणायें हैं, वे इसमें शामिल ही नहीं हैं. हमारा राज्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति देश के संविधान की तरह राज्य के संविधान में भी होनी चाहिये, नहीं तो बाहर की दुनिया में गलत संदेश जायेगा. ऐसा ही प्रस्ताव 2011 में भी विधानसभा में रखा गया, लेकिन इसे चर्चा में शामिल नहीं किया गया. विधायक हर्षदेव सिंह सरकार की नीयत पर शंका है और प्रश्न करते हैं कि यह क्यों नहीं किया गया. इसी प्रकार देश के संविधान में निहित एकता और समरसता शब्दों को भी जम्मू कश्मीर के संविधान में जोड़ा जाना चाहिये.

 

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