ज्ञान का चरम हैं नारद – नारद जयंती (20 मई) पर विशेष Reviewed by Momizat on . ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयन्ती होती है, जो इस बार 20 मई को है. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवादी लोग इस दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं. नारद सृ ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयन्ती होती है, जो इस बार 20 मई को है. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवादी लोग इस दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं. नारद सृ Rating: 0
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ज्ञान का चरम हैं नारद – नारद जयंती (20 मई) पर विशेष

imagesज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया को नारद जयन्ती होती है, जो इस बार 20 मई को है. पिछले कई वर्षों से राष्ट्रवादी लोग इस दिन को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते हैं. नारद सृष्टि के पहले संवाददाता माने जाते हैं. हिन्दी फिल्मों और सेकुलर विमर्शकारों द्वारा उन्हें नकारात्मक चरित्र और लोगों के बीच में मनमुटाव और लड़ाई करने वाले के रूप में चित्रित किया जाता है. इसलिए कई बार ऐसे ही लोग नारद जयन्ती के आयोजनों पर अपनी भौहें तानते हैं. जबकि वास्तविक तथ्य यह है कि नारद एक दार्शनिक, कानून जानने वाले और एक कुशल सम्प्रेषक हैं. इसीलिए शायद सत्य और धर्म की विजय के प्रतीक नारद को भारत के पहले हिन्दी समाचार पत्र ‘_उदन्तमार्तण्ड’ ने अपने मुखपृष्ठ पर छापा और इसका लोकार्पण नारद जयन्ती के दिन ही किया. नारद आज भी प्रासांगिक हैं, न केवल अपने सार्थक सम्प्रेषण के लिए, बल्कि कुशल शासन और आम व्यक्ति के साथ बंधुत्व भाव के लिए. सीधा अर्थ यह है कि एक व्यक्ति, जो ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंच जाए, वही नारद है. नारद की उपस्थिति दो इतिहास ग्रंथों के निर्माण में प्रत्यक्षत: दिखाई पड़ती है. रामायण तभी लिखी गई, जब नारद राम कथा लिखने के लिए एक परिपूर्ण व्यक्ति की खोज में निकले थे और वाल्मीकि को तमसा नदी के किनारे उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम का चरित्र चित्रित कर रामायण लिखने की प्रेरणा दी. नारद ने वाल्मीकि को कथा पर ध्यान केन्द्रित कर एकाग्र होने का वातावरण उपलब्ध कराया.

महाभारत में भी धर्म का सारा मर्म कहीं न कहीं नारद की पद्धति को उद्घाटित करता है. नारद महाराज युधिष्ठिर की राजसभा में उपस्थित हुए थे और उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर को पुरुषार्थ चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का पूर्ण ज्ञान प्रदान किया था. भारतीय परम्परागत साहित्य में भी कहीं न कहीं किसी अध्याय में नारद द्वारा प्रतिपादित स्वधर्म, तंत्र, विधान, राजस्व प्राप्ति, शिक्षा, उद्योग इत्यादि पर उनके दर्शन का प्रभाव पाते हैं. नारद विशेष रूप से सुराज पर भी युधिष्ठिर से मंत्रणा करते हुए भी दिखाई पड़ते हैं. वे धर्मराज से पूछते हैं कि क्या तुम धर्म के साथ अर्थ-चिन्तन पर भी विचार करते हो? सामाजिक विकास और कृषि की स्थिति क्या है? क्या तुम्हारे साम्राज्य में सभी किसान समृद्ध और सन्तुष्ट हैं? क्या तुमने अभावग्रस्त किसानों के लिए ऋण सुविधा उपलब्ध कराई है? नारद प्रशासनिक ढांचे पर भी ध्यान आकर्षित करते हैं. वे मंत्रियों और अधिकारियों के चयन की प्रकृति, उनके चरित्र और सामाजिक प्रतिबद्धता के आवश्यक मानकों पर भी चर्चा करते हैं. नारद नागरिकों के रहन-सहन के जीवन स्तर, उनकी भावनाओं और पारिवारिक दायित्वों के विषय को भी उठाते हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि नारद हमेशा धर्म के प्रचार और नागरिकों के कल्याण के लिए तत्पर दिखाई देते हैं. महाभारत के आदि पर्व में नारद के पूर्ण चरित्र को वेदव्यास ने इस श्लोक में व्यक्त किया है –

अर्थनिर्वाचने नित्यं, संशयचिदा समस्या:.

प्रकृत्याधर्मा कुशलो, नानाधर्मा विशारदा:.

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि नारद एक महान विचारक और ‘नारद स्मृति’, ‘नारद भक्ति स्तोत्र’ आदि की रचना करने वाले ग्रंथकार हैं. नारद तीनों लोकों में भ्रमण करने वाले, संवाद करने वाले और सारे विवादों को मिटाने वाले संन्यासी हैं. हम सबको नारद के इस विराट स्वरूप को ही स्वीकार करना चाहिए.

जे. नन्द कुमार

(लेखक प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक एवं केरल से प्रकाशित मलयाली पत्रिका केसरी के पूर्व संपादक हैं।)

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