धर्म के वास्तविक मर्म को न समझने के कारण ही वह अनेक प्रतीत होते हैं – आचार्य देवव्रत जी Reviewed by Momizat on . शिमला (विसंकें). शिमला के गेयटी थियेटर में सोमवार को विश्व बधुंत्व दिवस के अवसर पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी ने कहा कि ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने के लिए भले शिमला (विसंकें). शिमला के गेयटी थियेटर में सोमवार को विश्व बधुंत्व दिवस के अवसर पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी ने कहा कि ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने के लिए भले Rating: 0
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धर्म के वास्तविक मर्म को न समझने के कारण ही वह अनेक प्रतीत होते हैं – आचार्य देवव्रत जी

शिमला (विसंकें). शिमला के गेयटी थियेटर में सोमवार को विश्व बधुंत्व दिवस के अवसर पर राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी ने कहा कि ईश्वर एक है, उसे प्राप्त करने के लिए भले ही रास्ते भिन्न रहे हों. धर्म अनेक नहीं हैं, धर्म के वास्तविक मर्म को न समझने के कारण ही वह अनेक प्रतीत होते हैं. जैसे आग का एक ही धर्म है और वह है जलाना, इसी प्रकार पानी से लेकर हर वस्तु का अपना निश्चित धर्म होता है. गेयटी में विवेकानंद केंद्र नाभा की ओर से स्वामी विवेकानंद के शिकागों में दिये अभिभाषण के 125 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी, विशिष्ट अतिथि प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग के निदेशक राजकुमार गौतम जी, सम्मानित अतिथि विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के संयुक्त निदेशक किशोर तोकेकर जी रहे.

मुख्य अतिथि आचार्य देवव्रत जी ने कहा कि प्राचीन काल में ऋषियों ने भारत के लिए वो मार्ग प्रशस्त किया था, जिसका अनुसरण करके विश्व में आतंकवाद जैसी बुराईयों के लिये कोई स्थान नहीं बचता. भले ही ऋषि हवाई जहाज न बना पाए हों, लेकिन उन्होंने मानव एकजुटता और सहयोग पर आश्रित एक समाज के निर्माण और शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने के नियमों का सूत्रपात अवश्य किया था. उन्होंने स्वामी विवेकानंद के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे भारतीयता के महान आयामों का परिचय विश्व को हुआ. युवाओं से स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया.

प्राचीन ऋषियों ने वनों में जाकर आश्रमों की स्थापना की थी, उन्होंने डेरे नहीं बनाए थे. राज्यपाल जी ने हाल की घटनाओं पर दुख जताते हुए कहा कि यह सब धर्म को न समझने के कारण ही होता है. लोग धर्म की तलाश में जाते हैं और ऐसे बाबाओं के चक्कर में पड़कर ठगे जाते हैं. दाढ़ी बढ़ाने मात्र से कोई सन्यासी नहीं बन जाता, ऐसा होता तो रीछ कबका साधु बन गया होता. आश्रम का मतलब होता है – श्रम प्रधान जीवन. जहां भोगवाद के स्थान पर श्रम को महत्व दिया जाता है. वेदों ने भारतीय जीवन को पूर्ण अनुशासित करने के लिए ही चार आश्रमों की व्यवस्था बनायी थी. कार्यक्रम में संजौली, कोटशेरा और आरकेएमवी एवं स्थानीय 25 स्कूलों के विद्यार्थियों ने शिरकत करके प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया.

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