धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है, यह मात्र एक भ्रम है – अरुण कुमार जी Reviewed by Momizat on . नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख एवं जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर दिल्ली के निदेशक अरुण कुमार जी ने कहा कि धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्म नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख एवं जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर दिल्ली के निदेशक अरुण कुमार जी ने कहा कि धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्म Rating: 0
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धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है, यह मात्र एक भ्रम है – अरुण कुमार जी

j-and-k-study-centre-photoनागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख एवं जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर दिल्ली के निदेशक अरुण कुमार जी ने कहा कि धारा ३७० द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा या शक्ति प्राप्त है, यह मात्र एक भ्रम है. वास्तव में धारा ३७० उस समय की राज्य की स्थिति को देखते हुए की गई अंतरिम व्यवस्था है. वह आरएस मुंडले धरमपेठ कला-वाणिज्य महाविद्यालय एवं जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर नागपुर द्वारा महाविद्यालय के वेलणकर सभागृह में ‘जम्मू-कश्मीर : तथ्य और विपर्यास’ विषय पर आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे.

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का जब भारत में विलय हुआ, तब वहां युद्ध चल रहा था. उस समय की व्यवस्था के अनुसार संविधान सभा बन नहीं सकती थी. 1951 में संविधान सभा का निर्वाचन हुआ और इस संविधान सभा ने 6 फरवरी 1954 को राज्य के भारत में विलय की पुष्टी की. 14 मई 1954 को भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अस्थायी अनुच्छेद (धारा) 370 के अंतर्गत संविधान आदेश जारी किया और वहां कुछ अपवादों और सुधारों के साथ भारत का संविधान लागू हुआ.

इसके बाद यह धारा समाप्त कर जम्मू-कश्मीर में भी भारत का सामान्य संविधान लागू होना अपेक्षित था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि, धारा ३७० के कुछ प्रावधान अन्य राज्यों के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन करने वाले हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं के लिए लाभकारी है. अत: उनका धारा ३७० कायम रखने का आग्रह है. लेकिन, धारा ३७० के कारण, 1947 में पाकिस्तान से राज्य में आए हिंदू शरणार्थी तथा भारत के अन्य राज्यों से वहां जाकर वर्षों से रहने वाले लाखों नागरिक राजनीतिक, आर्थिक और शिक्षा से संबंधी अधिकारों से वंचित हैं. अनुसूचित जनजाति के नागरिकों को भी राजनीतिक आरक्षण नहीं मिलता. आज भी वहां भारतीय संविधान की 135 धाराएं लागू नहीं है.

जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर के सचिव आशुतोष भटनागर ने राज्य के स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि, 80 के दशक के अंत में जम्मू-कश्मीर में शुरू हुआ हिंसाचार अब बहुत कम हुआ है. राज्य का कारगिल, लेह, लद्दाख, जम्मू यह बहुत बड़ा क्षेत्र अलगाववाद से दूर और शांत है. श्रीनगर और घाटी के कुछ क्षेत्र में अलगाववादी सक्रिय हैं. लेकिन उनकी गतिविधियों को मीडिया में अतिरंजित प्रसिद्धि मिलती है, इस कारण पूरे राज्य में अशांति है, ऐसा गलत चित्र निर्माण होता है, यह वास्तविकता के विपरीत है. वक्ताओं ने नागरिकों से आह्वान किया कि, लोग जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति को जानें और वहां संपूर्ण सामान्य स्थिति निर्माण करने में सहयोग दें.

धरमपेठ शिक्षण संस्था के उपाध्यक्ष रत्नाकर केकतपुरे की अध्यक्षता में आयोजित कार्यशाला में अतिथियों का स्वागत संध्या नायर और मीरा खडक्कार ने किया, कार्यक्रम का संचालन पत्रकार चारुदत्त कहू ने और आभार प्रदर्शन डॉ. अवतार कृष्ण रैना ने किया. कार्यशाला में शहर के गणमान्य पत्रकार, शिक्षाविद, राज्यशास्त्र के अभ्यासक और विधि शाखा के जानकार उपस्थित थे.

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