नया गणवेश संघ को ज्यादा स्वीकार्य बनाएगा Reviewed by Momizat on . सप्ताह का इंटरव्यू - मनमोहन वैद्य इससे (गणवेश में बदलाव से) संघ के साथ काम करने में समाज के लोगों को अधिक सहजता रहेगी. युवाओं का संघ से जुड़ना तो लगातार बढ़ ही रह सप्ताह का इंटरव्यू - मनमोहन वैद्य इससे (गणवेश में बदलाव से) संघ के साथ काम करने में समाज के लोगों को अधिक सहजता रहेगी. युवाओं का संघ से जुड़ना तो लगातार बढ़ ही रह Rating: 0
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नया गणवेश संघ को ज्यादा स्वीकार्य बनाएगा

सप्ताह का इंटरव्यूमनमोहन वैद्य

manmohan-vaidya-jiइससे (गणवेश में बदलाव से) संघ के साथ काम करने में समाज के लोगों को अधिक सहजता रहेगी. युवाओं का संघ से जुड़ना तो लगातार बढ़ ही रहा है. उसमें और अधिक सहजता आएगी. नुकसान का तो कोई कारण ही नहीं है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं की पहचान रही है उनकी खाकी हाफ पैंट. पर इस विजयादशमी से संघ का गणवेश बदल जाएगा. अब वे फुल पैंट में दिखेंगे. इस बदलाव की पृष्ठभूमि और संघ से जुड़े अन्य पहलुओं पर शिवेंद्र सुमन ने आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य से बातचीत की. प्रस्तुत हैं उस बातचीत के अंश……..

स्थापना के करीब 90 साल बाद आखिर ऐसा क्या हो गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गणवेश बदलना पड़ा?

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए समय के साथ परिवर्तन किसी भी जीवंत संगठन का लक्षण है. इन 90 वर्षों में केवल गणवेश ही नहीं, संघ की प्रार्थना, आज्ञाएं, घोष की रचनाएं, सेवा-संपर्क-प्रचार जैसे कार्य विभाग, अन्यान्य गतिविधियां – ऐसी अनेक बातें हैं जो बदली हैं या नई जुड़ी हैं. उसी परंपरा में गणवेश में भी बदलाव हो रहा है.

इस बदलाव से संघ को क्या फायदा होगा? कुछ नुकसान भी हो सकता है क्या?

इससे संघ के साथ काम करने में समाज के लोगों को अधिक सहजता रहेगी. युवाओं का संघ से जुड़ना तो लगातार बढ़ ही रहा है. उसमें और अधिक सहजता आएगी. नुकसान का तो कोई कारण ही नहीं है.

हर संगठन या संस्था में किसी भी नए बदलाव का जहां कुछ लोग स्वागत करते हैं, वहीं कुछ विरोध भी करते हैं. क्या इस बदलाव को लेकर संघ के भीतर भी विरोध है, या था?

हर पीढ़ी में कुछ लोग यथास्थितिवादी रहते हैं. वे परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं. पर, जब अधिकांश लोग स्वीकारते हैं तो ये भी उनके साथ हो जाते हैं. ऐसा ही इस समय भी होगा. संघ की एक विशेषता है कि चर्चा के समय सब अपना-अपना मत अवश्य व्यक्त करते हैं, पर निर्णय होने के बाद उसे सभी स्वीकार करते हैं. संघ के मुख्यालय नागपुर में जब नए गणवेश की बिक्री आरंभ हुई, तब संघ के वरिष्ठ प्रचारक रामभाऊ बोंडाले का नए गणवेश में फोटो लिया गया. बोंडाले जी की आयु आज 93 वर्ष है और वे 1942 से यानी 74 वर्षों से संघ के प्रचारक हैं.

आरएसएस की पहचान उसकी शाखाओं में स्वयंसेवकों के शारीरिक व्यायाम को लेकर है. अब नए गणवेश में स्वयंसेवक कैसे व्यायाम करेंगे? फुलपैंट में उनको दिक्कत नहीं होगी?

संघ की पहचान उसका अनुशासन, सादगी, देशभक्ति तथा सेवा-भाव है. शारीरिक तो कार्यक्रम मात्र है. प्रदर्शन के लिए सभी शारीरिक कार्यक्रम इस नए वेश में भी आसानी से हो सकेंगे. इसी तरह से इसे डिजाइन किया गया है. यह गणवेश केवल समारोह या शिविर, वर्ग आदि विशेष कार्यक्रम में ही पहनना होता है. रोज की शाखा में तो शारीरिक कार्यक्रम, खेल आदि के अनुरूप कोई भी वेश (निकर भी) पहनकर आ सकते हैं.

अब संघ का गणवेश बदल गया तो क्या आगे गणवेश के हिसाब से शाखाओं में होने वाले शारीरिक कार्यक्रम भी बदलेंगे?

गणवेश के अनुसार नहीं, परंतु आयु के अनुसार शाखा पर शारीरिक कार्यक्रम बदल रहे हैं. तरुण एवं बालों के लिए खेल एवं सख्त शारीरिक कार्यक्रम अधिक रहते हैं. प्रौढ़ आयु के लिए खेलों के स्थान पर योगासन, प्राणायाम आदि चल रहे हैं.

नई पीढ़ी तकनीक प्रेमी है. खासकर स्मार्टफोन ने जमाने को बदल दिया है. ऐसी बदलती परिस्थिति में संघ कैसे खुद को अपडेट कर रहा है?

संघ तो अपने स्थापना काल से ही अपडेट रहा है और होता रहता है. सूचना प्रसारण के लिए तथा प्रबोधन के लिए आधुनिक तंत्र का पर्याप्त उपयोग होता है. परंतु व्यक्तिगत, आत्मीय संपर्क तो प्रत्यक्ष ही करना पड़ता है. उसका विकल्प नहीं हो सकता.

आज संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती है भारतीय संस्कृति की विचारधारा युवाओं तक पहुंचाने की. इसको लेकर संघ के पास क्या रणनीति है?

इंटरनेट के कारण युवाओं के मन में अपनी सांस्कृतिक पहचान तथा उसके बारे में गौरव की भावना की भूख तो बढ़ रही है. युवाओं को समझ में आए, ऐसी शब्दावली में और उपदेश न दे कर, संवाद के माध्यम से यह समझाया जा सकता है, ऐसा हमारा अनुभव है.

पिछले कुछ समय से संघ सामाजिक समरसता के तहत दलित समुदाय में पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. क्या गोरक्षकों द्वारा दलितों पर किए गए हमले से संघ के इस प्रयास को झटका लगा है?

स्थापना के समय से ही संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करने की बात संघ ने की है और वैसा ही इसका प्रयास भी रहा है. इसलिए 1934 में वर्धा के संघ शिविर में जाकर महात्मा गांधी ने खास इस बात की ही पूछताछ की कि यहां जातिगत भेदभाव रखा जाता है या नहीं. उनके पूछने पर शिविर में भाग लेने वाले तब हरिजन कहे जाने वाले बंधुओं ने बताया कि यहां सभी के साथ समान एवं सम्मानपूर्वक व्यवहार होता है. छुआछूत का कोई सवाल ही नहीं उठता. इस पर गांधीजी ने प्रसन्नता व्यक्त की थी. इसका उल्लेख महात्मा गांधी के प्रकाशित समग्र वांग्मय में है. समरसता का भाव लेकर हम वर्षों से कार्य कर रहे हैं. यही कारण है कि अनुसूचित जाति के लोग तथा अन्य जाति-बिरादरी के नेता अधिक विश्वास और आशा से संघ के पास आ रहे हैं. ऐसी घटनाएं जिनका उल्लेख आपने किया वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं, परंतु कहीं-कहीं हुई हैं. मीडिया उसे बढ़ा-चढ़ाकर बताता है.

(नवभरत टाइम्स 01 अक्टूबर, 2016)

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