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नयी एफडीआई नीति का भारत को कोई लाभ नहीं होगा – स्वदेशी जागरण मंच

जोधपुर (विसंकें). स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय संगठक कश्मीरी लाल जी ने कहा कि चीन द्वारा भारत की एनएसजी में सदस्यता के विरोध को लेकर क्षोभ प्रकट करता है क्योंकि भारत का अधिकांश व्यापार घाटा चीन से वस्तुओं के आयात के कारण ही है. चाहे मसूद अजहर हो या लखवी जैसे आंतकवादियों के समर्थन में भी चीन खड़ा रह कर भारत के प्रति अपनी शत्रुता हर अन्तरराष्ट्रीय मंच पर प्रकट करता है. ऐसे में भारतीय सरकार का व लोगों का चीनी वस्तुओं का आयात करना शत्रु राष्ट्र का आर्थिक पोषण करना है. इसलिए स्वदेशी जागारण मंच राष्ट्र व्यापी अभियान चला कर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार करने का सरकार व जनता का आह्वान करता है. वह जोधपुर प्रवास के दौरान वीरवार को पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे.

पिछले दिनों जिस प्रकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे भारत सरकार ने खोले हैं, ये भी अत्यन्त दुखदायी विषय है. स्वदेशी जागरण मंच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सदा से विरोध करता रहा है और आगे भी करता रहेगा. एफडीआई से रोजगार बढ़ने की सम्भावना तलाशना महज मृगमरिचिका है. पूरी दूनिया में इस समय रोजगार विहिन विकास का दौर चल रहा है और जब से भारत ने विदेशी निवेश को बढ़ाया है, तभी से बेरोजगारी में वृद्धि हुई है. गत 12 वर्षों में मात्र 1.6 करोड़ रोजगार सृजित हुए हैं, जबकि 14.5 करोड़ लोगों को इसकी तलाश थी. यदि यूएनओ की संस्था की मानें तो दुनियाभर में 41 प्रतिशत एफडीआई ब्राउन फील्ड में आयी है अर्थात पुराने लगे उद्योगों के ही उन्होंने हथियाया है, कोई नया उद्योग शुरू नहीं किया.

दूसरी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का जोर केवल स्वचालित या रोबोट प्रणाली द्वारा निर्माण व उत्पादन करने का रहता है. जिसके चलते रोजगार की सम्भावनाएं समाप्त हो रही है. इसी प्रकार से विदेशी पूंजी जितनी आती है, उससे दुगुनी से भी अधिक पूंजी रॉयल्टी व लाभांश आदि द्वारा विकसित देश गरीब देशों से निकाल लेते है. आज तक न ही कोई उच्च तकनीकि किसी देश को इन कम्पनियों द्वारा दी गयी है.

स्वदेशी जागरण मंच का स्पष्ट मानना है कि नयी एफडीआई नीति का कोई लाभ भारत को नहीं होगा. बल्कि नुकसान एक से बढ़कर एक अवश्य होंगे. 09 अगस्त क्रांति दिवस से “एफडीआई वापस जाओ” के उद्घोष के साथ पूरे देश में प्रत्येक जिला स्तर पर मंच द्वारा सरकार की एफडीआई नीति का विरोध शुरू होगा. आगामी 03 व 04 सितम्बर 2016 को  दिल्ली मंच के सभी पदाधिकारी एकत्र होकर आगे की रणनीति तय करेंगे.

तीसरा मुद्दा जेनेरिक व भारतीय सस्ती दवाईयों का है. आज दुनिया भर के 35 प्रतिशत मरीज भारत की सस्ती दवाईयों पर आश्रित हैं. ऐसे में यदि 74 प्रतिशत ब्राउन फील्ड निवेश ओटोमेटिक रूट से 100 प्रतिशत सरकारी अनुमति के कारण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भारत के इस व्यवसाय पर हमला करना खतरनाक है. यह न केवल हमारे फार्मा सेक्टर को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा, बल्कि साथ ही साथ दुनिया की गरीब जनता का, जैनरिक दवाई के नाते, एक मात्र भारतीय विकल्प भी छिन जाएगा.

मंच के प्रदेश संयोजक धर्मेन्द्र दूबे ने जानकारी दी कि मंच के प्रदेश कार्यकर्ताओं का सम्मेलन 20 व 21 अगस्त 2016 को अलवर में आयोजित होगा, जिसमें मंच की प्रदेश टोली इन मुद्दों पर व्यापक आंदोलन की रणनीति तय करेगी.

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