पुस्तकों के महाकुंभ में ज्ञान के गोते लगा रहे हैं हम – डॉ. बलदेव भाई शर्मा Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में सुरुचि प्रकाशन एवं नेशनल बुक ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में ‘डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम नई दिल्ली. प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में सुरुचि प्रकाशन एवं नेशनल बुक ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में ‘डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम Rating: 0
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पुस्तकों के महाकुंभ में ज्ञान के गोते लगा रहे हैं हम – डॉ. बलदेव भाई शर्मा

नई दिल्ली. प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में सुरुचि प्रकाशन एवं नेशनल बुक ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में ‘डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम’ तथा मंदिर भव्य बनाएंगे’ पुस्तकों का विमोचन किया गया. सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों के लेखक नरेन्द्र सहगल ने पाठकों के साथ परिचर्चा की.

उन्होंने कहा कि दोनों पुस्तकों का विषय अलग-अलग होने के बावजूद वैचारिक आधार एक है जो स्वतंत्रता से संबंधित है. एक का संबंध खंडित स्वतंत्रता से है और दूसरी का संबंध स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे धार्मिक स्थलों पर थोपे गए गुलामी के प्रतीकों से है. पिछले 490 वर्षों से अयोध्या में भव्य मंदिर बनाने का संघर्ष चल रहा है, 05 लाख हिन्दुओं ने इसके लिए अपना बलिदान दिया है. इसलिए हिन्दू समाज कभी भी उस स्थान पर कोई दूसरी इमारत सहन नहीं करेगा.

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष डॉ. बलदेव भाई शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि मेले भारतीय संस्कृति का प्रतीक हैं. पुस्तकों के इस महाकुंभ में हम सभी ज्ञान के गोते लगा रहे हैं. पुस्तक के विषय में उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान पर बड़े सवाल उठाए जाते हैं, संघ पर कई प्रकार के आरोप भी लगाए जाते हैं, राजनीति में सत्ता स्वार्थ के लिए बहुत से सवाल खड़े किए जाते हैं, विवाद पैदा करने के लिए. आज के युवाओं को सच्चाई बताने की बहुत आवश्यकता है. इस पुस्तक में विस्तार से तथ्यपूर्ण तरीके से आजादी के आंदोलन में संघ के योगदान को प्रस्तुत किया गया है.

दूसरी पुस्तक के विषय में कहा कि राममंदिर राजनीति, धर्म-संप्रदाय और जाति से जुड़ा हुआ विषय नहीं है. राम भारतवर्ष की पहचान और मानवधर्म के प्रतीक हैं. भारत में सभी के मन में राम के प्रति श्रद्धा है. राम जिन्हें हम मर्यादापुरुषोत्तम कहते हैं पूरी मनुष्य जाति का गौरव हैं. औपनिवेशिक काल में जिस तरह की मानसिकता हम पर थोप दी गई, हम उसी तरह सोचने लग गए हैं. हम भारत के रूप में नहीं सोचना चाहते. पिछले 4 सौ वर्षों से लाखों बलिदान रामजन्मभूमि के लिए इसलिए दिए गए ताकि भारत की उस पहचान को राममंदिर के रूप में पुर्नप्रतिष्ठापित किया जा सके. शोध में रुचि रखने वाले विद्यार्थी व विद्वानों के लिए यह पुस्तकें बहुत उपयोगी होंगी.

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