प्रस्ताव – हिन्दू समाज की परम्पराओं व आस्थाओं के रक्षण की आवश्यकता Reviewed by Momizat on . राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, ग्वालियर फाल्गुन शु. 2- 4  युगाब्द 5120, 8 -10  मार्च 2019 अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह सुविचारित मत है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, ग्वालियर फाल्गुन शु. 2- 4  युगाब्द 5120, 8 -10  मार्च 2019 अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह सुविचारित मत है कि Rating: 0
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प्रस्ताव – हिन्दू समाज की परम्पराओं व आस्थाओं के रक्षण की आवश्यकता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, ग्वालियर

फाल्गुन शु. 2 4  युगाब्द 5120, 8 10  मार्च 2019

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा का यह सुविचारित मत है कि अभारतीय दृष्टिकोण के आधार पर हिन्दू आस्था और परम्पराओं को आहत एवं इनका अनादर करने का एक योजनाबद्ध षड्यंत्र निहित स्वार्थी तत्त्वों द्वारा चलता आ रहा है। शबरीमला मंदिर प्रकरण इसी षड्यंत्र का नवीनतम उदाहरण है।

हिंदुत्व ईश्वर के एक ही स्वरूप अथवा पूजा पद्धति को स्वीकारने तथा अन्यों को नकारने वाला विचार नहीं है, अपितु संस्कृति के विविध विशेष रूपों में अभिव्यक्त होने वाला जीवन दर्शन है। इसका अनूठापन विविध पूजा पद्धतियों, स्थानीय परम्पराओं व उत्सव,आयोजनों से प्रकट होता है। हमारी परम्पराओं में विद्यमान विविधता के सौंदर्य पर नीरस एकरूपता को थोपना असंगत है।

हिन्दू समाज ने अपनी प्रथाओं में काल और आवश्यकता के अनुरूप सुधारों का सदैव स्वागत किया है, परन्तु ऐसा कोई भी प्रयास सामाजिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक नेतृत्व के मार्गदर्शन में ही होता रहा है और आम सहमति के मार्ग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती रही है। केवल विधिक प्रक्रियाएँ नहीं, अपितु स्थानीय परम्पराएँ व स्वीकृति सामाजिक व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सम्पूर्ण हिन्दू समाज आज एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है। केरल की सत्तारूढ़ वाम मोर्चा सरकार, माननीय उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा पवित्र शबरीमला मंदिर में सभी आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश के आदेश को लागू करने की आड़ में हिन्दुओं की भावनाओं को कुचल रही है।

शबरीमला की परंपरा देवता और उनके भक्तों के बीच में अनूठे संबंधों पर आधारित है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायालय ने निर्णय तक पहुँचते हुए सैंकड़ों वर्षों से चली आ रही समाज स्वीकृत परंपरा की प्रकृति और पृष्ठभूमि का विचार नहीं किया; धार्मिक परम्पराओं के प्रमुखों के विचार जाने नहीं गए; महिला भक्तों की भावनाओं की भी अनदेखी की गई। समग्र विचार के अभाव में स्थानीय समुदायों द्वारा सदियों से स्थापित, संरक्षित और संवर्धित वैविध्यपूर्ण परम्पराओं को इससे ठेस पहुँची है।

केरल की मार्क्सवादी नीत सरकार के कार्यकलापों ने अय्यप्पा भक्तों में मानसिक तनाव उत्पन्न कर दिया है। नास्तिक, अतिवादी वामपंथी महिला कार्यकर्ताओं को पीछे के दरवाजे से मंदिर में प्रवेश करवाने के राज्य सरकार के प्रयत्नों ने भक्तों की भावनाओं को बहुत आहत किया है।

सीपीएम अपने क्षुद्र राजनैतिक लाभ एवं हिन्दू समाज के विरुद्ध वैचारिक युद्ध का एक अन्य मोर्चा खोलने के लिए यह कर रही है। यही कारण है कि अय्यप्पा भक्तों, विशेषकर महिला भक्तों द्वारा अपनी धार्मिक स्वतंत्रताओं और अधिकारों की रक्षा के लिए एक स्वतःस्फूर्त और अभूतपूर्व आन्दोलन उठ खड़ा हुआ।

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा सभी भक्तों की सामूहिक भावनाओं का हृदयपूर्वक सम्मान करती है और मंदिर परम्पराओं की रक्षा हेतु संयम तथा शालीनता से संघर्षरत रहने का आह्वान करती है। प्रतिनिधि सभा केरल सरकार से आग्रह करती है कि श्रद्धालुओं की आस्था, भावना तथा लोकतांत्रिक अधिकारों का आदर करे और अपनी ही जनता पर अत्याचार न करे। प्रतिनिधि सभा आशा करती है कि उच्चतम न्यायालय इस विषय में दायर पुनर्विचार व अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते समय इन सब पहलुओं का समग्रतापूर्वक विचार करेगा। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा देश के लोगों से शबरीमला बचाओ आन्दोलन को हर प्रकार से समर्थन देने का आह्वान करती है।

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