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भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कानून में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका – अनिरुद्ध राजपूत जी

पुणे (विसंकें). अंतरराष्ट्रीय कानूनविद् अनिरुद्ध राजपूत जी ने कहा कि बदलते समय के अनुसार युवाओं को अधिक अवसर देने की नीति सरकार ने अपनाई है जो स्वागत योग्य है. दुनिया भारत की ओर आशा से देख रही है. आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी. विश्व संवाद केंद्र (पश्चिम महाराष्ट्र) की ओर से राष्ट्र संघ के अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग (आईएलसी) में नियुक्ति के उपलक्ष्य में अनिरुद्ध जी का सत्कार एवं वार्तालाप का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत कार्यवाह विनायकराव थोरात जी, विश्व संवाद केंद्र के कार्यवाह रविंद्र घाटपांडे जी और संपादक मिलिंद कांबले उपस्थित थे.

अनिरुद्ध जी ने कहा कि “राजनैतिक रूप से हम स्वतंत्र हो चुके हैं, लेकिन कानून बनाने के बारे में हम आज तक परतंत्र थे. आज भी हमारे यहां रोमन व्यवस्था पर आधारित कानून हैं. हम आज तक ‘रूल टेकर्स’ थे और अब हम ‘रूल गिवर्स’ बन रहे हैं. उनकी पद्धति ही हमारी पद्धति, यह अब बदलना चाहिए. भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कानून की दिशा और स्वरूप भारत तय करेगा.”

आईएलसी के 68 वर्ष के इतिहास में 33 वर्ष की आयु में चुनकर आने वाले अनिरुद्ध जी सबसे युवा सदस्य और महाराष्ट्र के पहले विधिज्ञ हैं. एशिया महाद्वीप से चुनकर आने वाले सात प्रत्याशियों में से सर्वाधिक 160 मत राजपूत को मिले. इस संदर्भ में उन्होंने कहा, “हमारे यहां आज तक अनुभवी और नौकरशाह व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जाती थी. लेकिन अब सरकार ने युवाओं को अवसर देने का निश्चय किया है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्वयं मेरा साक्षात्कार लेकर भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया. भारत द्वारा एक युवा को अवसर दिए जाने के कारण अन्य देशों ने भी अपने प्रत्याशी बदले. इससे बदलती हुई स्थिति की कल्पना की जा सकती है.” “मेरी परवरिश में कईयों का सहभाग है. कई लोगों ने अपना समय (ह्यूमन-अवर) लगाय है, जिस कारण मैं यहां तक आया हूं. अगर मैं असफल होता तो उनकी मेहनत जाया हो जाती,” इन शब्दों में अनिरुद्ध जी ने अपनी सफलता का श्रेय संघ के संस्कारों को दिया. इस अवसर पर उन्होंने दिवंगत सरसंघचालक रज्जु भैय्या जी सहित संघ के अनेक ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं की स्मृतियां जगाई. भारत के बारे में विश्व के नजरिए को लेकर उन्होंने कहा कि विश्व हम पर काफी विश्वास करता है. अब सोचना यह चाहिए कि क्या विश्व के विश्वास पर हम खरे उतरते हैं. अनिरुद्ध जी की माता जी और पिता धनंजय राजपूत जी ने बचपन की घटनाओं का जिक्र किया.

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