भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं अभिनवगुप्त – जे. नंदकुमार जी Reviewed by Momizat on . आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत 'राष्ट्रीय विद्वत संगम' का आयोजन बेंगलूरु. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख जे. नंदकुमा आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत 'राष्ट्रीय विद्वत संगम' का आयोजन बेंगलूरु. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख जे. नंदकुमा Rating: 0
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भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं अभिनवगुप्त – जे. नंदकुमार जी

आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय विद्वत संगम’ का आयोजन

बेंगलूरु. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख जे. नंदकुमार जी न कहा कि पिछले वर्ष तक देश में आचार्य अभिनवगुप्त के बारे में शोधार्थियों को भी अधिक जानकारी नहीं थी. परंतु, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के प्रयास से देश में एक वातावरण बन गया है. आचार्य अभिनवगुप्त का विचारदर्शन चर्चा का विषय बना है. आचार्य भारतीय ज्ञान-परंपरा के वाहक हैं. उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को सामान्य जन तक पहुंचाने के लिए महत्त्वपूर्ण रचनाएं की हैं. वह ‘राष्ट्रीय विद्वत संगम’ में संबोधित कर रहे थे. कार्यक्रम बेंगलूरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग संस्था के आश्रम में जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के तत्वावधान में आयोजित किया गया. इस अवसर पर आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर की विशेष उपस्थिति रही.

आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्त्राब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित ‘राष्ट्रीय विद्वत संगम’ के उद्घाटन समारोह में नंदकुमार जी ने बीज वक्तव्य में कहा कि यह विडम्बना है कि विदेशों में आचार्य अभिनवगुप्त पर काम हो रहा है, लेकिन हमने उन्हें विस्मृत कर दिया. विदेशी विद्वान अपनी दृष्टी और अपनी सीमा में रहकर भारतीय दर्शन को प्रस्तुत करते हैं. कई बिंदुओं पर विदेशी विद्वानों ने आचार्य अभिनवगुप्त को गलत ढंग से प्रस्तुत किया है. इन कारणों से भारत की ज्ञान परंपरा अपने वास्तविक रूप में प्रकट नहीं हो पाती है. हमारा दायित्व है कि आचार्य अभिनवगुप्त के संदर्भ में शोध आधारित कार्य से हम भारतीय ज्ञान पंरपरा को उसके वास्तविक रूप में दुनिया के सामने रखें. हमें पढ़ाया जाता है भारत की सभ्यता सिंधु से प्रारंभ होती है, जबकि नवीनतम शोध यह सिद्ध करते हैं कि भारत की सभ्यता और संस्कृति सिंधु सभ्यता के पहले से है. हिन्दू संस्कृति का विस्तार सिंधु नदी के आगे तक था.

राष्ट्रीय पहचान की आवश्यकता

नंदकुमार जी ने कहा कि राष्ट्रीय पहचान को प्राप्त करने के लिए बीते 70 वर्षों में कोई काम नहीं किया गया. जबकि भारत की समृद्ध पहचान को स्थापित करने के लिए इतना समय पर्याप्त था. हमारी राष्ट्रीय पहचान क्या है? भारतीयता यानी क्या है? भारतीय संस्कृति क्या है? आजादी के बाद इन प्रश्नों के जवाब तलाशने चाहिए थे, लेकिन तत्कालीन नेतृत्व ने इसकी उपेक्षा ही की. यह विचार करना चाहिए कि आखिर स्वतंत्रता के बाद भारतीय विचारदर्शन को आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया? उस समय का राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व मानता था कि भारतीय संस्कृति और विचार के बोझ के कारण देश आगे नहीं बढ़ सकता था. वह भारतीय संस्कृति और उसके विचारदर्शन को निरर्थक मानते थे. स्वतंत्रता मिलने पर इन्हीं आत्मविस्मृत लोगों ने कहा था कि भारत एक राष्ट्र बन रहा है. भारत का इतिहास अंग्रेजी मानसिकता के इन्हीं लोगों ने लिखा. आज आवश्यकता है कि हम अपनी राष्ट्रीय पहचान को आगे रखें.

वेद, तंत्र एवं योग की त्रिवेणी भारतीय संस्कृति

नंदकुमार जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति वेद, तंत्र एवं योग की त्रिवेणी है और आचार्य अभिनवगुप्त इसी संगम का हिस्सा थे. उन्होंने भारतीय संस्कृति के नवोत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. देश में जब-जब भारतीय संस्कृति के सामने संकट खड़ा होता है, तब-तब कोई न कोई महापुरुष सामने आता है. शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों की लम्बी श्रृंखला है, जिन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को सामयिक बनाकर प्रस्तुत किया. यह दुर्भाग्य है कि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद के बीच अनेक विचारक आए, लेकिन इतिहास में उनका कहीं उल्लेख नहीं है. आचार्य अभिनवगुप्त के विचार की जो चर्चा होनी चाहिए थी, वह हुई नहीं.

युवाओं को मुख्यधारा में लाने से बदलेगा जम्मू-कश्मीर का वातावरण

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि एवं जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह जी ने कहा कि देश में भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं. उनकी सक्रियता के कारण ही जम्मू-कश्मीर में शासन का राज ठीक तरह से नहीं चल पा रहा है. खासकर वहां के वर्ग को यह ताकतें अपने चंगुल में ले चुकी हैं, जो बड़ी चिंता की बात है. इसके कारण ही वहां धार्मिक कार्य प्रभावित हैं. साथ ही जम्मू-कश्मीर में सत्तासीन रहीं पिछली तीन सरकारों ने भी वहां की जनता को दिग्भ्रमित करने का काम किया है. कश्मीर में अब भी युवाओं को मुख्यधारा में लाने और वहां अच्छा माहौल बनाने की असीम संभावनाएं हैं. डॉ. निर्मल सिंह ने कहा कि आज भी आचार्य अभिनवगुप्त के जीवन पर उतना अनुसंधान नहीं हुआ है, जितना होना चाहिए. इस अवसर पर आचार्य अभिनवगुप्त सहस्त्राब्दी समारोह के अंतर्गत वर्षभर हुए कार्यक्रमों की जानकारी आयोजन समिति के सचिव रजनीश शुक्ला ने प्रस्तुत की. इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री जवाहरलाल कौल भी उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन आशुतोष भटनागर ने किया.

संगम में 29 राज्यों के प्रतिभागी

विद्वत संगम जम्मू-कश्मीर के महान भारतीय दार्शनिक आचार्य अभिनवगुप्त की सहस्राब्दी समारोह को मनाने के लिए आयोजित किया गया है. आचार्य अभिनवगुप्त विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक और शैव परंपरा के महानतम प्रतिपादक थे. आज से 1000 वर्ष पहले, यह कहा जाता है कि 1200 शिष्यों के साथ वे जम्मू-कश्मीर में भीरवाह की एक गुफा में गये और शिव में लीन हो गये. आज दुनियाभर में 50 विश्वविद्यालयों में आचार्य अभिनवगुप्त पर शोध कार्य हो रहा है. राष्ट्रीय विद्वत संगम में भारत के 29 राज्यों से प्रतिभागी शामिल हुए हैं, इनमें150 विश्वविद्यालयों/शिक्षण संस्थानों से शोधार्थी, 70 अधिवक्ता/न्यायमूर्ति, 50 से अधिक मीडिया शिक्षक एवं पत्रकार और 64 विषय विशेषज्ञ शामिल हैं. आयोजन की सहयोगी संस्थाओं में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, श्रीश्री विश्वविद्यालय, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र एवं भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद् शामिल हैं.

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