भारतीय संस्कृति संपूर्ण विश्व को परिवार मानती है – प्रो. राकेश सिन्हा जी Reviewed by Momizat on . भुवनेश्वर (विसंकें). राजधानी में आयोजित नारद सम्मान समरोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो. राकेश सिन्हा जी ने कहा कि भारतीय समाज प्रयोगधर्मी समाज रहा है भुवनेश्वर (विसंकें). राजधानी में आयोजित नारद सम्मान समरोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो. राकेश सिन्हा जी ने कहा कि भारतीय समाज प्रयोगधर्मी समाज रहा है Rating: 0
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भारतीय संस्कृति संपूर्ण विश्व को परिवार मानती है – प्रो. राकेश सिन्हा जी

भुवनेश्वर (विसंकें). राजधानी में आयोजित नारद सम्मान समरोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो. राकेश सिन्हा जी ने कहा कि भारतीय समाज प्रयोगधर्मी समाज रहा है. यहां विभिन्न मतों को सम्मान दिया जाता है. केवल अपना ही मत श्रेष्ठ है, यह भारतीय धारणा नहीं है. पश्चिम के लिए समग्र विश्व एक बाजार है, जबकि भारतीय संस्कृति समग्र विश्व को कुटुंब मानती है. बाजार की भावना और कुटुंब की भावना में सोच का अंतर है. प्रो. सिन्हा जी ने कहा कि भारतीय जनमानस को समझने के लिए विश्वविद्यालयों में जाकर अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं है. हमारे गांवों में सामाजिक समरसता का ज्ञान आपको मिल जाएगा.

भारत में वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि हम उदारवादी सभ्यता के वाहक हैं, लेकिन इसे हमारी कमजोरी समझा गया है. पिछले दिनों में साहित्यकारों व तथाकथित विद्वानों द्वारा पुरस्कार वापसी पर कहा कि वे लोग तो पुरस्कार के योग्य ही नहीं थे, अच्छा हुआ खुशामद के बल पर उन्हें दिया गया पुरस्कार लौट आया है. कश्मीर में मौजूदा हालात पर कहा कि कश्मीर समस्या को जड़ से मिटाने की आवश्यकता है. कश्मीर में अब तर्क से नहीं ताकत से हल की संभावना दिखाई देती है. कार्यक्रम में नारद सम्मान शिव नारायण सिंह जी को प्रदान किया गया. सम्मान के तौर पर उन्हें 10 हजार रुपये नकद और मानपत्र दिया गया. इस अवसर पर शिव नारायण सिंह जी ने कहा कि समूचा देश आज वैचारिक युद्ध का सामना कर रहा है.

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