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भारत को समृद्ध करने के लिए भारतीय भाषाओं को समृद्ध करना आवश्यक है

भारतीय भाषा मंच के कार्यक्रम में पारित किये दो प्रस्ताव

नई दिल्ली. भारतीय भाषा मंच की ओर से आयोजित भारतीय भाषा शिक्षक सम्मेलन में शिक्षकों ने भाषाओं को बचाने का संकल्प लिया. नई दिल्ली के हिन्दी भवन में 11 फरवरी को आयोजित सम्मेलन में हिन्दी, संस्कृत, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला, तमिल आदि भाषाओं को विद्यालय स्तर पर पढ़ाने वाले शिक्षक सम्मिलित हुए. मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय भाषा मंच के संयोजक एवं हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रो. वृषभ जैन जी ने भारतीय भाषाओं के अस्तित्व पर प्रहार करने वालों से सावधान करते हुए कहा कि हमें अपनी मातृभाषा की रक्षा प्राणों से भी ज्यादा मान कर करनी चाहिए. भारत एक उभरती आर्थिक शक्ति एवं विश्व का सबसे बड़ा बाजार है. ऐसे में विदेशी भाषाएं हमारी भाषाओं को मारकर, आगे बढ़कर आर्थिक एवं सांस्कृतिक लाभ उठाने का जीतोड़ प्रयास कर रही हैं. विद्यालयों में विदेशी भाषाओं के एजेंट प्रलोभन देकर सभी प्रकार के बाजारू हथकंडे अपना रहे हैं. अब चाहे शिक्षा हो, व्यवसाय हो, या डिजिटल संसार हो, विदेशी ताकतें भारत की भाषाओं पर ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह हमलावर हो रही हैं. अतः शिक्षकों को नई तकनीक के साथ षड्यंत्रों की भी जानकारी आवश्यक है.

मुख्य अतिथि एनआईओएस के चेयरमैन डॉ. सीबी शर्मा जी ने कहा कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषाएं होनी चाहिए. हर प्रकार की शिक्षा चाहे वह यांत्रिकी हो, प्रौद्योगिकी हो, प्रबन्धन की हो, भारतीय भाषाअें में होनी चाहिए. शिक्षा हर भारतीय का अधिकार है, इसे पाने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. इसे आगे बढ़कर चुनौती के रूप में स्वीकार करना समय की मांग है. शिक्षकों से आग्रह है कि वे श्रेष्ठ विदेशी पुस्तकों का अनुवाद भारतीय भाषाओं में करने के लिए आगे आएं, ताकि ज्ञान चाहने वाले इच्छुक व्यक्तियों की पंक्ति के अंतिम सदस्य तक उसकी भाषा में पहुंच सके. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के अध्यक्ष दीनानाथ बत्रा जी ने शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा कि हमारे देश की भाषाएं साहित्यिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, लिग्विंस्टिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से श्रेष्ठ हैं. हर प्रकार के ज्ञान का अथाह भंडार इनके अंदर है. शिक्षकों को आत्म सम्मान के साथ अपनी भाषाओं का शिक्षण करना चाहिए, नई-नई तकनीक के साथ ही रूचिकर ढंग से छात्रों के साथ पुत्रवत् स्नेह कर भाषाएं सरलता से सिखाई जा सकती हैं. पुस्तकों में निहित तत्वों को परखते हुए भारतीय परिवेश के अनुसार छात्रों को विचारशीलता, सृजनात्मकता और राष्ट्रीयता की शिक्षा देनी होगी. यद्यपि मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैश्वीकरण का दौर चल रहा है, फिर भी हमें अपने आत्म गौरव का ध्यान रखते हुए दूसरे को सम्मान देना चाहिए. यही हमारी संस्कृति रही है, अहं ब्रह्मास्मि, अतिथि देवो भव.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केन्द्रीय विद्यायल संगठन के आयुक्त सन्तोष जी ने मातृभाषा के साथ देश की सभी भाषाओं को पारस्परिक सहयोग एवं सम्मान का भाव रखते हुए पढ़ाने की बात कही. उन्होंने संगठित होकर भारतीय भाषाओं को देश-विदेश में प्रचार-प्रसार हेतु शिक्षकों का आह्वान किया.

कार्यक्रम के समापन पर भारतीय भाषा मंच की ओर से दो प्रस्ताव पारित किए गए

प्रस्ताव-1

भारत को समृद्ध करने के लिए भारतीय भाषाओं को समृद्ध करना आवश्यक है. अभी उपलब्ध सूत्रों में त्रिभाषा सूत्र भी इस संवर्धन का मूल आधार है. आवश्यकता इस बात की है कि हम त्रिभाषा सूत्र को भारतीय भाषाओं के संदर्भ में ही देखें, विदेशी भाषाओं के संदर्भ में नहीं. क्योंकि भारतीय भाषाओं की समृद्धि के बिना भारत की समृद्धि का स्वप्न दिवा स्वप्न जैसा है. इसके साथ ही साथ त्रिभाषा सूत्र को लेकर चर्चाएं तो लम्बे समय से हो रही हैं. पर सब इसे लागू करने से बचते रहे हैं. इसलिए भारतीय भाषाओं की समृद्धि के लिए त्रिभाषा सूत्र को तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने की आवश्यकता है. यदि इसे टाला जाएगा तो यह माना जाएगा कि वास्तव में हम अब भी त्रिभाषा सूत्र पर बात कर रहे हैं , पर लागू नहीं करना चाहते.

अतः भारतीय भाषा मंच प्रस्ताव करता है कि भारतीय भाषाओं से संदर्भित त्रिभाषा सूत्र अर्थात तीन भाषाओं को पढ़ाया जाना और संवर्धित किया जाना, तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए. यह त्रिभाषा सूत्र शासकीय एवं निजी समस्त विद्यालयों में लागू किया जाए, तभी भाषाओं के स्तर पर समान पोषण की बात हो सकेगी.

प्रस्ताव – 2

निरन्तर सूचनाएं मिल रही हैं कि भाषाओं के पोषण, अध्ययन और अध्यापन को दोयम दर्जे पर ही नहीं अपितु पूरी तरह से नजरअन्दाज किया जा रहा है और भाषाओं के स्थान पर व्यवसायिक पाठ्यक्रमों को लाने का सघन प्रयास किया जा रहा है. यह स्थिति कक्षा 9वीं, 10वीं, 12वीं में द्वितीय भाषा के स्थान पर व्यवसायिक पाठ्यक्रम को लागू किया जा रहा है. बात इतनी ही नहीं भाषाओं की इकाई को समान कालांश भी नहीं दिए जा रहे हैं, जिससे छात्र और अध्यापक दोनों आतंकित है, कुल मिलाकर भाषाओं के पोषण पर अन्य विषयों की तरह समानुपातिकता नहीं अपनाई जा रही है.

अतः भारतीय भाषा मंच प्रस्ताव करता है कि भाषाओं के स्थान पर व्यवसायिक पाठ्यक्रमों को न पढ़ाकर पृथक रूप से व्यवस्था की जाए तथा भाषाओं के शिक्षण के कालांश भी अन्य विषयों की इकाई के शिक्षण कालांश के बराबर किये जाएं.

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