भारत माता की जय Reviewed by Momizat on . शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसके स्वाधीनता के सत्तर साल पश्चात् देश की जय-जयकार के सामने सवालिया निशान लगता हो. शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसमें शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसके स्वाधीनता के सत्तर साल पश्चात् देश की जय-जयकार के सामने सवालिया निशान लगता हो. शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसमें Rating: 0
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भारत माता की जय

hqdefaultशायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसके स्वाधीनता के सत्तर साल पश्चात् देश की जय-जयकार के सामने सवालिया निशान लगता हो. शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश हो जिसमें स्वाधीनता संग्राम के मंत्र स्वरूप वंदे मातरम् की घोषणा को दोहराने में लोग विरोध करते हों, जहां पड़ोसी देश से बेरोकटोक आने वाले घुसपैठियों को रोकने हेतु छात्रों को आंदोलन करना पड़े, जहाँ राष्ट्रध्वज की वंदना के लिए सख्ती बरतने की चर्चा होती हो. दुर्भाग्यवश दुनिया में ऐसा एकमात्र देश अपना भारत ही बना हुआ है, जहाँ यह सभी अनहोनी जैसी बातें होती है. स्वार्थ, राजनीति और वोट बैंक के लालच ने इस देश के राजनेताओं, विचारकों को इतना निचले स्तर पर ला खड़ा किया है कि देशभक्ति, देशप्रेम का सौदा करने में उन्हें जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती है.

भारत माता की जय, ‘वंदे मातरम्’ कहते-कहते अनेक क्रांतिकारी देश की आजादी की जंग में फांसी पर झूल गए. सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर में क्रांतिकारियों ने औरंगाबाद के नजदीक दौलताबाद के किले में ‘भारत माता’ की मूर्ती की प्रतिष्ठापना कर स्वाधीनता की शपथ ली और इस संग्राम की शुरूआत की. उन्हें अंग्रेजों ने औरंगाबाद में क्रांति चौक स्थित कालाचबुतरा पर फांसी पर लटकाया. क्या उन्हें कल्पना भी होगी की इसी ‘भारत माता’ की कल्पना का 160 साल बाद इसी देश में विरोध होगा. कोई कहेगा कि ‘मेरी  गर्दन पर चाकू रखने पर भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा.’

जेएनयू में देश विरोधी नारे लगने के पश्चात् जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनजी भागवत ने बयान दिया था कि देश के नौजवानों को अब ‘भारत माता की जय’ कहने के लिए संस्कार देने पड़ेंगे. लेकिन इसका अर्थ भारत माता की जय बोलने की सख्ती बरतने से जोड़कर मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने गर्दन पर चाकू रखने पर भी ‘भारत माता की जय’ नहीं कहूँगा ऐसा बेतुका बयान दे डाला.

स्वाधीनता के पश्चात पिछले 70 सालों में छद्म सेक्युलॅरिजम ने देशभक्ति से जुड़ी हुई अनेक संकल्पनाओं को विपरीत संदर्भ दिया और देशभक्ति के प्रकटीकरण का खुलेआम विरोध बेशर्मी से करने की मानसिकता को बढ़ावा दिया. देशभक्ति और देशप्रेम के बारे में बेशर्मी भरे बयान देने में गर्व का अनुभव करने तक, ऐसे बयान देने वालों को संरक्षण एवं सम्मान देने तक यह स्तर नीचे गिर गया है. स्वाधीनता संग्राम में जो बातें देशभक्ति की, राष्ट्रीयता की पहचान बनी हुई थी उन्हें विरोध करने में अपना राजनीतिक अस्तित्व ढूँढने की बेशर्मी लोग करने लगे हैं. वंदे मातरम् यह स्वाधीनता संग्राम का मंत्र बन चुका था. लेकिन अब वंदे मातरम् कहने का विरोध होता है. भारत माता की जय इस जयघोष में कहीं भी मूर्ती की कल्पना दूर-दूर तक नहीं थी. यह देशभक्ति भरा जयघोष था. अब कहा जा रहा है कि भारत माता की जय कहना इस्लाम के विरोध में है.

इस देश में अल्पसंख्यकवाद और तुष्टीकरण की राजनीति ने सामाजिक, राष्ट्रीय विषयों के संदर्भ और परिभाषा को उलट कर रख दिया है. स्वाधीनता संग्राम में वंदे मातरम्, भारत माता की जय, भगवा ध्वज, शिवाजी जयंती, गणेशोत्सव, हिंदुस्थान ये सब बातें राष्ट्रीय थीं, जिन्हें अब स्वाधीनता के पश्चात साम्प्रदायिक कहा जा रहा है.

जेएनयू का विवाद चल रहा था, तब एक पाठक का मुझे फोन आया. वह साम्यवादी कार्यकर्ता लग रहा था. मेरे बोलने में हिंदुस्थान यह नाम आते ही उसने फोन पर विरोध प्रकट करते हुए कहा कि हिंदुस्थान नहीं भारत कहो. इस देश को भारत यह नाम संविधान में अधिकारिक तौर पर दे दिया है. मैंने उन्हें कहा क्या भारत माता की जय कहने के लिए वे आग्रह करेंगे. तो उनके पास इसका जबाब नहीं था. उन्होंने फोन काट दिया.

सय्यद शहाबुद्दीन ने राष्ट्रध्वज की वंदना के लिए सख्ती ना बरतने की बात कही थी, अब ‘भारत माता की जय’ ना कहने की बात ओवैसी जैसे लोगों ने कही है. इस्लाम के रिलीजियस कारणों को आगे रखकर देशभक्ति को दांव पर लगाने की छूट लेने का एक प्रयोग कुछ लोग करना चाहते हैं. धर्मनिरपेक्षता की रट लगाने वाले स्वयं घोषित सेक्युलर भी ऐसे लोगों का पक्ष लेकर मैदान में उतरने लगे हैं. इन लोगों की धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा ही अलग है. सभी पंथ, पूजा पद्धति से निरपेक्ष कानून, राजपाट, व्यवस्था होना इनकी दृष्टी से धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा नहीं है. इसके संपूर्णत: विपरीत इनकी धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप है. इनका कहना है कि, अलग-अलग पूजा पद्धति अनुसार कानून ही अलग-अलग हो, राजव्यवस्था में पूजा पद्धति के अनुसार कुछ लोगों के लिए अलग व्यवहार हो. उपासना पद्धति के अनुसार अलग-अलग व्यवहार को ही इन लोगों ने ‘सर्व-धर्म- सम- भाव’ का नाम दिया है. विषम भाव को ही समभाव कहने का साहस यह धर्मनिरपेक्षता की घोर विडंबना है. इसी तुष्टीकरण और अल्पसंख्यकवाद के चलते कुछ लोगों का साहस इतना बढ़ गया है कि, ओवेसी जैसों ने कह डाला कि गर्दन पर छुरी रखोगे तो भी ‘भारत माता की जय’ नहीं कहेंगे.

भारत माता की जय का विरोध करने वाले इसलिए विरोध कर रहे हैं कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसका समर्थन करते हैं. संघ का अंधविरोध करने के लिए देशभक्ति की भावना को भी नकारने के लिए ये लोग तैयार हैं. क्या भारत माता की जय का जयघोष आरएसएस ने तैयार किया है ? अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार निर्मूलन के आंदोलन में मंच पर रखे भारतमाता के चित्र को भी यह कह कर विरोध किया गया था कि यह चित्र आरएसएस के लोगों ने प्रचलित किया है. वास्तविकता क्या है ?

वास्तव में भारत माता की संकल्पना और भारत माता का चित्र संघ की स्थापना के पहले से ही स्वाधीनता संग्राम की प्रेरणा बने थे. भारत माता की जो तस्वीर आज हम देखते हैं, उसे 19वीं सदी के आखिरी समय में स्वाधीनता सेनानियों ने तैयार किया था. किरण चंद्र बनर्जी ने एक नाटक लिखा था जिसका टाइटल था, “भारत माता,’ इस नाटक का प्रदर्शन सन 1873 में किया गया था. यहीं से ’भारत माता की जय’ का नारा शुरू हुआ . सन् 1882 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ’आनंदमठ’ नामक उपन्यास में पहली बार ’वंदेमातरम’ यह गीत देश को दिया. भारत माता का एक तस्वीर में वर्णन करने का श्रेय अबनींद्रनाथ टैगोर को जाता है. उन्होंने भारत माता को चार भुजाओं वाली देवी दुर्गा के रूप की तरह दिखाते हुए एक पेंटिंग तैयार की थी. यह देवी एक हाथ में एक पुस्तिका पकड़े और गेरूए रंग के कपड़े पहने थी. इस तस्वीर ने उन दिनों देशवासियों की भावनाओं को देश की स्वाधीनता के लिए मजबूत करने का काम किया था. स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने इस पेंटिंग को और विस्तृत किया. उन्होंने भारत माता को हरियाली से भरी धरती पर खड़ा दिखाया, जिनके पीछे एक नीला आसमान था और उनके पैरों पर कमल के चार फूल थे. चार भुजाएं आध्यात्मिक ताकत का पर्याय बनीं. इसके बाद आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे सुब्रहमण्यम भारती ने भारत माता की व्याख्या गंगा की धरती के तौर पर की और भारत माता को शक्ति के तौर पर पहचाना. और भी कुछ दिलचस्प बातें हैं जैसे सन् 1936 में महात्मा गांधी ने वाराणसी स्थित काशी यूनिवर्सिटी में भारत माता के मंदिर का उद्घाटन किया था. हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद की ओर से एक भारत माता मंदिर का निर्माण वर्ष 1983 में किया गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस मंदिर का उद्घाटन किया था. भारतीय सेना को जोश देने वाला ’भारत माता की जय’ यह नारा अब भारतीय सेना का ध्येय वाक्य बन गया है.

लेकिन जब तुष्टीकरण की बात सामने आई तो सभी काँग्रेस के लोग, सारे तथाकथित वामपंथी ‘भारत माता की जय’ के विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं.

आचार्य गोविंददेव गिरी महाराज ने एक भाषण में कहा था कि ‘भारत माता की जय’ यह मात्र एक जयघोष नहीं है, यह भारतवर्ष को परमवैभव की अवस्था तक ले जाने का एक मंत्र है. हमें यह सोचना होगा कि इस मंत्र की सिद्धी कैसे करें ?

भारत माता की जय का मंत्र सिद्ध करने का एक सरल मार्ग इस देश को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने दिखाया है. इसे सिद्ध करने हेतु अपनी जीवन शैली को बदलना होगा. अपने निजी जीवन में जाति, पंथ, भाषा के संकुचित विचार को छोड़कर समरसता का भाव आचरण में लाने का अर्थ है भारत माता की जय. इस मंत्र की सिद्धि, निजी स्वार्थ को भुला कर देश और समाज के हित में सोचने का और क्रिया करने का अर्थ है भारत माता की जय की सिद्धि. देश और समाज पर आए हर संकट को झेलने के लिए तत्परता से स्वयंसूचना से ही तैयार हो जाने का अर्थ है भारत माता की जय मंत्र की सिद्धि! देश और समाज के हित के लिए अपना अहंकार, अपनी पहचान, अपना स्वार्थ सब भूलकर अग्रसर हो जाने में ही भारत माता की जय मंत्र की सिद्धि है.

संघ के एक गीत में कुछ पंक्तियाँ ऐसी हैं –

स्वतंत्रता को सार्थक करने, शक्ति का आधार चाहिए.

‘भारत माता की जय’ जैसे राष्ट्र की जयचेतना के मंत्र की सिद्धि के लिए संगठित शक्ति का आधार चाहिए. भारत माता की जय इस विषय में विवाद उत्पन्न होने पर रा. स्व. संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने जो विचार व्यक्त किए थे उनका स्मरण हर वक्त हमारे मन, मस्तिष्क में रहना चाहिए. उन्होंने कहा था कि, ‘हम सकारात्मक शक्ति इतनी बड़ी मात्रा में संगठित करें कि केवल भारतवर्ष में ही नहीं पूरे विश्व के लोग भारत माता की जय का जयघोष स्वयंस्फूर्ति से करें.’ ऐसी निर्णायक शक्ति का संचार देश में करने हेतु हम कितनी योग्यता, तत्परता और समर्पण के साथ अग्रसर होते हैं, इस पर सब कुछ निर्भर करता है.

लेखक – दिलीप धारुरकर

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Comments (3)

  • A.N. Singh

    In fact after Freedom country administration went in hands of wrong people which price we are paying now. very sad

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    • ashish tiwari

      Sir realy good article written by you,
      i am a law student at amity noida.
      your views and my own added views
      i will share with whom ever i meet
      please send a article in a week
      if posible
      Thank you

      Reply
  • Bhanu prakash

    I totally agree, but y we all allow to happen this. becz we all wait for others to react first and then follow. where as others come united and planned. we lack that.

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