‘मूर्तिमंत वात्सल्यता’ इस एक ही शब्द में वंदनीय उषाताई का वर्णन होता है – डॉ. मोहन भागवत जी Reviewed by Momizat on . नागपुर (विसंकें). ‘मूर्तिमंत वात्सल्यता’ इस एक ही शब्द में वंदनीय उषाताई का वर्णन होता है, जो भी उनके सान्निध्य में 05 मिनट भी रहा, उसको यह अनुभव जरूर आया होगा. नागपुर (विसंकें). ‘मूर्तिमंत वात्सल्यता’ इस एक ही शब्द में वंदनीय उषाताई का वर्णन होता है, जो भी उनके सान्निध्य में 05 मिनट भी रहा, उसको यह अनुभव जरूर आया होगा. Rating: 0
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‘मूर्तिमंत वात्सल्यता’ इस एक ही शब्द में वंदनीय उषाताई का वर्णन होता है – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर (विसंकें). ‘मूर्तिमंत वात्सल्यता’ इस एक ही शब्द में वंदनीय उषाताई का वर्णन होता है, जो भी उनके सान्निध्य में 05 मिनट भी रहा, उसको यह अनुभव जरूर आया होगा. इस शब्द के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने वं. उषाताई चाटी जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. राष्ट्र  सेविका समिति की तृतीय संचालिका वंदनीय उषाताई चाटी जी को श्रद्धांजलि देने हेतु श्रद्धांजलि सभा, नागपुर स्थित अहिल्या मंदिर के दांडेकर सभागृह में संपन्न हुई. सरसंघचालक जी ने कहा कि “वात्स्यल्यता यही उनकी विशेषता थी”. भारतीय महिलाओं में वात्सल्य का भाव यह प्रमुख बात है. उन्होंने इसी भाव से कितने ही लोगों को समिति कार्य में जोड़ा, प्रेरित किया है. आज संघ के स्वयंसेवक, समिति की सेविकाएं राष्ट्र पटल पर अनेक पद, प्रतिष्ठा, सम्मान प्राप्त कर रहे हैं. मैं जब एक घोषवादक के रूप में प्रथमत: उनसे मिला, बाबाजी चाटी उस समय संघ के घोष विभाग के प्रमुख थे तो हमारी बैठकें उनके घर में होती थीं. बैठक एक – डेढ़ घंटा चलती थी, मात्र उसके बाद उषाताई के हाथ का गोला भात खाना यह अपूर्व आनंद की बात हम सबके लिये होती थी. कार्यकर्ता का परिवार के साथ कितना सहज प्रेम भाव रहना चाहिये, इसका उदाहरण हमें उनके जीवन से मिलता है. संघ/समिति कार्य की वास्तविकता को देखना है तो वह उषाताई के जीवन से हमें मिलता है. पूर्वांचल का दायित्व निभाते समय यहाँ नागपुर में उन्होंने पूर्वांचल की बेटियों के लिए छात्रावास खोला. इन बालिकाओं को अपने स्नेहभाव के आंचल में सुसंस्कारित किया. प्रमुख संचालिका के नाते कितना प्रवास उन्होंने किया होगा, हर कठिन परिस्थिति में भी इस कार्य को आगे बढ़ाया. गान गीत उनका सहज स्वभाव था. वो इतने ऊँचे स्थान पर थीं, पर उनके बारे में जानकारी उनसे नहीं मिलती. खुद सूर्य होते हुये भी खुद को छिपाती थीं, स्वयं प्रकाश देते हुये भी स्वयं अप्रकाशित रहतीं. व्यक्तित्व के परे होकर अपने कार्य के तत्व के अनुरूप स्वयं को ढालते रहना और उसमें एकाकार होना, यह हमें उषाताई के जीवन को देखकर पता चलता है. उनके सान्निध्य का क्षण क्षण का चिंतन करें, स्मरण करें, उस क्षण का आनंद भी लें. उनके व्यक्तित्व का लोप हो गया है, लेकिन उनका कृतित्व वर्धिष्णु है. समिति की प्रमुख संचालिका शान्ताका जी ने श्रद्धांजलि भाषण में कहा कि उनका नाम ही उषा था, उसका मतलब प्रकाश की पूर्व सूचना देने वाली. सकारात्मकता उनके जीवन का स्थाई भाव था. उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति सकारात्मकता का अनुभव करता था, उनसे एक पॉजिटिव एनर्जी/ऊर्जा मिलती थी. कर्नाटक बंगलुरु में उनका प्रथम प्रवास मेरे साथ हुआ. उनकी साधारण साड़ी, पहनावा देखकर प्रिंसिपल आश्चर्यचकित हुए, उनका कॉलेज की छात्राओं के साथ वार्तालाप सहज और प्रभावी रहा. सुदूर पूर्वांचल के सिल्चर – हाफलोंग प्रवास पर उनकी दृढ़ता और अपने कार्य के प्रति श्रद्धा भाव का अनुभव हुआ. मन में संकल्प शक्ति, कोमल स्वभाव, मातृ हृदय मन कठिन परिस्थिति में कठिन बन जाता  था. मंच पर देवनाथ मठ के प्रमुख वंदनीय जीतेन्द्र नाथ महाराज, वर्तमान प्रमुख संचालिका शान्ताका जी उपस्थित थीं. नागपुर की अनेक संस्थाओं ने उषाताई को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. अनेक गणमान्य व्यक्तियों लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन जी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस जी, भैय्यूजी महाराज इंदौर, अमेरिका से समिति की सेविका दीपा पाठक जी के सन्देशों का वाचन किया गया. प्रमुख कार्यवाहिका सीता अन्न्दनम, साध्वी ऋतंभरा दीदी, गुरूकुलम की स्वामी ब्रम्ह प्रकाशानंदा जी सभा में उपस्थित रहे.

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