राष्ट्रवाद वाद नहीं, भाव है – हितेश शंकर जी Reviewed by Momizat on . कोलकाता. पाञ्चजन्य साप्ताहिक के संपादक हितेश शंकर जी ने कहा कि स्याही और संस्कार के बीच सेतु का नाम है आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री. पूंजीवाद, समाजवाद की तरह राष कोलकाता. पाञ्चजन्य साप्ताहिक के संपादक हितेश शंकर जी ने कहा कि स्याही और संस्कार के बीच सेतु का नाम है आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री. पूंजीवाद, समाजवाद की तरह राष Rating: 0
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राष्ट्रवाद वाद नहीं, भाव है – हितेश शंकर जी

Photo 29.5कोलकाता. पाञ्चजन्य साप्ताहिक के संपादक हितेश शंकर जी ने कहा कि स्याही और संस्कार के बीच सेतु का नाम है आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री. पूंजीवाद, समाजवाद की तरह राष्ट्रवाद कोई वाद नहीं है, क्योंकि अन्य के साथ विवाद हो सकता है, लेकिन राष्ट्र सदैव विवाद रहित होता है. राष्ट्रवाद के स्थान पर सही शब्द है राष्ट्रभाव. पत्रकारिता में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, भारत की माटी के प्रति लगाव की जो निष्ठा आजादी के पूर्व थी, उसमें अनवरत गिरावट आई है. मानवाधिकार के स्थान पर आज दानवाधिकार प्रबल हो गया है. हितेश शंकर स्थानीय महाजाति सदन एनेक्सी में आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री स्मृति व्याख्यान के ग्यारहवें आयोजन में “मीडिया और राष्ट्रवाद’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि पत्रकारिता पहले समर्पण थी, अब आत्मसमर्पण होती जा रही है. पत्रकार सरस्वती के साधक न होकर लक्ष्मी के आराधक होते जा रहे हैं. राष्ट्र में, अपने प्रेरक पुरुषों से जुड़ाव का भाव कम हो गया है. पेशे में “पैशन’ और “मिशन’ पुन: जागृत करना आज की आवश्यकता है. पत्रकारों को संस्कारित होने की अनिवार्यता पर भी बल दिया. उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार असीम कुमार मित्र द्वारा व्याख्यायित चार सी (क्राईम, क्रिकेट, सिनेमा और सेलिब्रिाटि) की प्रतिक्रिया स्वरूप कहा कि पत्रकारिता को आज कनेक्ट, क्रिएटिविटी और क्रेडिबिलिटी की आवश्यकता है. आम जनता से जुड़ाव, रचनात्मकता तथा विश्वसनीयता को केन्द्र में रखकर पत्रकारिता अपना खोया हुआ गौरव हासिल कर सकती है.

अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ पत्रकार असीम कुमार मित्र ने कहा कि बड़े उद्देश्य एवं आदर्श वाली हमारी पत्रकारिता आज गुमराह हो रही है. हमारे पुरखों ने राष्ट्रजागरण का जो बड़ा काम किया, उसके स्थान पर पत्रकारिता को स्वार्थ का जरिया बनाकर अनेक पत्रकार व्यावसायिक हो गये हैं, यह चिंता की बात है. पत्रकार पहले देश सेवक थे, परंतु कुछ पत्रकार आज देश-सेवन में लग गए है. देश-निर्माण हेतु समर्पित पत्रकारिता आज की जरूरत है.

पुस्तकालय के अध्यक्ष डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने स्वागत भाषण में आचार्य विष्णुकांत शास्त्री के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुये उनके द्वारा व्याख्यायित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्पष्टीकरण किया. मंच पर महावीर बजाज और मोहनलाल पारीक भी उपस्थित थे. कार्यक्रम  के आरंभ में वसुधा ने राम वंदना प्रस्तुत की, एवं आचार्य द्वारा रचित कविता “तुमको क्या जादू आता है’  की सस्वर प्रस्तुति दी. कार्यक्रम का संचालन योगेशराज उपाध्याय ने किया. पुस्तकालय की साहित्यमंत्री दुर्गा व्यास ने अतिथियों का धन्यवाद किया. समारोह में वरिष्ठ कवि अगम शर्मा के आकस्मिक निधन पर मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई.

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