राष्ट्रीय आकांक्षा है राम मंदिर निर्माण Reviewed by Momizat on . भारत की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा है कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य भाग नहीं है. नमाज़ के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है. वह खुले मैदान में भी की जा सकती है. और स भारत की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा है कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य भाग नहीं है. नमाज़ के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है. वह खुले मैदान में भी की जा सकती है. और स Rating: 0
You Are Here: Home » राष्ट्रीय आकांक्षा है राम मंदिर निर्माण

राष्ट्रीय आकांक्षा है राम मंदिर निर्माण

भारत की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा है कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य भाग नहीं है. नमाज़ के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं है. वह खुले मैदान में भी की जा सकती है.

और सन 1528 में मुग़ल आक्रामक बाबर को अयोध्या में मस्जिद बनानी भी थी तो अन्य कहीं पर भी वह बन सकती थी. मंदिर तोड़कर वहीं मस्जिद बनाना आवश्यक नहीं था. इस्लामिक स्कॉलर्स यह भी कहते हैं कि ज़बरदस्ती या बलपूर्वक कब्ज़ा की हुई जमीन या भवन में नमाज़ अल्लाह को क़बूल नहीं होती है.

इसलिए अयोध्या का क्षेत्र जीतने के बाद रामजन्म भूमि मंदिर को ध्वस्त कर, आक्रामक बाबर के वज़ीर का वहीं पर मस्जिद नुमा ढाँचा खड़ा करने का कृत्य ना इस्लामिक था ना ही धार्मिक. उसे केवल हिन्दुओं का अपमान करना था.

प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण हेतु, ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विरोध के बावजूद, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी स्वीकृति दी थी और 11 मई, 1951 को वे आए भी थे. उस समय दिया उनका भाषण बहुत महत्वपूर्ण है.

भारत के स्वतंत्र होने के साथ ही भारत के सांस्कृतिक गौरव चिन्हों को पुनर्स्थापित करना और करोड़ों लोगों के श्रद्धा के केंद्र ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को ले कर राष्ट्रीय दृष्टि कैसी होनी चाहिए, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का निम्नलिखित भाषण है. महात्मा गांधी जी का ‘रामराज्य’ का स्वप्न जिस राजा रामचन्द्र के कारण था, उस श्रीराम की पवित्र जन्मस्थली पर उनके मंदिर को ध्वस्त करने के अपमान को निरस्त कर उनका भव्य मंदिर वहीं बनाने के संकल्प को राष्ट्रीय दृष्टि से कैसे देखना चाहिए, यह इस भाषण से स्पष्ट होता है.

राष्ट्रपति ने कहा –

“बहनों और भाइयों,

हमारे शास्त्र में श्री सोमनाथ जी को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक माना गया है, और इसलिए पुरातन काल में भारत की समृद्धि, श्रद्धा और संस्कृति का प्रतीक भगवान सोमनाथ का यह मंदिर था.

……….दूर दूर तक तथा देश देश में इसके अतुलनीय वैभव की ख्याति फैली हुई थी. किंतु जातीय श्रद्धा का बाह्य प्रतीक चाहे विध्वंस किया जा सके पर उसका स्रोत तो कभी टूट नहीं सकता. यही कारण है कि सब विपत्तियाँ पड़ने पर भी भारत के लोगों के हृदय में भगवान सोमनाथ के इस मंदिर के प्रति श्रद्धा बनी रही है. और उनका यह स्वप्न बराबर रहा कि वे इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुनः कर दे और समय समय पर वे ऐसा करते भी रहे और आज ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोद्धार के पश्चात इसके प्रांगण में भारत के कोने कोने से आए हुए अनेक नर नारियों का कलरव फिर सुनवाई दे रहा है.

……….सोमनाथ का यह मंदिर आज फिर अपना मस्तक ऊँचा कर संसार के सामने यह घोषित कर रहा है कि जिसे जनता प्यार करती है, जिसके लिए जनता के हृदय में अक्षय श्रद्धा और स्नेह है, उसे संसार में कोई भी मिटा नहीं सकता. आज इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुनः हो रही है और जब तक इसका आधार जनता के हृदय में बना रहेगा, तब तक यह मंदिर अमर रहेगा.

इस पुनीत, पावन, ऐतिहासिक अवसर पर हम सब के लिए यह उचित है कि हम धर्म के इस महान तत्व को समझ लें कि भगवान की सत्य की झाँक पाने के लिए कोई एक ही मार्ग मनुष्य के लिए अनिवार्य नहीं है.

………. दुर्भाग्यवश धर्म और जीवन के इस तथ्य को विभिन्न युगों और विभिन्न जातियों में ठीक ठीक नहीं अपनाया गया और इसी कारण धर्म के नाम पर संसार के विभिन्न देशों और विभिन्न जातियों में अत्यंत विनाशकारी और वीभत्स संघर्ष और युद्ध हुए. धार्मिक असहिष्णुता से सिवाय विद्वेष और अनाचार बढ़ने के अतिरिक्त और कोई फल नहीं होता है – यही इतिहास की शिक्षा है और इसको हम सबको गाँठ बाँध रखना चाहिए. हमारे देश में इस बात की आज विशेष आवश्यकता है कि हम में से प्रत्येक यह समझ ले कि आज हमारे देश में जितने सम्प्रदाय और समुदाय हैं, उन सब के प्रति हमें समता और आदर का व्यवहार करना है. क्योंकि ऐसा करने में हमारी सारी जाति और देश का तथा प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण निहित है. इसी विश्वास और श्रद्धा के कारण हमारे भारतीय संघ ने धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनायी है और इस बात का आश्वासन दिया है कि इस देश में बसने वाले प्रत्येक सम्प्रदाय के लोगों को राज्य की ओर से एक समान सुविधाएँ प्राप्त होंगी.

……….इस पुनीत अवसर पर हम सब के लिए यह उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हमने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन साधारण के उस समृद्धि मंदिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे, जिस समृद्धि मंदिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुरातन मंदिर था. उस ऐतिहासिक काल में हमारा देश जगत का औद्योगिक केंद्र था. वहाँ के बने हुए माल से लदे हुए कारवाँ दूर-दूर देशों को जाते थे. और संसार का चाँदी-सोना इस देश में अत्यधिक मात्रा में खिंचा चला आता था. हमारा निर्यात उस युग में बहुत था और आयात बहुत कम. इसलिए भारत उस युग में स्वर्ण और चाँदी का भंडार बना हुआ था. आज जिस प्रकार समृद्ध देशों के तहखाने में संसार का स्वर्ण पर्याप्त मात्रा में पड़ा रहता है, उसी प्रकार शताब्दियों पूर्व हमारे देश में संसार के स्वर्ण का अधिक भाग हमारे देवस्थानों में होता था. मैं समझता हूँ कि भगवान सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण उसी दिन पूरा होगा, जिस दिन न केवल इस प्रस्तर की बुनियाद पर यह भव्य भवन खड़ा हो गया होगा, वरन भारत की उस समृद्धि का भी भवन तैयार हो गया होगा जिसका प्रतीक वह पुरातन सोमनाथ का मंदिर था. साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक भी मेरी समझ में पूरा नहीं होगा, जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊँचा न हो जाए कि यदि कोई वर्तमान अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे तो हमारी संस्कृति के बारे में आज की दुनिया के मुक़ाबले में वही भाव प्रकट किए थे.

नव निर्माण का यह यज्ञ स्वर्गीय वल्लभ भाई पटेल ने आरम्भ किया था. भारत की विच्छिन्नता को पुनः एक और अखंड करने में उनका निर्णायक हाथ था. और उनके हृदय में यह आकांक्षा उत्पन्न हुई थी कि नव निर्माण के प्रतीक स्वरूप भारत की पुरातन श्रद्धा का यह प्रतीक फिर से निर्मित किया जाए. वह स्वप्न भगवान की कृपा से आज एक सीमा तक पूरा हो गया है, किंतु वह पूर्णरूपेण उसी समय पूरा हो सकेगा जब भारत के जनजीवन का वैसा ही सुंदर मंदिर बन गया होगा जैसा भगवान का यह मंदिर है. जय भारत.”

इस भाषण में ऐसा आपत्तिजनक ऐसा क्या था कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने राष्ट्रपति के इस भाषण को सरकारी रिकार्ड में नहीं लेने दिया. नेहरू जी की अनुदार दृष्टि और एकाधिकार वृत्ति का ही यहाँ प्रदर्शन होता है. यह भारत की भारतीय अवधारणा और भारत की अभारतीय अवधारणा के बीच संघर्ष का उदाहरण है. भारत की आज़ादी के साथ ही यह अवधारणाओं का संघर्ष चल पड़ा है. भारत के वामपंथी नेहरूजी की आड़ में इस अभारतीय अवधारणाओं को समाज जीवन के हर क्षेत्र में थोपने का, प्रस्थापित करने का प्रयास करते रहे. इस कारण भारत का ‘भारतत्व’ पूर्ण पुरुषार्थ के साथ प्रकट नहीं हो सका.

करोड़ों (हिन्दू और मुस्लिम) भारतीयों की अयोध्या में श्रीराम का भव्य मंदिर बनाने की राष्ट्रीय आकांक्षा का कुछ लोगों द्वारा विरोध भी इन दो अवधारणाओं के बीच का संघर्ष ही है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद की दृष्टि से सोमनाथ के मंदिर को भारत के सांस्कृतिक और आर्थिक गौरव से जोड़ना और वैसी ही आर्थिक समृद्धि प्राप्त होने के साथ मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य पूर्ण होगा, यह कहना बहुत महत्व पूर्ण है. इसी तरह भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान के आधार पर राष्ट्रीय चरित्र के साथ महात्मा गांधी जी की ‘रामराज्य’ की कल्पना को साकार करने के संकल्प को साकार करने के साथ अयोध्या में भव्य राम मंदिर के पुनर्निर्माण को जोड़ना यह भारत के गौरव के साथ भारत का पुरुषार्थ प्रकट होने में सहायक होगा.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

About The Author

Number of Entries : 4792

Leave a Comment

Scroll to top