राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष : अयोध्या आंदोलन – 10 Reviewed by Momizat on . राष्ट्रवादी मुस्लिम सरदार और धूर्त अंग्रेज औरंगजेब के पश्चात् कुछ समय तो शांति से कटा, परन्तु धर्मान्ध मुस्लिम नवाबों के अहम के कारण यह विवाद सुलझने के स्थान पर राष्ट्रवादी मुस्लिम सरदार और धूर्त अंग्रेज औरंगजेब के पश्चात् कुछ समय तो शांति से कटा, परन्तु धर्मान्ध मुस्लिम नवाबों के अहम के कारण यह विवाद सुलझने के स्थान पर Rating: 0
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राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष : अयोध्या आंदोलन – 10

राष्ट्रवादी मुस्लिम सरदार और धूर्त अंग्रेज

औरंगजेब के पश्चात् कुछ समय तो शांति से कटा, परन्तु धर्मान्ध मुस्लिम नवाबों के अहम के कारण यह विवाद सुलझने के स्थान पर उलझता चला गया. हिन्दुओं ने एक दिन भी मंदिर पर अपने अधिकार को नहीं छोड़ा. एक कालखंड ऐसा भी आया जब हिन्दू मुस्लिम सद्भाव का वातावरण बना. सन् 1789 में महाराष्ट्र के एक सशक्त हिन्दू राजा महादजी सिंधिया ने दिल्ली पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की. मुगल शासक शाह आलम ने महादजी के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाना मान लिया.

शाह आलम ने गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और 1790 में मथुरा, वृंदावन और काशी के तीर्थस्थल हिन्दुओं को सौंप दिए गए. इसके कुछ ही समय पश्चात् हिन्दू योद्धा नाना फणनवीस के आग्रह पर श्रीराम जन्मभूमि को भी हिन्दुओं को वापस सौंपने की तैयारी शाह आलम ने कर ली. परन्तु हिन्दू समाज और राष्ट्र ने अभी और परीक्षा देनी थी. सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम पराजय में बदल गया. शाह आलम और नाना फणनवीस की मृत्यु से यह राष्ट्रीय कार्य सम्पन्न नहीं हो सका. दिल्ली की सत्ता पर अब अंग्रेजों ने अपनी कुटिल चालों से पूर्ण अधिकार कर लिया.

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के एक देशभक्त मुस्लिम नेता सरदार अमीर अली खाँ ने फैजाबाद अयोध्या के सभी मुसलमानों का एक सम्मेलन आयोजित करके उन्हें समझाया – ‘हम सभी मुसलमान विदेशियों के वंशज नहीं हैं, हम भारतीय हैं. हिन्दू और मुसलमान भाई-भाई हैं. मजहब अलग होने से क्या होता है? हम आज भी कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से खदेड़ने की कोशिश कर रहे हैं. हमने मिलकर तलवार उठाई है. रामजन्मभूमि हिन्दुओं का श्रद्धास्थान है. हम सब स्वेच्छा से उसे हिन्दुओं को वापस कर 329 वर्ष पहले की भूल को दुरस्त करें’.

अमीर अली खाँ की इस अपील का असर हुआ. मुस्लिम समाज राष्ट्र की मुख्यधारा में आने को उत्सुक था. सदियों पूर्व बिछड़े भाई एक दूसरे के गले लगने ही वाले थे कि धूर्त अंग्रेजों ने दोनों को कुटिलता से अलग करके दोनों के हाथों में फिर खंजर पकड़ा दिए. हिन्दू और मुसलमानों के मिलन से अंग्रेज शासक घबरा गए थे. उन्हें अपनी फूट डालो और राज करो की पापमय नीति का जहर अपने ही गले में उतरता दिखाई दिया. अंग्रेजों की इसी पतली हालत का अनुमान कर्नल मार्टिन की दिल्ली गजट की रिपोर्ट में मिलता है – ‘‘अयोध्या की बाबरी मस्जिद मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं को वापस दिए जाने की खबर सुनकर हम लोगों में घबराहट फैल गई और यह विश्वास हो गया कि हिन्दुस्तान से अब अंग्रेज खत्म हो जाएंगे. लेकिन अच्छा हुआ कि गदर का पासा पलट गया और अमीर अली तथा बलवाई बाबा रामचरण दास को फांसी पर लटका दिया गया. इसके बाद से फैजाबाद जिले में हमारा प्रभाव जम गया. क्योंकि गौंडा का राजा देवी बक्श सिंह पहले ही फरार हो चुका था. इस काम में राजा मानसिंह मेहदीना वाले ने हमारी बड़ी मदद की’’.

अंग्रेजी शासन काल में योजनाबद्ध तरीके से हिन्दू और मुसलमान में भेद उत्पन्न करके पहले से पड़ी इस दीवार को और गहरा कर दिया गया. अंग्रेजों की इस विभाजक नीति ने मुसलमानों को एक भिन्न राष्ट्र के रूप में खड़ा कर दिया. विदेशी मुसलमानों ने बलात धर्मान्तरण द्वारा हिन्दू समाज में से ही मुस्लिम श्रेणी खड़ी की और अंग्रेजों ने इस मुस्लिम श्रेणी के अहम को जागृत करके उन्हें भारत की राष्ट्रीय धारा से अलग कर दिया. परिणामस्वरूप मुस्लिम लीग का जन्म हुआ. जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र की मांग की और अंग्रेज सरकार ने पाकिस्तान की मांग स्वीकार करके सदियों पुराने राष्ट्र के टुकड़े कर दिए, कांग्रेस के नेताओं ने भी इस पर मोहर लगा दी.

इसी प्रकार हिन्दू मुसलमानों का विभाजन करके अंग्रेजों ने दोनों के एकरस होते हुए उस प्रयास को भी दफन कर दिया, जिसे मुस्लिम सरदार अमीर अली खाँ ने यह कहकर प्रारम्भ किया था कि -‘जन्मभूमि मंदिर हिन्दुओं का है, इसे उन्हें ही सौंप देंगे’. अंग्रेजों ने हिन्दू मुसलमानों के इस जन्मभूमि मुक्ति के संयुक्त अभियान को विफल कर दिया. दिल्ली गजेटियर के पृष्ठ 62 पर स्पष्ट लिखा है – ‘‘इसके पहले हिन्दू और मुसलमान एक ही इमारत में आराधना किया करते थे. लेकिन 1857 के गदर के समय मस्जिद के चारों तरफ एक घेरा डाल दिया गया. क्योंकि हिन्दुओं के लिए मस्जिद के भीतर जाना मना था. इसलिए वह अपने नये बनाए चबूतरे पर ही पूजा अर्चना करने लगे’’.

ब्रिटिश सरकार ने यद्यपि जन्मभूमि के भी विभाजन का षड्यंत्र किया, परन्तु हिन्दू समाज ने इस कालखंड में भी मंदिर मुक्ति के संघर्ष को विराम नहीं दिया. सन् 1912 और 1934 में हिन्दुओं ने दो बार फिर इस मंदिर को अपने अधिकार में लेने के लिए प्रबल आक्रमण किए. दूसरे आक्रमण के समय तो हिन्दुओं ने इस तथाकथित नकली मस्जिद को नष्टप्राय कर दिया. बाद में फैजाबाद के डिप्टी कमिश्नर जे.पी. निकलसन ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मुसलमानों को प्रसन्न करने हेतु इस नकली मस्जिद का जीर्णोद्धार करा दिया. परन्तु मुसलमानों द्वारा नमाज पढ़ना पूर्णतः बंद हो गया. हिन्दुओं के द्वारा पूजा-अर्चना के कार्यक्रम चलते रहे. इस तरह हिन्दू समाज के द्वारा पूजा इत्यादि के कार्यक्रम भी चलते रहे और हिन्दू सैनिकों द्वारा जन्मभूमि को पूर्णतया मुक्त करवाने के अभियान भी चलते रहे.

नरेंद्र सहगल

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