राष्ट्र के निर्माण में जनजातीय समाज का योगदान भी अहम – दत्तात्रेय होसबले जी Reviewed by Momizat on . रांची. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने प्रज्ञा प्रवाह के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के निर्माण में जितना कथित सभ्य रांची. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने प्रज्ञा प्रवाह के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के निर्माण में जितना कथित सभ्य Rating: 0
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राष्ट्र के निर्माण में जनजातीय समाज का योगदान भी अहम – दत्तात्रेय होसबले जी

रांची. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने प्रज्ञा प्रवाह के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के निर्माण में जितना कथित सभ्य समाज का योगदान है, उतना ही जनजातीय समाज का भी. उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता पर कहा कि जो नगर में रहे, वे नागरिक कहलाए, गांव में रहने वाले ग्रामीण और जंगल में रहने वाले जनजातीय. इन सबका योगदान राष्ट्र निर्माण में है. राष्ट्र और राष्ट्रीयता के मुद्दे पर कहा कि कुछ लोग इस पर प्रश्न उठा रहे हैं. वे आजादी के सत्तर सालों के बाद भी मानसिक औपनिवेशिकवाद के शिकार हैं. सह सरकार्यवाह जी शनिवार को होटवार स्थित खेलगांव के बिरसा स्टेडियम में प्रज्ञा प्रवाह की गोष्ठी में संबोधित कर रहे थे. गोष्ठी का विषय था – ‘केरल में कम्युनिस्ट आतंक बनाम लोकतंत्र का भविष्य’.

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि पश्चिम की अवधारणा के अनुरूप हम अपने राष्ट्र को नहीं देख सकते. उनकी अवधारणा अलग है. भारत में राष्ट्र मनुष्य को कर्म की प्रेरणा देने वाली ईकाई है. राष्ट्रीयता की भावना से ही लोगों में एकता आती है. आज देश में पहचान और अस्मिता के अनेक प्रश्न खड़े हो रहे हैं. यह प्रश्न जानबूझकर खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन अपने देश में कई अस्मिता के लोग साथ-साथ रहते आए हैं. कहीं कोई विरोध नहीं. राष्ट्र के लिए अस्मिता बाधक नहीं है.

उन्होंने कहा कि देश स्वतंत्र तो हो गया, लेकिन राष्ट्र प्रकट नहीं हुआ. सत्य और सत्व उजागर होना चाहिए था, लेकिन आजादी के बाद यह हो नहीं पाया. गुलामी ने हमें शिथिल कर दिया था. जैसे वृक्ष एक समय बाद बूढ़ा होकर खत्म हो जाता है, वैसा ही अपने देश के साथ हुआ. लेकिन अब समय आ गया है कि हम फिर से उठ खड़े हों. अपने देश के गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित करें. भारत के प्रति घृणा रखने का काम नव अंग्रेजवाद ने किया. भारत को जो 70-80 सालों में करना चाहिए था, नहीं कर पाया. अब इस कार्य को प्रज्ञा प्रवाह ने अपने हाथ में लिया है. भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, संस्कृति, सभ्यता को स्थापित करना और गुलामी की मानसिकता को दूर करना ही इसका उद्देश्य है. इसी के मद्देनजर भोपाल में 11 महीने पहले लोक मंथन का कार्यक्रम हुआ था. उसमें जो विचार आया, उसे दो पुस्तकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है. हर दो साल में ऐसे कार्यक्रम होंगे.

दो पुस्तकों का लोकार्पण

इस मौके पर भोपाल में हुए कार्यक्रम से छनकर आए विचारों की दो पुस्तकों एवं एक काफी टेबल बुक का लोकार्पण केंद्रीय विवि के कुलपति डॉ. नंदकुमार यादव जी, सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी, कनार्टक विधानपरिषद के सदस्य पीवी कृष्ण भट्ट आदि ने किया. गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति नंदकुमार जी यादव ने कहा कि काफी ज्ञानवर्धक यह सत्र रहा है. दिमाग को काफी खुराक मिली. नई चीजों को जानने का मौका मिला. औपनिवेशिक शक्तियां राष्ट्र के सामने गंभीर चुनौतियां हैं, जिनका सामना हमें करना है. कार्यक्रम में देशभर से आए प्रतिनिधि शामिल थे.

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