लोकतंत्र में अधिकार के साथ-साथ स्वनियमन का दायित्व भी अंगीकार करना चाहिए – दत्तात्रेय होसबले जी Reviewed by Momizat on . लखनऊ (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि बृजमंडल के केशव और आधुनिक केशव के कर्म में कोई अंतर नहीं है. धर्म की स्थ लखनऊ (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि बृजमंडल के केशव और आधुनिक केशव के कर्म में कोई अंतर नहीं है. धर्म की स्थ Rating: 0
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लोकतंत्र में अधिकार के साथ-साथ स्वनियमन का दायित्व भी अंगीकार करना चाहिए – दत्तात्रेय होसबले जी

लखनऊ (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने कहा कि बृजमंडल के केशव और आधुनिक केशव के कर्म में कोई अंतर नहीं है. धर्म की स्थापना के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए संघे शक्ति कलियुगे अर्थात कलियुग में वह संघ शक्ति के रूप में आए. भारत भूमि से इस विचार को बढ़ाया जाता रहा है. राष्ट्र को संगठित करके उच्च शिखर पर आगे बढ़ाना है. राष्ट्र को मजबूत करके बरगद की तरह हम आगे बढ़ें. सभी समाज सभी युग में संचार के किसी न किसी माध्यम को अपनाता रहा है. लोकहित के लिए सभी युगों में सही सूचनाएं पहुंचाना मीडिया का उद्देश्य होना चाहिए. संवाद और प्रचार अलग-अलग अवधारणाएं हैं. संवाद प्रक्रिया विचार पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है. सह सरकार्यवाह जी 16 अगस्त, बुधवार को लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान और प्रेरणा जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान की ओर से आयोजित प्रबोधन कार्यक्रम के दौरान बतौर विशिष्ट अतिथि संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता एक दोराहे पर है. पत्रकारिता मिशन और प्रोफेशन से होते हुए कमीशन की ओर बढ़ रही है. भारत में सहभागी, सहगामी और समन्वय लोकतंत्र है. पत्रों में अलग-अलग आवश्यकता के हिसाब से अलग उम्र के लिए अलग विशेषांक निकाले जा रहे हैं. मीडिया के दायित्ववान लोगों को स्वतः नियमन लाने का प्रयास करना है. लोकतंत्र में अधिकार के साथ साथ स्वनियमन का दायित्व भी अंगीकार करना चाहिए. पत्रकारिता के अंदर जनभावना, जन सहभागिता को बढ़ाने की जरूरत है. संवादहीनता के कारण कभी-कभी ठीक तरीके से सत्य बाहर नहीं आ पाता है. मीडिया में जो बोलना है, वो बोलना है, चाहे प्राण ही क्यों न चले जाएं.

कार्यक्रम में ‘अंत्योदय की ओर’ विषय पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ जी ने कहा कि यह वर्ष अंत्योदय और एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्मशताब्दी वर्ष है. केंद्र और राज्य सरकारें अंत्योदय को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं. अंत्योदय अपनी शाश्वतता को हर काल, परिस्थिति में प्रासंगिक बनाए रखेगा. जब इसे आरंभ किया गया, तब पूंजीवाद, साम्यवाद और समाजवाद के बीच जूझ रहा था. अंत्योदय का विचार उस जगह से चलकर यहां तक पहुंचा है. राहत राशि का चैक मिलने वालों के बैंक खाते नहीं थे, खाता खुलवाने के इससे पहले कोई प्रयास क्यों नहीं किए गए. उन्होंने कहा कि हमें आज़ादी से पहले के दो सौ वर्षों को भी पढञाना चाहिए. 57 से शुरू हुआ समर आज भी याद करने की जरूरत है. इतिहास से हमें सुखद ओर दुखद पक्ष को जानने की जरूरत है.  इस बार चार करोड़ कांवड़ यात्री थे, बिना किसी व्यवधान के सभी शिवभक्तों ने निर्विघ्न अपना संकल्प पूरा किया. अग़र धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटेंगे तो हर स्थान से हटेंगे. अगर सड़क पर नमाज़ हो सकती है तो सड़क पर शोभायात्रा क्यों नहीं निकल सकती.

उन्होंने कहा कि अगर हम संगठित रूप से अपनी हिम्मत का अहसास कराएं तो कोई टकराने की हिम्मत नहीं कर सकता. तिलक ने कहा था कि गणेश महोत्सव हर गांव में मनाया जाएगा. यदुवंशियों ने पुलिस थानों में कृष्ण जन्म तक के आयोजन बन्द कर दिए थे. दीनदयाल जी कहते हैं – भारत राम और कृष्ण से पहले से है. भारत के महापुरुषों ने देश को संगठित करने का कार्य किया है. आप हिन्दू कह दीजिए तो साम्प्रदायिक हो जाएंगे. नेपाल, फ़िजी, इंडोनेशिया आदि देशों में हिन्दू कहने पर लोग गौरव करते हैं.

केरल में वामपंथी हिंसा और मीडिया की भूमिका’ पर लेखिला अद्वैता काला जी ने कहा कि मैं मूलतः लेखिका हूं, पत्रकार नहीं. अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करने वालों ने केरल के सुजित को वीभत्स तरीके से मार दिया. साल भऱ में अब तक 14 स्वयंसेवकों की मौत हो चुकी है. राजेश इस हिंसा का तात्कालिक शिकार है. वामपंथी विचारधारा के शासन में अधिकतम हत्याएं हुईं हैं, पूरी दुनिया इस बात की गवाह है. संतोष, विमला को घर में जलाकर मारा गया. मुख्यमंत्री के गांव में संतोष को मारा गया, तब उनको याद नहीं आया. कथित सेक्युलर राज्य केरल में पुलिस एसोसिएशन की राजनीति में सहभागिता है.

संगोष्ठी में राजर्षि टण्डन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एमपी दुबे ने ‘जनसंचार में दूरस्थ शिक्षा में मीडिया का योगदान’ पर कहा कि भारत विद्वता और ज्ञान का अद्भुत आदिस्थल रहा है. देश में 70 सालों में शिक्षा में बदलाव लाने को कई कमीशन बने, सबने नैतिक मूल्यों के समावेश करने की बात कही. हम अपने परंपरागत ज्ञान और वैशिष्ट्य को भूल रहे हैं. आज शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी की भूमिका बदल गई है. छात्रों में नैतिक मूल्यों के समावेश को सेक्युलरवाद के नाम पर खारिज कर दिया गया.

इस मौके पर पूर्व प्रशासनिक अधिकारी लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक अशोक कुमार सिन्हा और केशव संवाद के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सुभाष सिंह को उनके सार्वजनिक जीवन में पत्रकारीय योगदान को लेकर सम्मानित किया गया.

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