वनवासी समुदाय के लिए काम करने वाली सुनीता गोडबोले जी ‘बाया कर्वे पुरस्कार’ से सम्मानित Reviewed by Momizat on . पुणे (विसंकें). छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता है. इसी क्षेत्र के वनवासी समुदाय के लिए पिछले 30 वर्षों से वनवासी कल्याण आश्रम का पुणे (विसंकें). छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता है. इसी क्षेत्र के वनवासी समुदाय के लिए पिछले 30 वर्षों से वनवासी कल्याण आश्रम का Rating: 0
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वनवासी समुदाय के लिए काम करने वाली सुनीता गोडबोले जी ‘बाया कर्वे पुरस्कार’ से सम्मानित

पुणे (विसंकें). छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता है. इसी क्षेत्र के वनवासी समुदाय के लिए पिछले 30 वर्षों से वनवासी कल्याण आश्रम का पूर्णकालिक कार्य करने वाली सुनीता गोडबोले जी को सामाजिक सेवा में उल्लेखनीय कार्य हेतु पुणे स्थित महर्षि कर्वे संस्था की ओर से ‘बाया कर्वे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया.

सुनीता गोडबोले जी मूलतः पुणे की हैं, युवावस्था में स्नातक की शिक्षा के दौरान ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के काम से परिचित हुईं और बाद में अभाविप के कार्य में सक्रिय हुई. सामाजिक कार्य करते हुए ही उन्होंने एम.एस.डब्लू. की शिक्षा प्राप्त कर पुणे में स्नेहदीप फाउंडेशन में नौकरी की. सामाजिक कार्य करना है तो ग्रामीण क्षेत्रों में ही, यह निश्चय कर उन्होंने वन क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया. आरंभ में रायगढ़ जिले के जांभिवली केंद्र पर वनवासी कल्याण आश्रम का पूर्णकालिक काम किया. वनवासी महिलाओं से संवाद कर उन्हें कल्याण आश्रम से जोड़ने का काम किया.

वनवासी इलाके में रहकर काम करने वाले डॉ. राम गोडबोले जी से विवाह के बाद 1990-2002 के दौरान बस्तर के आदिवासी कल्याण आश्रम में 12 साल काम करने का निर्णय किया. अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए दंतेवाडा जिले में बारसुर स्थित वनवासी लड़कियों के छात्रावास की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्होंने संभाली. वहीं वनवासियों की स्थानीय ‘गोंडी और हल्बी’ भाषाएं सीखीं. इससे वनवासी महिलाओं के साथ संवाद आसानी से होने लगा और इस परिसर में महिलाओं का संगठन धीरे-धीरे खड़ा हुआ. सन् 2002 से 2012 की अवधि में घरेलू कारणों से महाराष्ट्र वापिस आ गईं. इसी दौरान महाराष्ट्र के थाणे और पालघर तहसील में विक्रमगढ़ इलाके में वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से कार्य कर रही थीं. लेकिन 2012 में वे पुनः 2012 में बस्तर में आ गईं.

डॉ. राम और सुनीता गोडबोले दोनों वनवासी कल्याण आश्रम के बारसुर कार्यालय में रहकर दुर्गम वनवासी बस्तियों में जाकर स्थानीय महिला स्वास्थ्य सेविकाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक दिये (दीपक) बस्तर में प्रकाश के लिए जलाए जाते हैं. सुनीता जी ने सशक्त और सक्षम आधुनिक विकल्प के रूप में वनवासियों के घरों में पिछले तीन वर्षों में सौर दिये पहुंचाए. डॉ. राम गोडबोले भी अब पहले की तरह एक स्थान पर दवाखाना चलाने के बजाय गांव-गांव में स्वास्थ्य शिविर लगा रहे हैं. पुरस्कार प्राप्त करते हुए सुनीता गोडबोले जी ने कहा कि हम जहां काम करते हैं, उस इलाके में वनवासियों के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है. जो समाज अभी भी सारी बातों से वंचित है, उस समुदाय को विकास की मुख्यधारा में लाना चाहिए.

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