शाश्वत मूल्यों के प्रकाश में चलने वाली परम्परा के लिए ग्लास्नोस्त शब्द अप्रासंगिक है Reviewed by Momizat on . सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत की तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के पश्चात अपेक्षित बहस जनमाध्यमों में चल पड़ी है. अनेक लोगों ने इसका स्वागत किया है. कुछ लोगों ने जो कहा सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत की तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के पश्चात अपेक्षित बहस जनमाध्यमों में चल पड़ी है. अनेक लोगों ने इसका स्वागत किया है. कुछ लोगों ने जो कहा Rating: 0
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शाश्वत मूल्यों के प्रकाश में चलने वाली परम्परा के लिए ग्लास्नोस्त शब्द अप्रासंगिक है

सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत की तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के पश्चात अपेक्षित बहस जनमाध्यमों में चल पड़ी है. अनेक लोगों ने इसका स्वागत किया है. कुछ लोगों ने जो कहा गया उसकी प्रामाणिकता पर संदेह जताया है. कुछ ने यह सब नीचे ज़मीनी स्तर तक कैसे पहुँच पाएगा, इस की चर्चा की है या चिंता व्यक्त की है.

विभिन्न विषयों पर संघ के जिस दृष्टिकोण को सरसंघचालक ने रखा, वह कई लोगों को एकदम नया, क्रांतिकारी विचार लगा होगा. परंतु मुझे इस में से कोई भी बात ऐसी नहीं लगी, जिसकी संघ में किसी भी स्तर पर चर्चा ना हुई हो.

एक पत्रकार ने कहा कि इतने विविध विषयों पर सभी प्रश्न ले कर उनका स्पष्ट उत्तर सरसंघचालक देंगे ऐसा नहीं लग रहा था. कुछ लोगों को लगता है कि संघ में खुली चर्चा या संवाद के लिए कोई अवसर नहीं है. परंतु वास्तविकता है कि संघ में अनेक विषयों पर ख़ूब खुली बहस, चर्चा होती है. सरसंघचालक समेत सभी अखिल भारतीय अधिकारियों के प्रवास में प्रत्येक स्थान पर स्वयंसेवकों से, प्रबुद्ध नागरिकों से जिज्ञासा समाधान का कार्यक्रम अवश्य रहता है. संघ के बारे में जो दुष्प्रचार होता रहा उस के कारण बाहर के लोगों को ऐसा लगना स्वाभाविक था कि संघ में अब खुलापन आ रहा है, नए विचारों का स्वागत हो रहा है इसलिए किसी ने इसे ‘ग्लास्नोस्त’ की उपमा भी दी. विदेशी विचारों का या विरोधियों की शब्दावली का हमें ऐसा अभ्यास हो जाता है कि हम भी अनजाने में उनका उपयोग करने लगते हैं.

इसी तरह “ ग्लास्नोस्त” शब्द है. जिसका अर्थ सामाजिक मुद्दों पर खुली बहस से है. ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका, सामाजिक-आर्थिक खुलेपन की यह संकल्पनाएँ मूलतः रूसी भाषा से हैं. कम्युनिस्ट रूस की कठोर साम्यवादी व्यवस्था के पतन और विखंडन के समय यह संकल्पनाएँ चर्चा में आईं, जब बहुत वर्षों की व्यक्तिवादी, पोथीनिष्ठ तानाशाही व्यवस्था के बाद सामाजिक चर्चा में खुलापन और आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में सुधारों की बात की गयी. सिमेटिक मूल के विचारों की या विचारधाराओं की यह विशेषता रही है कि सोचने का काम एक व्यक्ति (या एक छोटा व्यक्ति समूह) ही करता है. उसका अनुसरण करना सभी के लिए बाध्यता है. इससे अलग सोचेंगे तो वह पंथद्रोह (blasphemy) होगा. इसकी कड़ी सज़ा भी तय है. रूस में कम्युनिस्ट क्रांति के नाम पर कुछ ऐसा ही हुआ था. चर्च ने यह  ईसाईयत (Christianity) के नाम पर शुरू किया था. ब्रूनो (Bruno) को ज़िन्दा जलाया गया. गैलीलिओ को कारावास सहना पड़ा. उनका अपराध इतना ही था कि चर्च की मान्यता के विपरीत उन्होंने कहा की पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है. कम्युनिस्ट रूस में और चीन में मार्क्स की पोथी के ख़िलाफ़ विचार रखने के कारण कितने ही लोगों को मृत्यु को स्वीकार करना पड़ा या वहाँ से भाग जाना पड़ा. ऐसे पोथीबंद विचारों का अँधेरा जहाँ था, जहाँ नया विचार प्रकट करने का सोच भी नहीं सकते वहाँ “ग्लास्नोस्त ”, नया विचार करने की सुबह का निश्चित ही महत्व है.

परंतु भारत में पोथीबंद विचारों का अंधकार नहीं था. देश – काल – परिस्थिति के अनुसार समाज को दिशा देने वाले, नयी राह बताने वाले संत, आध्यात्मिक पुरुष, समाज सुधारक यहाँ हमेशा होते आए है. और आते रहेंगे यह भारत की मान्यता है. आधुनिक काल ही लेंगे तो स्वामी दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, नारायण गुरु आदि अनेक नाम सामने आते हैं. सामाजिक सुधारकों को भी समाज ने मान्यता दी है. इसीलिए यूरोपियन मूल की विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता, जोकि ईसाई पादरी की बेटी थीं, ने लिखा है कि ब्रूनो यदि भारत में होता तो ज़िंदा जलाया नहीं जाता. पोथीबंद विचारों का अंधकार जहाँ है, वहाँ ‘ग्लास्नोस्त’ नयी बात है उसका स्वागत होना चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक आधार भारतीय चिंतन होने के कारण भारत की परम्परा के अनुसार संघ में खुली बहस हमेशा चलती है और अनेक नए सुझावों का स्वागत भी होता है. ऐसे कुछ अनुभव-उदाहरण जानने योग्य हैं :

मेरा जन्म ही संघ परिवार में हुआ है. मेरे पिताजी ने 18 वर्ष की आयु में 1941 में आजीवन संघ कार्य करने की प्रतिज्ञा ली है. वह आज भी उसका पालन कर रहे हैं. बचपन से ही शाखा में जाने का मेरा अनुभव है.  मैंने कभी संघ में मुसलमान या ईसाई के प्रति घृणा या तिरस्कार की बात नहीं सुनी. राष्ट्र विरोधी तत्वों का विरोध ( घृणा या तिरस्कार नहीं) जम कर होता देखा है. 1971 से मुझे एक शाखा का दायित्व मिला जो नागपुर में अजानी स्टेशन के सामने चलती थी. पास में ही सरकारी मेडिकल हॉस्पिटल के क्वॉर्टर थे. एक दिन 10-12 बच्चों का एक नया समूह शाखा में आया. सभी का परिचय हुआ, जिसमें आमिल खान और फ़िरोज़ खान ऐसे 7वीं  और 5वीं  में पढ़ने वाले दो भाई थे. शाखा में किसी मुस्लिम से मैं पहली बार मिल रहा था. दो दिन के बाद मैं उनके घर सम्पर्क के लिए गया. उन बच्चों के पिताजी, बशीरखान, एम्बुलेंस के ड्राइवर थे. मैंने अपना परिचय दिया और उनके बच्चे शाखा में दो दिन से आ रहे हैं, यह जानकारी दी. उन्होंने चाय के लिए कहा. मैं तब चाय नहीं पीता था. पर मुझे विचार आया कि मैं मना करूँगा तो वे मान बैठेंगे की हम मुसलमान है, इसलिए मना कर रहा है. इसलिए मैंने आधा कप चाय ली. चाय पीने का यह मेरा पहला अनुभव था. 10 वीं तक वे दोनों शाखा में नियमित आते थे. आमिल कबड्डी अच्छी खेलता था. संघ मुसलमानों का तिरस्कार करता है, उनको दुश्मन मानता है ऐसा संघ के बारे में दुष्प्रचार होता देख कर आश्चर्य होता था. संघ विरोधक, जिनका कार्य ही घृणा और तिरस्कार पर आधारित है, वे ही ऐसा झूठा और घृणित प्रचार कर सकते है.

मेरा प्रांत प्रचारक का दायित्व 1996  से 2006 तक था. अखिल भारतीय स्तर पर अनेक बैठकों में रहना हुआ. मुझे कोई नया विचार सूझता तो वह मैं सरकार्यवाह श्री शेषाद्रि जी से साँझा करता था. मुझे हमेशा बैठक में उसे चर्चा हेतु रखने के लिए वे प्रोत्साहित करते थे. पूजनीय रज्जू भैय्या सरसंघचालक थे. उन्होंने भी कभी मुझे नए विचार, सुझाव देने से रोका नहीं. हाँ, एक बार मुझे अपनी भाषा शालीन होनी चाहिए, ऐसा कह कर टोका अवश्य था.

संघ में कैसा खुलापन है, इसका एक अन्य स्पष्ट उदाहरण मुझे याद है. एक विभाग प्रचारक को कुछ समय के लिए भारत के बाहर चलने वाले हिंदू स्वयंसेवक संघ के कार्य का दायित्व मिला. हिंदू स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समान ही है, पर प्रार्थना अलग है. इस प्रचारक को वहाँ जाने के बाद ध्यान में आया कि भारत के संघ की प्रार्थना की दो महत्व की बातें वहाँ की प्रार्थना में नहीं है. जोड़नी चाहिए. जब उसने अपने निकटस्थ अधिकारी से यह कहा तो उसे जवाब मिला कि यह प्रार्थना माननीय भिड़ेजी ने बनाई है और पूजनीय श्री गुरुजी ने देखी है. वर्षों से चल रही है. इसलिए हमें ऐसा नहीं सोचना चाहिए. उसे यह संघ का उत्तर नहीं लगा. उसने जब श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को यह बताया तो  ठेंगड़ी जी ने कहा कि यह यदि सच है तो परिवर्तन कर कुछ जोड़ना चाहिए. जब यह बात भारत में संघ के अधिकारियों के ध्यान में लायी गयी तो इस पर विचार करने का निर्णय हुआ और सन 2000 से विश्व विभाग की 50 वर्षों से प्रचलित प्रार्थना में एक नया श्लोक जोड़ने का निर्णय हुआ. एक विभाग प्रचारक स्तर के कार्यकर्ता द्वारा सुझाव आने पर प्रार्थना जैसे गम्भीर विषय में चर्चा करते हुए सहज परिवर्तन करना यह संघ की कार्यपद्धति की शक्ति है और संघ में कितना खुलापन है इसका निदर्शक है.

संघ के एक जीवंत संगठन होने के नाते ऐसे परिवर्तन सहज है, संघ में ऐसी परम्परा भी है. इसलिए यहाँ ग्लास्नोस्त की आवश्यकता नहीं है. हाँ, इतना विशाल, व्यापक संगठन होने के कारण ऐसे परिवर्तन with letter and spirit नीचे तक समझाना और लागू करना इसमें समय और प्रयास लगता है. 1990 के बाद सेवा, सम्पर्क और प्रचार विभाग संघ में नए जुड़ गए, तब उसकी आवश्यकता और उपयोगिता नीचे तक समझाने में 5  से 10 साल लगे थे. नयी बातों का स्वीकार करने का विरोध नहीं पर चर्चा अवश्य होती है, प्रश्न पूछे जाते हैं, जो स्वभाविक है. 2015 में जब 85 वर्षों के बाद संघ के गणवेष में निकर बदल कर पैंट स्वीकार की गयी, तब भी निर्णय में सहमति लाने के लिए ५ वर्ष लगे और बाद में उसे स्वीकार किया गया, लागू भी किया गया.

इसलिए जहाँ पोथीबंद विचारों का अंधकार है वहाँ ‘ग्लास्नोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोईका’ का महत्व है, पर जहाँ सतत नया विचार होते रहता है, पुराने शाश्वत तत्त्वों के आधार पर नयी बातों का सहज स्वीकार होता है, वहाँ ना ‘ग्लास्नोस्त’ की, ना ‘पेरस्त्रोईका’ की आवश्यकता है.

प्रसिद्ध गुजराती लेखक श्री ध्रुव भट्ट की एक कविता की पंक्ति याद आती है –

रात्रि के जागरण तो पृथ्वी के होते हैं,

सूरज की तो रात ही कभी नहीं होती है.

इसी तर्ज़ पर –

पोथीबंद विचारों के अंधकार के लिए ग्लास्नोस्त का महत्त्व है, शाश्वत मूल्यों के प्रकाश में चलने वाली सतत खोज और अविष्कार की परम्परा के लिए ग्लास्नोस्त शब्द ही अप्रासंगिक (irrelevant) है.

डॉ. मनमोहन वैद्य

सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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