संघ का काम व्यक्ति को राष्ट्र सेवा और साधना के लिये तैयार करना है – विलास जी गोले Reviewed by Momizat on . भोपाल (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र शारीरिक प्रमुख विलास जी गोले ने कहा कि श्री पराड़कर जी से ग्वालियर में मेरा संपर्क एक कार्यकर्ता के नाते भोपाल (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र शारीरिक प्रमुख विलास जी गोले ने कहा कि श्री पराड़कर जी से ग्वालियर में मेरा संपर्क एक कार्यकर्ता के नाते Rating: 0
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संघ का काम व्यक्ति को राष्ट्र सेवा और साधना के लिये तैयार करना है – विलास जी गोले

भोपाल (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र शारीरिक प्रमुख विलास जी गोले ने कहा कि श्री पराड़कर जी से ग्वालियर में मेरा संपर्क एक कार्यकर्ता के नाते हुआ. जब वे शासकीय सेवा में थे. उस समय उन्होंने जो संघ के प्रति अपनी निष्ठा और लगाव दिखाया, उससे स्पष्ट है कि संघ के एक कार्यकर्ता का काम लोक संग्रह और लोक संस्कार देना है. उन्होंने कहा कि संघ का काम व्यक्ति को राष्ट्र सेवा और साधना के लिये तैयार करना है, इसके लिए उसमें वे सारे गुण आ जाने चाहिए, जिनसे राष्ट्र निर्माण की बाधाएं दूर हो सकें. पराड़कर के बारे में उन्होंने कहा कि श्रीधरजी लोगों के साथ पारिवारिक संबंध बनाने में भी महति भूमिका निभाते रहे. इसके साथ ही अखिल भारतीय साहित्य परिषद में बड़े दायित्व को भी उन्होंने संभाला, मामाजी के साथ में लेखन कार्य किया. महात्मा गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए विलास जी ने कहा कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था, इस तरह से संघ को नष्ट करने का भी प्रयास किया गया. लेकिन पराड़कर जैसे कर्मठ, निस्वार्थभाव से देश सेवा करने वाले सुधीजनों की देन है कि आज संघ संसारभर में फलफूल रहा है. विलास जी विस के मानसरोवर सभाकक्ष में वरिष्ठ साहित्यकर श्रीधर पराड़कर जी के सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे.

विस अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा जी ने कहा कि साहित्य में सबकुछ सही था, लेकिन वामपंथी विचारधारा ने सबकुछ बिगाड़ दिया. सही विचारों के साथ साहित्य सृजन करने से व्यक्ति और विचार दोनों का यहां सम्मान होता है, वही आज यहां हो रहा है. जब व्यक्ति और विचार दोनों ही महत्पूर्ण हों तो देश प्रगति की ओर बढ़ता है. श्रीधरजी में दोनों ही बातें हैं, वे अच्छे और सच्चे व्यक्ति हैं और संघ में रहकर उन्होंने उन लोगों को गढ़ने का काम किया जो समाज तथा देश को नई दिशा देने का काम कर रहे हैं. उनका लिखा साहित्य समाज को स्थापित करने वाला है. उनके भीतर संत के सारे गुण मौजूद हैं. सम्मान तो वास्तव में एक तरह की कृतज्ञता ही है, भले ही श्रीधरजी ने सम्मान नहीं करवाने का निर्णय लिया हो, लेकिन समिति ने भी तो अपना दायित्व निभाया है. रामायण में भी व्यक्ति के साथ समाज का वर्णन किया गया है कि उस समय समाज कृतज्ञ और गुणी था. इसलिए श्रीधरजी एक व्यक्ति के साथ ही एक बेहतर साहित्यकार हैं, यह बात अलग है कि वे अपने आप को साहित्यकार नहीं मानते हैं. उनके दीर्घायु होने की कामना भी की.

इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया, तत्पश्चात वंदेमातरम का गायन हुआ. कार्यक्रम में श्रीधर पराड़कर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण करते हुए एक किताब का विमोचन भी किया गया.

जो करना है, वो स्वयंसेवक करेगा – श्रीधर पराड़कर जी

कार्यक्रम में अपने सम्मान पर श्रीधर पराड़कर जी ने कहा कि जब डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की तो लोग कहते थे कि संघ क्या करेगा. तो डॉ. साहब कहते थे कि जो कुछ करना है वो तो स्वयं सेवक करेगा. और आप देख ही रहे हैं कि जहां देश का प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अब तो देश का राष्ट्रपति भी एक स्वयंसेवक बनने जा रहा है तो ऐसे में संघ की क्षमता का आंकलन किया जा सकता है. मेरा यह सम्मान जिसके लिए मैंने बहुत मनाही की, लेकिन ये लोग नहीं माने और अब मुझे लग रहा है कि जहां गुरू की निंदा हो, वहां नहीं रहना चाहिए. लेकिन जहां गुरू ही प्रशंसा करे तो वहां समझ नहीं आता कि क्या किया जाए. मैंने कुछ नहीं लिखा, और न ही मैं साहित्य परिषद में आने से पहले लेखक था, ये तो सब मुझसे कहा गया और मैंने लिख दिया. जहां तक संघ की समझ के बारे में कहूं तो भोपाल में शरद मेहरोत्रा जी मुझे लेकर आए और उन्होंने बताया कि संघ क्या है. उनके सरल जीवन को सभी जानते हैं. यहां तक कि केंसर का इलाज कराने के लिए भी वे भोपाल से बाहर नहीं गए, ताकि कोई संघ पर ये आरोप न लगा सके कि उनको आखिर समय में संघ ने छोड़ दिया. इसलिए मुझे भी राष्ट्रपति के हाथों जो सम्मान मिला, उसके 5 लाख रुपए मैंने साहित्य परिषद को दान कर दिए ताकि मेरे पास कुछ न रहे.

कार्यक्रम में सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री लालसिंह आर्य ने कहा कि जिनके सामने नौकरी छोटी और विचार बड़ा हो ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रनिर्माण की बात करते हैं. श्रीधरजी के सामने भी जब विचारों के आगे नौकरी आ गई तो उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी. श्रीधरजी ने हजारों कार्यकर्ताओं को गढ़ा है और साहित्य भी उसी दिशा में लिखा है. जहां उन्होंने 1857 के बारे में कलम चलाई है तो वहीं डॉ. अंबेडकर के समाजिक समरसता की भावना को भी आगे बढ़ाया है. उन्होंने कहा कि जब परिश्रम की पराकाष्ठा होती है तो इसका परिणाम ही इस तरह सम्मानित होता है.

 

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