संघ का प्रशिक्षण सेना से अधिक कठोर Reviewed by Momizat on . भोपाल. 18 मई से प्रारम्भ हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्रीष्मकालीन संघ शिक्षा वर्ग (व्दितीय वर्ष) का 7 जून को स्थानीय शारदा विहार सरस्वती शिशु मंदिर में समापन भोपाल. 18 मई से प्रारम्भ हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्रीष्मकालीन संघ शिक्षा वर्ग (व्दितीय वर्ष) का 7 जून को स्थानीय शारदा विहार सरस्वती शिशु मंदिर में समापन Rating: 0
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संघ का प्रशिक्षण सेना से अधिक कठोर

भोपाल. 18 मई से प्रारम्भ हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्रीष्मकालीन संघ शिक्षा वर्ग (व्दितीय वर्ष) का 7 जून को स्थानीय शारदा विहार सरस्वती शिशु मंदिर में समापन हुआ. स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रदर्शनों के साथ समारोह प्रारम्भ हुआ. समता, नियुद्ध, दण्डयुद्ध, घोष, सूर्य नमस्कार व सांघिक योग प्रदर्शन ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया.

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टीनेंट जनरल श्री मिलन ललित कुमार ने कहा कि जब भी देश पर कोई आपदा आई है, संघ के स्वयंसेवकों ने राहत पहुंचाई है. उन्होंने उल्लेख किया कि कई स्थानों पर तो स्वयं उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं के समय मेहनत, ईमानदारी और वफादारी से कार्य करते स्वयंसेवकों को देखा है. उन्होंने कहा कि संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण सेना से कहीं अधिक कठोर है. वहां दबाव है तो यहाँ भावना और निष्ठा है, जो देश को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक है. उन्होंने प्रशिक्षार्थियों से आग्रह किया कि वे यहाँ से जाने के बाद सत्यनिष्ठा से कार्य करते हुए समाज के शेष लोगों को भी संघ से जोड़ने का प्रयत्न करें, क्योंकि आप लोग सही रास्ते पर हैं.

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अ.भा. प्रचारक प्रमुख श्री सुरेशचन्द्र जी ने संघ की स्थापना से लेकर आज तक किये गये संघ के समाजोपयोगी कार्यक्रमों व गतिविधियों की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि साम्यवाद का जन्म रूस की क्रान्ति के बाद 1917 में हुआ, इस्लाम 1436 वर्ष प्राचीन है तो ईसाइयत का जन्म 2014 वर्ष पूर्व हुआ. जबकि हिन्दू संस्कृति हिन्दू विचार अनादि काल से है, सनातन है. संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने अनुभव किया कि विभिन्न कारणों से यह सनातन संस्कृति कमजोर हो गई है, जिसे पुनः सशक्त करना न केवल देश के हित में है, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु आवश्यक है. केवल यही संस्कृति है जो सर्वे भवन्तु सुखिनः का उद्घोष करती है, जबकि अन्य विचार केवल अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये हिंसा और लोभ का मार्ग अपनाते हैं . यही बात जब स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के सामने रखी, तो सबने माना कि विश्व को बचाने का यही सर्वोत्तम मार्ग है.

संघ को गुपचुप कार्य करने वाला बताने के आरोप का खंडन करते हुए श्री सुरेश चन्द्र जी ने कहा कि यही एक संगठन है जो कार्यकर्ता को संस्कार खुले मैदान में देता है. जहां कुछ भी ढका-छुपा नहीं है. जीवन-पर्यन्त कार्य करने की एक पद्धति संघ संस्थापक ने विकसित की. व्यक्ति निर्माण का तंत्र है दैनिक शाखा. उन्होंने कहा कि निस्वार्थ बुद्धि से कार्य करने वाले दस हजार स्वयंसेवकों ने भारत विभाजन के समय अपना बलिदान दिया. हैदराबाद व कश्मीर रियासत आज भारत में है तो उसमें भी संघ की भूमिका है. दादरा नगर हवेली, गोवा मुक्ति संग्राम सब जगह संघ स्वयंसेवकों के बलिदान की यश-गाथायें हैं .

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