संघ को समझकर, फिर सहकार्य करने के लिए आगे आएं – डॉ. मोहन भागवत जी Reviewed by Momizat on . नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधता में एकता पर संघ का दृढ़ विशवास है. इस भूमी को माता मानने वाला हर व्यक् नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधता में एकता पर संघ का दृढ़ विशवास है. इस भूमी को माता मानने वाला हर व्यक् Rating: 0
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संघ को समझकर, फिर सहकार्य करने के लिए आगे आएं – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि विविधता में एकता पर संघ का दृढ़ विशवास है. इस भूमी को माता मानने वाला हर व्यक्ति भारतीय है. विविधता में एकता यही भारत की विशेषता है और यही संस्कृति है. सरसंघचालक नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समापन समारोह में संबोधित कर रहे थे. समारोह में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे.

“संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. दो बार कारवास भी गए. देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अनेक प्रयास किये. उनका क्रांतिकारियों के साथ सम्बन्ध था, समाज सुधारकों के साथ संबंध रहा. धर्म के प्रति जागरूकता से कार्य करने वालों धर्म मार्तण्ड से उनके अच्छे संबंध थे. उन्होंने इन सारे क्षेत्रों में कार्य किया, सफल भी रहे. परन्तु उन्हें यह ध्यान आया कि अनेक महापुरुषों द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन तो चलेंगे, लेकिन जब तक इस देश का मुख्य समाज संस्करों से युक्त बनकर नव चैतन्य से भरकर संगठित होकर भारतमाता को फिर विश्व गुरु बनाने का संकल्प नहीं लेता और जब तक पूर्ण नहीं करता, तब तक संघ का काम चलता ही रहेगा. यही संघ का गंतव्य है.” 1925 से संघ बढ़ता जा रहा है. अनेक बाधाएं मार्ग में आईं, प्रतिकूल परिस्थिति बनीं, पर हमने इन सारी विपरीत बाधाओं को पार किया. अनुकूलता आई, ठीक है पर विश्राम हमें नहीं लेना है. जब तक भारत विश्व गुरु नहीं बनेगा, तब तक व्यक्ति निर्माण का संघ का कार्य चलता ही रहेगा.

सरसंघचालक जी ने कहा कि श्री प्रणव मुखर्जी जी की इस कार्यक्रम में उपस्थिति के बारे में अनेक वाद/विवाद हुए, जिसकी आवश्यकता नहीं थी. यह एक परंपरा है, प्रतिवर्ष की तरह कोई विशिष्ट व्यति यहाँ आकर कोई पाथेय देता है. संघ समाज का संगठन है. इसलिए आदरणीय प्रणव मुखर्जी के बारे में ऐसी चर्चाए नहीं होनी चहिए थीं.

इस वर्ष सारी दुनिया की नजरें इस कार्यक्रम को लेकर थीं. रेशमबाग स्थित मैदान पर सोत्साह सम्पन्न हुए कार्यक्रम का शुभारंभ ठीक 6:30 बजे हुआ. ध्वजारोहण, दंड प्रयोग, नियुद्ध प्रयोग, सांघिक समता, सांघिक गीत आदि का प्रदर्शन शिविरार्थी स्वयंसेवकों ने किया. सर्वाधिकारी सरदार गजेन्द्र सिंह जी ने परिचय कराया. महानगर संघचालक राजेश लोया जी ने उपस्थित विशिष्ट व्यक्तियों का स्वागत परिचय कराया. वर्ग कार्यवाह श्याम मनोहर जी ने वर्ग का प्रतिवेदन दिया.

कार्यक्रम के मख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी ने देश, राष्ट्रीयता और देशभक्ति को भाषण का केंद्र बिंदु रखा. “भारत प्राचीन संकृति और सभ्यता से भरा एक सम्पन्न देश रहा है. भारत का व्यापार सिल्क रूट, स्पाइस रूट से समुद्री मार्ग से सारे विश्व से जुड़ा था. भारत 1800 वर्ष तक शिक्षा का केंद्र था, एक अर्थ में गुरु था. नालंदा, तक्षशिला आदि अनेक शिक्षा के केंद्रों की जगत में प्रतिष्ठा थी. विदेशों से अनेक विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने भारत आते थे.

लेकिन कालांतर में विदेशी आक्रमण हुए, मुगलों ने 600 वर्ष तक, ईस्ट इंडिया कंपनी तथा बाद में ब्रिटिश शासन भारत पर रहा, पर वो भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति को तोड़ न सका. भारत एक स्वतंत्र विचारों का देश है. विविधता में एकता यही भारत की जीवनशैली है. भेदभाव से, अलगाववाद से भारत कमजोर होगा. आज भारत तेजी से विकास कर रहा है, लेकिन अभी हमें सुखी, खुशहाल, संपन्न समाज बनाने की दृष्टि से आगे कदम बढ़ाना होगा.”

कार्यक्रम से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. मुखर्जी ने संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के निवास स्थान पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उनका स्वागत किया. विज़िटर बुक में प्रणव दा ने लिखा….. “मैं यहाँ भारत माँ के महान सपूत डॉ. के.बी. हेडगेवार को सम्मान व श्रद्धासुमन अर्पित करने आया हूं. ”

 

 

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