संघ को समझने के लिये पहले भारत को जानना आवश्यक – डॉ. मनमोहन वैद्य जी Reviewed by Momizat on . नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि जिन्हें संघ को समझना है, पहले उन्हें भारत को जानना होगा. जो भारत को समझ नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि जिन्हें संघ को समझना है, पहले उन्हें भारत को जानना होगा. जो भारत को समझ Rating: 0
You Are Here: Home » संघ को समझने के लिये पहले भारत को जानना आवश्यक – डॉ. मनमोहन वैद्य जी

संघ को समझने के लिये पहले भारत को जानना आवश्यक – डॉ. मनमोहन वैद्य जी

नागपुर (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य जी ने कहा कि जिन्हें संघ को समझना है, पहले उन्हें भारत को जानना होगा. जो भारत को समझने का प्रयास करेंगे, वे ही संघ को जान व समझ सकेंगे. वे तरुण भारत के एमआईडीसी कार्यालय को सदिच्छा भेंट के दौरान उपस्थित जनों को संबोधित कर रहे थे. दैनिक तरुण भारत का संचालन करने वाली संस्था श्री नरकेसरी प्रकाशन लिमिटेड के अध्यक्ष डॉ. विलास डांगरे जी ने कार्यालय में सह सरकार्यवाह जी का स्वागत किया.

नागपुर में चल रहे संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समारोप कर्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के आने को लेकर काफी चर्चाएं हैं. इस संबंध में सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि समाज में कुछ ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग हैं, जो न तो स्वयं संघ को समझना चाहते हैं और न ही दूसरों को समझने देना चाहते हैं. यदि कोई संघ के पास जाने का प्रयास करता है तो उसे रोकने के हर संभव प्रयत्न किये जाते हैं. वर्तमान में चल रहा विवाद इन्हीं कोशिशों का एक हिस्सा है. उन्होंने कहा कि संघ के कार्यक्रम में प्रणव दा को आमंत्रित करने में कुछ गलत नहीं है. प्रणव दा एक परिपक्व और अनुभवी राजनेता हैं. उन्हें अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिला है और संघ भी उनके विचारों को जानेगा. इस प्रकार इस कार्यक्रम में विचारों का आदान प्रदान होगा. इससे पहले भी अनेक मान्यवरों को संघ ने आमंत्रित किया था और उन्होंने संघ के मंच से अपने विचार प्रकट किए थे.

डॉ. मनमोहन जी ने कहा कि वर्तमान में देश में वैचारिक संघर्ष निर्णायक मोड़ पर है. यह संघर्ष भारत की भारतीय व गैर भारतीय अवधारणा से संबंधित है. गैर भारतीय अवधारणा का अर्थ है, भारतीय संकल्पना का भारत से बाहर के विचारों में अस्तित्व होना. परंतु, भारत की अध्यात्म आधारित जो प्राचीन जीवन दृष्टि है, उस पर आधारित भारत की संकल्पना भारतीय संकल्पना है. इस भारतीय संकल्पना के कारण ही हममें एकं सत् विप्रः बहुधा वदन्ति तथा विविधता में एकता जैसे मूल्यों को संगोपन हुआ है. उन्होंने कहा कि भारत की गैर भारतीय अवधारणा मानने वालों में सहिष्णुता नहीं है क्योंकि उनके विचारों की जड़ें ही ऐसी हैं. वे दूसरों के विचार सुनने को तैयार ही नहीं होते. यह विचारधारा अत्यंत क्षुद्र, संकुचित व हिंसा पर आधारित है. अब इस विचारधारा का जनाधार समाप्त होने की कगार पर है, इसलिए इसे मानने वाले लोग अत्यंत तीव्रता से विरोध करते हुए दिखाई दे रहे हैं.

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि मातृभाषा से जुड़े रहना समय की आवश्यकता है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो धीरे-धीरे इनका अस्तित्व समाप्त होने का खतरा है. यदि बोली भाषा का एक भी शब्द नष्ट हो गया तो उस शब्द के साथ संस्कृति भी नष्ट हो जाती है. इसलिए सप्ताह में एक दिन घर के सभी लोगों को कम से कम एक घंटा अंग्रेजी के एक भी शब्द का प्रयोग न करते हुए अपनी बोलीभाषा में बोलने का नियम बनाना चाहिए. अभिभावकों को मातृभाषा की शिक्षा पर बल देना चाहिए. मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा का आग्रह करने का अर्थ अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं है. अंग्रेजी भाषा आनी ही चाहिए, परंतु सभी विषयों की पढ़ाई अंग्रेजी भाषा में करना आवश्यक नहीं है. अभिभावकों को यह अंतर समझना चाहिए.

उन्होंने कहा कि मीडिया को भी संघ के अधिकारियों से संपर्क साध कर जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा सत्य को ही सामने लाना चाहिए. पहले संघ के विचार केवल संघ के माध्यम से ही प्रसारित होते थे. परंतु, अब सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण संघ के विचारों का भी बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार हो रहा है.

सह सरकार्यवाह जी ने वर्ष 2012 से लेकर 2017 तक संघ के ऑनलाइऩ उपक्रम ज्वॉइऩ आरएसएस के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 में 13 हजार लोगों ने रिक्वेस्ट भेजी थी, 2017 में यह संख्या बढ़कर 1 लाख 36 हजार हो गई है. विशेष उल्लेखनीय है कि इसमें 20 से 35 वर्ष के युवाओं का अधिक समावेश है. उन्होंने कहा कि संघ के बढ़ते प्रभाव, शक्ति के कारण ही संघ का विरोध होता है. संघ के प्रभाव के चलते हिन्दू समाज के एकजुट होने के कारण जातीय, क्षेत्रीय व सांप्रदायिक राजनीति करने वालों का जनाधार कम होता जा रहा है. इसी वजह से समाज में जाति, प्रांत, उपासना पंथों के आधार पर नए कृत्रिम भेद निर्माण कर राजनीतिक स्वार्थ के लिये समाज को विभाजित करने के प्रयास होते हुए दिखाई दे रहे हैं.

नरकेसरी प्रकाशन के कार्याध्यक्ष अनिल दांडेकर जी, प्रबंध संचालक धनंजय बापट जी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुनील कुहीकर जी भी उपस्थित थे. सह सरकार्यवाह जी ने संपादकीय विभाग के सहयोगियों से भी बातचीत की.

About The Author

Number of Entries : 5207

Leave a Comment

Sign Up for Our Newsletter

Subscribe now to get notified about VSK Bharat Latest News

Scroll to top