संस्कृति पर आघात – साजिश के केन्द्र में ‘येल’ Reviewed by Momizat on . अभी कुछ दिन पहले तक केंद्र में जो सरकार थी वह ऐसे लोगों के समर्थन पर टिकी थी जो आतंकवादियों का कई अवसरों पर समर्थन करते दिखते थे. इसलिये आतंकवादियों को नियंत्रि अभी कुछ दिन पहले तक केंद्र में जो सरकार थी वह ऐसे लोगों के समर्थन पर टिकी थी जो आतंकवादियों का कई अवसरों पर समर्थन करते दिखते थे. इसलिये आतंकवादियों को नियंत्रि Rating: 0
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संस्कृति पर आघात – साजिश के केन्द्र में ‘येल’

अभी कुछ दिन पहले तक केंद्र में जो सरकार थी वह ऐसे लोगों के समर्थन पर टिकी थी जो आतंकवादियों का कई अवसरों पर समर्थन करते दिखते थे. इसलिये आतंकवादियों को नियंत्रित करने का मनोबल ही उस सरकार के पास नहीं था,लेकिन अब मोदी सरकार के आने के बाद सिर्फ सरकारी कामकाज में ही बदलाव नहीं आया है,बल्कि सरकार को अपना वोट देने वाले मतदाताओं को भी सत्ता पक्ष से आशायें जगी हैं. इस देश में जो आतंकवादी एकजुट होकर यहां युद्घ जैसी स्थिति निर्माण करते रहे थे, उनकी दीर्घकालीन योजना क्या है, इसका विचार कर उन पर नियंत्रण करने में प्रत्येक नागरिक का सहभाग महत्वपूर्ण है. इन आतंकवादियों के हमलों के पीछे इस देश में अनेक सदियों तक लूट करने का उद्देश्य है, यह तो स्पष्ट है. ब्रिटिश शासन  ने विवाद के बीज बहुत गहरे तक बोये थे, इसलिये उन बीजों को उखाड़ने के लिये उसी तरह के दूरदर्शी प्रयासों की आवश्यकता है.

पिछले दस वर्षों में देश को तोड़ने एवं आतंक फैलाने वाली जिहादी कार्रवाइयों के उजागर होते रहने के बावजूद पिछली केंद्र सरकार निर्णायक स्थिति में नहीं दिखती थी,लेकिन आज जो सरकार है वह प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादियों के समर्थकों पर निर्भर नहीं है. इसलिये इस देश के करोड़ों मतदाताओं में सत्ता से आतंकवादी तत्वों पर कर्रवाई होने की आस जगना स्वाभाविक है. देश की समस्याओं के निराकरण के लिये पहले जितने यत्न करने का अनुमान था उससे अधिक यत्न करना होगा, इसका भी अनुभव हो रहा है, लेकिन आज दृष्टिकोण बदलाव तो दिखाई दे रहा है. हमारी मातृभूमि को ‘परम् वैभव’ के स्थान पर ले जाने एवं उसके लिये चाहे जो मूल्य चुकाना हो, वह चुकाने का दायित्व हमारा ही है.

पिछले 65 वर्षों में यह भूमि आतंकवादियों को ऐसी लगती थी, जहां वे चाहे जो कर सकते हैं. ये राष्ट्र के समक्ष गंभीर चुनौती थी,क्योंकि आतंकवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं. सामान्यत: इस देश की भविष्य की समस्याओं का आकलन स्वतंत्रता के बाद उत्पन्न समस्याओं की तुलना में किया जाता है, इसलिये बहुत पीछे लौटकर देखने की चिंता नहीं की जाती. लेकिन 200 वर्षों तक अंग्रेजों के राज, 400 वर्षों तक मुगलों के राज और उससे पूर्व गजनी से आये महमूद के हमलों के इतिहास की पृष्ठभूमि में आतंक होने के कारण काफी गहरे तक जा चुकीं आतंकवाद की जड़ें  तुरंत उखाड़ पाना संभव नही है, किंतु यह वस्तुस्थिति है कि संदर्भ बदल रहे हैं.

आतंकवाद के संदर्भ में अंग्रेजों, गजनी के मुहम्मद एवं बाबर से चली आ रही मुगलों की परंपरा की चर्चा का कारण यह है कि आज एकजुट होकर हमला करने वाले आतंकवादी इस देश पर पिछले एक हजार वर्षों से चले आ रहे लूट के अभियान को जारी रखना चाहते हैं, इसलिये वे बार-बार हमले करते हैं.

मुगल और ब्रिटिशकाल में कितनी लूट हुई उसको लेकर विभिन्न मत हैं, लेकिन पिछले 60-65 वर्षों में इस देश का जितना काला धन स्विस बैंकों में जमा किया गया है, उसकी तुलना में ब्रिटिश, गजनी के मुहम्मद से लेकर मुगलों के समय तक की लूट कितनी जबरदस्त हो सकती है, इसका कुछ अनुमान मिलता है. बाबा रामदेव तथा अन्य जानकार लोगों के मत में आज भारत के 350 लाख करोड़ रुपये काले धन के रूप में विदेशों में जमा हैं. यह तो केवल काला धन है, लूट तो उससे अधिक ही होगी. पिछले एक हजार वर्ष में आतंकवादियों ने सिर्फ लूट ही नहीं मचाई, बल्कि बड़े पैमाने पर नरसंहार भी किये एवं यहां ज्ञान की उपासना करने वाले विश्वविद्यालय ध्वस्त कर दिये.

इसका उल्लेख करने का कारण यह है कि इस देश पर हमले करने वाले आतंकवादी बंदरगाहों पर हमले करने वाले दस्यु नहीं हैं. पिछली कुछ सदियों में उन्होंने जिस तरह की लूट की, उसी तरह आने वाली अनेक सदियों तक उसे जारी रखा जा सके, इसलिये आज आतंकवादियों के संयुक्त हमले जारी हैं. भारत को लूटने का ब्रिटेन का पिछले 150 वर्ष का ‘अधिकार’ कायम रहे इसके लिये, भले ही भारत स्वतंत्र हो गया हो, तो भी इस देश का बार-बार विभाजन हो और फिर से यहां वर्चस्व स्थापित कर लिया जाय, ऐसी मंशा रहती है. देश में ब्रिटिश लोगों ने कई तरह के विवाद खड़े किये हैं,जैसे, आर्य-अनार्य, आर्य- द्रविड़, आर्य-तमिल,तमिल-सिंहली और आर्य-लेमूरी. इन सभी विवादों का केन्द्र लंबे समय तक ब्रिटेन में था, उसके बाद वह यूरोप के अन्य देशों में रहा. आज वह मुख्य रूप से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में है.

ब्रिटिश लोगों का भारत पर राज था. वह राज यहां रेलवे, डाक व्यवस्था लाने, तहसीलदार व्यवस्था लाने या भारतीय दण्ड संहिता बनाने के लिये नहीं था, बल्कि यहां सतत लूट करने के लिये था. कम से कम इतिहास का अध्ययन करने पर तो यह समझ आना ही चाहिये. वास्तव में आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन आतंकवादियों पर नियंत्रण कैसे हो. उनकी अब तक की की लूट का आकलन करें और इसका अनुमान लगायें कि उनकी  कितनी व कब तक लूट करने की योजना है. डकैती करने वाली टोली भी डकैती डालने से पहले उस स्थान की जानकारी, लूटने की सामग्री, उसके लिये शस्त्र, समय एवं अचानक हमला करने की पद्धति का विचार करती है. फिर पिछले 200-300 वर्ष तक विश्व के 50 से ज्यादा देशों में जिन्होंने लूट मचाई है, उन्होंने इसका कितना बारीकी से विचार किया होगा, इसका अनुमान लग जायेगा. विदेशी शक्तियों को अभी और लूट मचानी है, यह कहा जाये तो नई पीढ़ी को यह तुरंत मंजूर नहीं होगा.’जो हुआ सो हुआ, अब अगर आये तो हम देख लेंगे,’ यह उनका उत्तर होगा. लेकिन भारत की लूट अनेक सदियों तक जारी रह सके, इसलिये इस तरह का दुष्प्रचार करने की कुटिल चाल चली गई कि भारत का इतिहास यूरोप से ही शुरू हुआ है. इसके पीछे का कारण समझ लेना आवश्यक है. यह कुटिलता ‘आर्य यूरोप से आये’ यही फैलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यूरोप से आने वाले आर्य एवं दक्षिणी द्वीपों से आने वाले लेमूरी लोगों के वंशज, तमिलों के संघर्ष से भारत की रचना हुई है, यह दिखाने का प्रयास भी ब्रिटिश लोगों ने किया. डीएनए परीक्षणों से ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा ‘आर्य यूरोप से आये’ एवं ‘लेमूरी लोग मैडागास्कर एवं इंडोनेशिया की कुछ जनजातियों से आये’, यह दिखाने के प्रयासों की पुष्टि नहीं होती. वह प्रयास यद्यपि ब्रिटिशों का था, लेकिन आज भी उसकी धुरी अमेरिका है.

यूरोप एवं अमेरिका मुख्य रूप से यूरोपीय नस्ल के गोरे लोगों की बहुसंख्या वाला देश है. फिर भी उन्होंने गैर-श्वेत लोगों के इलाकों में इस आड़ में ऐसे कई केंद्र विकसित किये हैं जो दिखाते हैं कि वहां के विश्वविद्यालयों में अन्य देशों के समाजों के विकास की योजनायें तैयार की जा रही हैं. ब्रिटिशों के राज में उन्होंने तमिलनाडु के पाठ्यक्रमों, प्रशासन, संस्थानात्मक जीवन और वहां के सांस्कृतिक जीवन में भी सत्ता के माध्यम से कई बातें सरकारी कामकाज का हिस्सा बना दी हैं. यहां ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति के बाद अमेरिकी विश्वविद्यालयों से ये बातें शुरू हुई थीं. अमरीका के ‘येल’ विश्वविद्यालय में तमिल भाषा के माध्यम से आतंक फैलाने की योजनाओं को आकार दिया गया है. यह दिखाने का प्रयास किया गया कि ‘तमिल भाषा के शब्दों का मूल भारतीय नहीं’ एवं ‘अफ्रीका होते हुए वे यूरोप तक पहुंचे’. इसी तरह हार्वर्ड विश्वविद्यालय की जो योजना है, वह यह है कि ‘तमिल इस देश के मूल निवासी हैं’. पिछले 20 वर्षों से मूल निवासी आंदोलन माओवादियों के माध्यम से पूरे देश में फैलाने का प्रयास जारी है. बर्कले विश्वविद्यालय में तो ‘तमिल एक स्वतंत्र राष्ट्र है’, ऐसा बताकर इस झूठ को परिपुष्ट करने की योजना पिछले 20 वर्षों से जारी है. तमिल साहित्य का संबंध लेमूरी संस्कृति के माध्यम से अफ्रीका से है, अफ्रीका के कारण यूरोप की ईसाई संस्कृति से संबंध है, दक्षिण-पूर्व एशिया की कुछ चीजों से संबंध है, लेकिन उसका उत्तर भारत से संबंध नहीं है, यह दिखाने के प्रयास हुये हैं. लंबे समय तक ब्रिटिश शासन रहने के कारण उसे जनजीवन में न केवल मान्यता प्राप्त हो गई, बल्कि उसके आधार पर हिंसक आंदोलन चल रहे हैं.

ब्रिटिश लोगों, ईसाई मिशनरियों और अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मिलकर इस विषय का जो प्रतिपादन किया है, वह किसी युद्घ की तैयारी की दृष्टि से किया है. भारतीय समाज की विशेषता यह है कि कुल के देवता, कुल, कुल की देवी, कुल की उपासना, कुल-संस्कार तथा कुल-संस्कृति एक होते हैं. स्थानीय भाषा एवं स्थानीय मौसम के अनुसार कुछ अंतर छोड़ दें तो अनेक बातें ज्यों की त्यों हैं.

पहले पहल ब्रिटिश लोगों ने दक्षिण में ‘वनवास भोगने वाले राम की संस्कृति आर्य थी एवं रावण की संस्कृति अनार्य थी’, यह दिखाने का प्रयास किया, पर वह सफल नहीं हो पाया. इसलिये श्रीलंका में थिओसॉफिकल सोसायटी और लेमूरिया संस्कृति का मिश्रण इस तरह किया गया कि मैडागास्कर से आये शब्द स्थानीय के रूप में स्वीकृत करने के लिये बाध्य किया गया, लेकिन मंदिर संस्कृति एवं संगीत संस्कृति की एकरूपता स्पष्ट दिखते हुए भी उसे आक्रमण करार दिया गया.

इस सबका बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता इसलिये है कि कल तक हम जो इतिहास पढ़ रहे थे और आज जो पढ़ रहे हैं, इसमें विवरण का कोई अंतर न होकर भी दृष्टिकोण का अंतर निश्चित है. इसमें एक बात ध्यान देने योग्य है कि इतिहास का अध्ययन, आक्रामकों की हिंसा की परिसीमा, ये मुद्दे चाहे जितने सच हों, पर आवश्यक नहीं कि केवल उसी आधार पर सामने वाला व्यक्ति उससे सहमत हो. अंग्रेजों ने सत्ता के माध्यम से इस तरह की बातें फैलायीं एवं उसे सच मानने वालों की संख्या भी काफी होने के बावजूद उसे सच न मानने वालों की संख्या उससे बड़ी है. आज की स्थिति में भी इस विषय को स्वीकारे जाने के लिये आत्मबल ही उपयोगी साबित होगा.

मोरेश्वर जोशी

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