समरस समाज के बिना अन्त्योदय सम्भव नहीं Reviewed by Momizat on . भारतीय तत्वज्ञान समरसता और एकत्व का प्रथम उद्घोषक रहा है. आदि ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचा "संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते भारतीय तत्वज्ञान समरसता और एकत्व का प्रथम उद्घोषक रहा है. आदि ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचा "संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते Rating: 0
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समरस समाज के बिना अन्त्योदय सम्भव नहीं

भारतीय तत्वज्ञान समरसता और एकत्व का प्रथम उद्घोषक रहा है. आदि ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचा “संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्. देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते.. “(ऋग्वेद 10-191-2) समरसता की समाज की उद्घोषणा ही है. इसी प्रकार कठोपनिषद – कृष्ण यजुर्वेद के मन्त्र .. ॐ सह नाववतु. सह नौ भुनक्तु. सह वीर्यं करवावहै. तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै..19.. आगे बढ़ने की अनिवार्य शर्त ही कही गई है.

अद्वैत वेदांत एकात्मता का श्रेष्ठतम उदाहरण है. जो मनुष्य को ब्रह्म होने का अधिकार देता है. वे कहते हैं “ब्रह्म सत्य-जगन्मिथ्या” यानी की समस्त जगत परमार्थिक रुप से असत है, केवल ब्रह्म ही एक मात्र सत्य है. जगत की व्यावहारिक सत्ता है, लेकिन मूल तत्व तो केवल एक मात्र ब्रह्म ही है. जैसे चंद्रमा की छवि अलग-अलग जल पात्रों में अलग-अलग दिखती है, वैसे ही एक ही ब्रह्म हम सब में, जीव जगत में भिन्न-भिन्न परिलक्षित होता है. अलग-अलग मानना अविद्या है, अज्ञान है. ब्रह्म और जीव एकत्व बोध ही मोक्ष है,  मुक्ति है. जब वेदांत कहता है कि “अहम् ब्रह्मास्मि” तो इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि मैं ही ब्रह्म हूं. वो आगे कहता है  “तत्वमसि” तुम भी वही हो. समस्त जीव-जगत में एकत्व व समरसता का इससे श्रेष्ठ कोई उदाहरण नहीं हो सकता. मध्यकालीन संतों ने भी इसी धारा को अपना दर्शन कहा है.

कबीर जब कहते हैं कि- “एक बूँद एकमल-मूतर, एक चांम एक गूदा. एक जोति थैं सब उतपना, कौन बाम्हन कौन सूदा..“ या जब वे कहते है – “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं. प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं..” तो ये अद्वैत की ही अभिव्यक्ति है. तुलसी – “सियाराम मय  सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी” में भी कबीर की बात की ही बात करते हैं.

आधुनिक युग में स्वामी विवेकानंद ने नव-वेदांत के आधार पर छुआछूत, भेदभाव, गरीबी, अंधविश्वास जैसी समस्त कुरीतियों को दूर करने का काम किया है. गांधी जी और बाबा साहब अंबेडकर ने भी एकता के प्रयास किए हैं किंतु फिर भी समाज में जाति-भेद फैला पड़ा है. हमारे मूल शास्त्रों में तो समरसता और एकात्मता की प्रतिबद्ध उद्घोषणा है. लेकिन हमारे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में इसका आज भी अभाव है. असली समरसता यही है कि सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक जीवन में हमारा तत्वज्ञान परिलक्षित हो.

यह सही है कि आज भी गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, अनिश्चितता बेरोजगारी, निम्न जीवन स्तर कहीं एक स्थान पर घनीभूत है, कहीं एक ही स्थान पर मिलता है तो अनुसूचित जाति बहुल क्षेत्र ही है. आज भी गांव में यदि बारात रोकी जाती है तो निश्चित रुप से वह अनुसूचित जाति के बन्धु की ही होती है और कहीं सरपंचों को संबंधित पंचायत सचिव यदि 15 अगस्त पर झंडा नहीं फहराने देता तो वह सरपंच अनुसूचित जाति का ही होता है. लेकिन इसके बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों से और समय के परिवर्तन से असमानता और भेदभाव में कमी आई है. संघ की शाखा समरसता का सबसे व्यावहारिक और प्राथमिक उदाहरण है. संघ का मूल भाव ही समरसता है. जिसे संघ ने अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुत कई प्रस्तावों के माध्यम से दृढ़ता के साथ समाज के सामने रखा. तृतीय सरसंघचालक प. पूज्य बाला साहेब देवरस ने तो अस्पृश्यता को स्पष्ट रूप नकारते हुये कहा “यदि अस्पृश्यता पाप नहीं तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है.” कई बार अज्ञानता वश “समरसता” शब्द पर भी आपत्ति जताई जाती है. संघ समरसता चाहता है “समता” नहीं. समरसता मन में अपनत्व होने से ही आ सकती है और अपनत्व मन में अभेद निर्माण होने पर ही प्रगट हो सकता है. इसके लिए संघ ने एक सुंदर सूत्र दिया वह है ‘हम सब भारत माँ की सन्तान’.

संविधान में स्वयं बाबा साहब आंबेडकर ने समानता के लिए पर्याप्त अनुबंध किए हैं. अन्य कानून भी बनाए हैं, लेकिन अनुभव यह बताते हैं कि केवल कानून से समरस समाज की स्थापना नहीं हो सकती. केवल समानता पर्याप्त नहीं समरसता रही तो समानता सहज ही अपने आप पीछे चली आएगी. कानून नहीं. कानून नियम तो बना सकता है, ‘मन’ नहीं बना सकता. कानून दिशा दर्शन कर सकता है, लेकिन व्यवहार में लाने का काम मन ही करता है. कानून स्वीकार्य तभी होता है जब लोगों का मन तैयार हो. समरसता मन की स्वीकार्यता है, इसलिए यह समता के भी आगे की संकल्पना है.

समरसता और सामाजिक न्याय में भी अंतर है. सामाजिक न्याय कानूनी स्वरूप का है, इसमें शक्ति प्रदर्शन व दबाव का अहसास होता है. यह एक प्रकार की जबरदस्ती है. सामाजिक न्याय में दलित अस्तित्व बना रहता है व अपनी अलग पहचान पर बल देता है. उसे मिलाता नहीं. यह केवल सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में समानता की घोषणा करता है. इस प्रकार यह सामाजिक स्वरूप का है. लेकिन समरसता एक प्रकार का एकात्म है, इसमें ध्वनित होता है कि वंचित वर्ग हमारे अंग हैं. समरसता सामाजिक व आर्थिक परिसीमा को समेटते हुए धार्मिक स्वभाव की है. इसमें भातृत्व भाव की अपेक्षा है.

डॉक्टर आंबेडकर का नारा था “स्वतंत्रता समानता, भ्रातृत्व” कानून व अपने संघर्ष के माध्यम से उन्होंने स्वतंत्रता व समानता तो दे दी भातृत्व न दे सके क्योंकि भ्रातृत्व अंदर से आता है. इसलिए समरसता, समानता और सामाजिक न्याय से ज्यादा विस्तारित व श्रेष्ठ है.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की अंत्योदय की संकल्पना सामाजिक समरसता का आर्थिक पक्ष है. दीनदयाल जी अपने दर्शन में कहते हैं, मनुष्य के कर्म की संभावित प्रेरणा करना आत्यंतिक यह सुख की कामना है. लेकिन यह सुख केवल शरीर का सुख नहीं वरन मन बुद्धि और आत्मा का भी होना चाहिए. समग्र और संपूर्ण होना चाहिए. समरसता में शरीर मन बुद्धि और आत्मा चारों सुखों का समावेश है. उन्होंने बताया कि यह आत्यंतिक सुख तभी प्राप्त हो सकता है, जब समाज में हम परस्पर पूरक बने. समाज का एक धड़ा उपेक्षित और वंचित हो भूखा और बीमार हो तो हमें भी आदर्श सुख प्राप्त नहीं हो सकेगा.

प्रो. चिंतामणि मालवीय (लेखक उज्जैन मध्यप्रदेश से सांसद हैं)

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