समाज की परख स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार से होती है – डॉ. कृष्णगोपाल जी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली (इंविसंकें). कोई समाज कितना सभ्य है, उसकी परख उस समाज में स्त्रियों के प्रति व्यवहार से होती है. भारतीय समाज में स्त्री और पुरूष को लेकर छह-सात सौ वर् नई दिल्ली (इंविसंकें). कोई समाज कितना सभ्य है, उसकी परख उस समाज में स्त्रियों के प्रति व्यवहार से होती है. भारतीय समाज में स्त्री और पुरूष को लेकर छह-सात सौ वर् Rating: 0
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समाज की परख स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार से होती है – डॉ. कृष्णगोपाल जी

नई दिल्ली (इंविसंकें). कोई समाज कितना सभ्य है, उसकी परख उस समाज में स्त्रियों के प्रति व्यवहार से होती है. भारतीय समाज में स्त्री और पुरूष को लेकर छह-सात सौ वर्षों को छोड़ दें तो भेदभाव कभी नहीं रहा. यह कहना था – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी का. भारतीय जन संचार संस्थान में आयोजित भारतीय विचार और व्यवहार में स्त्री शक्ति विषय पर आयोजित कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि हमें इस ओर भी ध्यान देना होगा कि महान परंपराओं के बावजूद हमारे देश में आज भी करीब 40 प्रतिशत स्त्री शक्ति साक्षर क्यों नहीं है और स्त्रियों का एक बड़ा हिस्सा एनीमिया जैसी बीमारी से क्यों पीडित है. उन्होंने घटते स्त्री-पुरूष अनुपात पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस समस्या पर सोचे बिना स्त्री शक्ति की अवधारणा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. कार्यक्रम को महिलाओं के संगठन ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल एंड एकेडमीशियन यानि जीआईए ने भारतीय जनसंचार संस्थान और प्रज्ञा प्रवाह के सहयोग से आयोजित किया.

भारतीय परंपरा में स्त्री शक्ति की प्रधानता को लेकर सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि भारतीय विचारधारा विशेष दर्शन से प्रभावित रही है. उस दर्शन के हिसाब से भारत में स्त्री शक्ति को समान माना गया है. जो लोग स्त्री पुरुष समानता की बात करते हैं, उन्हें सोचना चाहिए कि भारतीय दर्शन में एकात्मबोध रहा है. भारतीय दर्शन में द्वैतवाद रहा ही नहीं, बल्कि एकात्म दर्शन रहा है. पद्मावत फिल्म को लेकर इन दिनों राजपूत महिलाओं के जौहर की काफी चर्चा है. इसे लेकर जारी गलत धारणाओं को स्प्ष्ट करते हुए सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि जौहर महिलाओं का दहन बताना एक महान परम्परा का अपमान है. उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में विजेता सेनाएं हारी हुई सेनाओं की महिलाओं को जीतकर ले जाती रही हैं. लेकिन भारतीय महिलाओं ने विजेता सेनाओं के साथ जाने की बजाय जौहर करना ज्यादा उचित समझा. जौहर आत्मोसर्ग का सर्वोच्च उदाहरण है.

उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय स्त्री अपने त्याग से, तपस्या से घर को सम्भालती हैं. उन्होंने वैदिक ऋचाओं की रचयिता स्त्रियों की चर्चा करते हुए सूर्या सावित्री द्वारा रचित मंत्रों का उदारहरण देते हुए कहा कि भारतीय परंपराओं में स्त्रियों से संवाद की गहन परंपरा रही है. महिलाएं वेद पढ़ती थीं, यज्ञोपवित कराती थीं और खुद भी यज्ञोपवीत पहनती थीं. लेकिन बाद के दौर में यह सब भूला दिया गया.

प्रसिद्ध नृत्यांगना सोनल मान सिंह जी ने कहा कि भारतीय समाज स्त्रियों को लेकर प्राचीन काल से ही आदरभाव रखता रहा है. उन्होंने स्त्री शब्द की उत्पत्ति बताते हुए संस्कृत के श्लोक का उदाहरण देते हुए कहा कि जो सबको धारण कर सके, वह स्त्री होती है. उन्होंने महिला शब्द की व्युत्पति बताते हुए महिला शब्द के महत्व पर जोर दिया. उनके मुताबित जो महान है, वही महिला है. महिलाओं में ही शक्ति है कि वह परिवार, समाज और देश को धारण कर सकती हैं और उसकी महानता ही है कि तमाम चुनौतियों से वह जूझ सकती है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम ने कहा कि महिलाओं की समानता को लेकर बात तो की जाती है, लेकिन हकीकत में समानता से ज्यादा महिलाओं को सम्मान की जरूरत है. अगर एक बार महिलाओं को सम्मान मिला तो फिर समानता की बात नहीं रह जाएगी.

कार्यक्रम की आयोजक जिया की संयोजक मोनिका अरोड़ा जी ने सती सावित्री, मंडन मिश्र की पत्नी भारती और मैत्रेयी जैसी विदुषियों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय समाज में स्त्रियां ही ताकतवर रही हैं. सावित्री के आगे यमराज को भी हार माननी पड़ी थी. भारतीय समाज में महिलाएं हर मोर्चे पर अपनी शक्ति और बुद्धिमता का परिचय दे रही हैं. लेकिन आज भी भारतीय समाज में महिलाओं को लेकर धारणा बदलती नजर नहीं आ रही है. अब भी महिलाओं को घर-परिवार के पारंपरिक ढांचे में ही बांधे रखने की सोच पर जोर है. जिसे बदले जाने की जरूरत है. इस मौके पर परिग्रह रिसर्च एंड कंसल्टेंसी की सीईओ डॉ. प्राची प्रकाश जावड़ेकर जी ने कहा कि स्त्री की ज्योति ही शक्ति की ज्योति होती है. आजादी की भावना दिल से आती है. इस मौके पर भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक केजी सुरेश ने कहा कि भारतीय संदर्भ में स्त्री स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा जरूरी पारिवारिक मूल्य हैं.

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