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समाज के लिए जीने की सनातन परंपरा का उदाहरण जयनारायण जी ने हमें दिखाया – डॉ. कृष्ण गोपाल जी

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि हमारे पास जो ज्ञान, धन अथवा शरीर की शक्ति है, यह परमात्मा ने दी है और यह परमात्मा की धरोहर है. हम केवल उसके ट्रस्टी हैं. वही हमको शक्ति, बुद्धि, धन और सामर्थ्य देता है. इसलिए परमात्मा – ईश्वर के कार्य के लिए समाज को निरंतर देते रहना ही यज्ञ है. वैदिक ऋषियों ने कहा है कि परमात्मा ने हमें जो दे दिया है, उसमें से दे दो, जो बच रहा है उसमें अपना निर्वाह करें, यही यज्ञ है. अग्नि में समिधा डालना, अग्नि में घी अर्पित करना, यह यज्ञ का प्रतीक है. लेकिन उसका शाश्वत – सार्थक अर्थ है कि मेरे पास जो भी कुछ है वो समाज ने दिया, देश ने दिया, पूर्वजों ने दिया और उसमें से एक छोटा सा किंचित मात्र जो शेष-अवशिष्ट है, यज्ञशिष्ट है वो अपने लिए और शेष सबके लिए देते रहना. जयनारायण जी ने ऐसा ही उदाहरण हम लोगों के सामने प्रस्तुत किया है. सह सरकार्यवाह जी प्रसिद्ध समाजसेवी व जनसंघ के संस्थापक सदस्य जयनारायण जी को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे. जयनारायण खंडेलवाल जी का 26 अक्तूबर को निधन हो गया था, रविवार 12 नवम्बर को नई दिल्ली स्थित सिविक सेंटर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में समाज जीवन से जुड़े अनेक लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि जयनारायण जी को अनुभव होता था कि सेवा बस्तियों, सुदूर वनवासी क्षेत्रों के बच्चे अपने ही हैं. यही भाव रखते हुए उन्होंने सेवा बस्तियों में छोटे-छोटे विद्यालय, बालिकाओं के लिए सिलाई केंद्र चलाए, सुदूर ग्रामीण-वनवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालय स्थापित किये. युद्ध भूमि पर जा रहे सैनिकों की भोजन व्यवस्था की. सनातन धर्म सभा हो या रामलीला, कृष्णलीला, संस्कृति के उत्थान की बात हो अथवा समाज का कोई भी कार्य हो, उसमें हिम्मत के साथ दस लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ना और समाज का आत्म विश्वास बनाए रखना, यह उन्होंने संघ की शाखा में सीखा. इसलिए अपना जो सनातन संस्कार है, अर्थात यह परमात्मा का शरीर, परमात्मा का धन, परमात्मा का ज्ञान, परमात्मा की बुद्धि, परमात्मा का सामर्थ्य परमात्मा के चरणों में अर्पित कर देना, जो उन्होंने किया.

उन्होंने कहा कि यह सारी सम्पत्ति भगवान की है, समाज की है और देश की है. जब कभी आवश्यकता पड़े तुरन्त दे देना. अपना भोजन औषधि के रूप में ही करना. इसमें से जितना कम से कम हो, उतना ही अपने लिए लेना और बाकी को सम्भालकर एक ट्रस्टी के नाते से रखना. सनातन ऋषि परम्परा, वैदिक परंपरा के अनुसार अपने लिए थोड़ा सा ही रखना अवशिष्ट के रूप में, बाकी शेष को समाज की उन्नति के लिए, समाज के संरक्षण के लिए दे देना. समाज के संवर्धन के लिए हर दृष्टि से, हर क्षण उपस्थित रहना. जयनारायण जी ने ऐसा सुन्दर आदर्शपूर्ण जीवन जी कर हमारे समाज व देश के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत किया. वह एक सामान्य अवस्था से खड़े हुए, सब कुछ उन्होंने अर्जित किया. लेकिन सब कुछ जो था वो सब का ही था, ईश्वर का ही था, परमात्मा का ही था. उनका हम स्मरण करें, उनका हर एक प्रसंग हमको कहीं न कहीं ईश्वर भक्ति देगा, आनन्द देगा, विश्वास देगा. दस लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ते हुए अपने पवित्र समाज के लिए कुछ न कुछ करते रहने की एक प्रेरणा देगा.

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