समाज को सही दिशा में मोड़ने वाली नारी शक्ति..! Reviewed by Momizat on . भारत में नारी शक्ति का सम्मान प्राचीन काल से रहा है. भारत की संस्कृति और सभ्यता को बनाये रखने में यहाँ की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भारतीय समाज समय के भारत में नारी शक्ति का सम्मान प्राचीन काल से रहा है. भारत की संस्कृति और सभ्यता को बनाये रखने में यहाँ की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भारतीय समाज समय के Rating: 0
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समाज को सही दिशा में मोड़ने वाली नारी शक्ति..!

ahilya-bai-holkarभारत में नारी शक्ति का सम्मान प्राचीन काल से रहा है. भारत की संस्कृति और सभ्यता को बनाये रखने में यहाँ की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भारतीय समाज समय के साथ काफी बदला है. लेकिन इसके मूल्य आज भी वही हैं. समय के साथ भारतीय समाज में बदलाव लाने का काम यहाँ की महिलाओं ने किया है. प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा के साथ समाज को एक नये मुकाम पर पहुँचाना आसान बात नहीं है. अक्सर देखा जाता है कि या तो परंपराओं के साथ समझौता करना पड़ता है, या बदलाव के साथ. लेकिन भारत एक ऐसा देश है, जहाँ न तो परंपराओं के साथ खिलवाड़ हुआ है, और न ही बदलाव के साथ. प्राचीन काल से ही भारत को बदलने और विकसित करने में महिलाओं का विशेष योगदान रहा है.

वेद पुराणों में नारी का योगदान – गार्गी

भारत के वेद और पुराणों की जानकारी गार्गी और मैत्रेयी के बिना अधूरी है. वाचनक्वी ऋषि की पुत्री गार्गी ने वेद और शास्त्रों के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान दिया है. महर्षि याज्ञवल्क और गार्गी के प्रश्नोत्तर आज भी प्रसिद्ध हैं. गार्गी परम विदुषी थी और भारतीय वेदशास्त्र का निर्माण कर, समाज में स्त्रियों का स्थान केवल चारदीवारी में न रहकर ज्ञान प्राप्त करना और लोगों तक पहुंचाना भी है, यह उन्होंने सिद्ध किया.

संस्कारों के हिंदवी स्वराज्य का निर्माण – जीजामाता

संपूर्ण जगत में छत्रपति शिवाजी महाराज को बहुत माना जाता है. उनके शौर्य, पराक्रम, साहस और शील का वर्णन, गुणगान किया जाता है. कवि भूषण जैसे कवियों के लिए तो वे प्रेरणा स्रोत रहे हैं. लेकिन जिस माता ने ऐसे शिवा को जन्म दिया, उन्हें ऐसे संस्कार दिए, उनका योगदान हमें नहीं भूलना चाहिए. छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई के ही ये संस्कार थे, जिसके कारण शिवाजी जैसा योद्धा भारतवर्ष को मिला. मुगलों ने भारत के समाज को नष्ट करने की कोशिश की. बहु-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ किया. ऐसे में दुश्मन की भी बहु-बेटियों की इज्जत करने के संस्कार जीजामाता ने शिवाजी को दिए. औरंगजेब ने कहा था, ‘हम भाग्यवान हैं, हमें दुश्मन भी मिला तो शिवा जैसा.’ मुगलिया सल्तनत के जुल्मों से जूझने वाले समाज को एक संस्कारक्षम समाज में परिवर्तित करने का कार्य जीजामाता ने किया. अत्यंत नकारात्मक परिस्थिति में भी भारतीय समाज का कायापलट करने की क्षमता जिजाऊ जैसी माताओं में ही हो सकती है.

समाज को सुशासन की भेंट – अहिल्या बाई होळकर

जब समाज में यह मान्यता थी कि शासन करना, राज्य चलाना केवल पुरुषों का काम है, ऐसे समय पर एक स्त्री आगे आईं और पुरुषों से भी अधिक उत्तम क्षमता के साथ जिसने शासन की बागडोर संभाली वो हैं, अहिल्या बाई होळकर. इंदौर के होळकर राज घराने की सबसे लाडली बहू. पति खंडेराव होळकर की असमय मृत्यु होने के बाद होळकर साम्राज्य का अंत तय था. शासन और समाज को संभाल सके ऐसा कोई पुरुष नहीं था. ऐसे समय में आगे आई अहिल्या बाई ने मालवा साम्राज्य की बागडोर अपने हाथों में लेकर अहिल्या बाई समाज विकास में जुट गईं. पति, पुत्र, पुत्री और दामाद की मृत्यु उन्होंने अपनी आँखों से देखी है. लेकिन वे अपनी जिम्मेदारियों से विचलित नहीं हुईं. अहिल्या बाई ने अपनी राज्य की सीमाओं के बाहर भारत भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों पर मंदिरों का निर्माण करवाया. वे शिवभक्त थीं. पीड़ितों के लिए वे साक्षात भगवान का रूप रहीं हैं. वे न्याय के लिए प्रसिद्ध थीं. उनके साम्राज्य में किसी के साथ अन्याय नहीं हुआ.

संघर्ष का परिचय – झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई

देश की स्वतंत्रता और साम्राज्य की रक्षा के लिए संघर्ष करना आसान बात नहीं है. सन 1857 की क्रांति में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की क्षमता को सिद्ध कर दिया. महिला एक योद्धा भी हो सकती है. केवल 23 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त होने वाली रानी लक्ष्मीबाई ने समाज को एक नयी दिशा दी. भारत की स्वतंत्रता के लिए समाज को प्रेरित किया. आज भी हम सब उन्हें “खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” के रुप में ही जानते हैं. अदम्य साहस का परिचय देने वाली रानी लक्ष्मीबाई ने ‘महिलाओं का काम केवल चूल्हा चौका नहीं है, वे चाहें तो साहस के साथ युद्ध भी लड़ सकती है’, यह विश्वास दिलाया है. आज हमारी भारतीय सेना में महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. झाँसी की रानी ने यदि यह प्रेरणा न दी होती तो शायद आज सरहद पर महिलाओं की एक अलग बटालियन नहीं होती.

डॉक्टरी के क्षेत्र में महिलाओं का विशेष स्थान – डॉ. आनंदी बाई जोशी

डॉक्टरी जैसे पुरुष प्रधान पेशे में भारतीय महिलाओं का विशेष स्थान निर्माण करने का काम भारत की पहली डॉक्टर आनंदी बाई जोशी ने किया है. पुणे शहर की रहने वाली आनंदी बाई ने सन 1887 में आखिरी साँस ली. जिस समय महिलाओं को शिक्षा भी दूभर थी, उस समय बहुत ही कम उम्र में आनंदी बाई ने विदेश जाकर डॉक्टर की डिग्री हासिल की. नौ वर्ष की अल्पायु में विवाह हो जाने के बाद और 14 वर्ष की अत्यंत कम उम्र में माँ बनने के बाद भी उन्होंने समाज को डॉक्टरी पेशे का विशेष योगदान दिया. आज भारत में अनेक महिला डॉक्टर्स एवं सर्जन हैं, जिसमें आनंदीबाई जोशी का बड़ा योगदान है.

पुरुष प्रधान व्यवसाय में महिलाओं की धमक – सुधा मूर्ती

आज देश में इन्फोसिस कंपनी का नाम विख्यात है. अनेक युवाओं का सपना है इस कंपनी में काम करना. लेकिन जब इंजीनियरिंग केवल पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, ऐसे समय में स्वयं एक इंजीनियर बन कर उन्होंने इस मान्यता को भी खारिज कर दिया. टाटा इंजीनियरिंग एण्ड लोकोमेटिव कंपनी में पहली भारतीय महिला इंजीनियर के रूप में उन्हें लिया गया. टेल्को कंपनी में उस वक्त सर्वोच्च स्थान केवल पुरुषों के लिए ही रक्षित था. इस बात के विरोध में मूर्ती ने कंपनी को पत्र लिखा और परिणाम स्वरूप उन्हें उसी स्थान के लिये हायर किया गया. सुधा मूर्ती ने इन्फोसिस की स्थापना सन 1996 में की. आज यह कंपनी दुनिया की प्रसिद्ध बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक है. सुधा मूर्ती जी ने इस कंपनी के माध्यम से अनेक सामाजिक कार्य भी किये. वे प्रसिद्ध लेखिका भी हैं. पुरुष प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं का स्थान पक्का करने के कारण आज अनेक महिलाएँ सम्मान के साथ इन्फोसिस और इस जैसी अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्य कर रहीं हैं.

भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाली आईएएस ऑफिसर – बी. चंद्रकला

‘आईएएस अफसर’ ये पदवी कुछ समय पहले तक केवल पुरुषों की ही मानी जाती थी. लेकिन युवाओं के नेतृत्व में और युवा महिलाओं की जिद ने आज इस क्षेत्र में भी महिलाओं के लिए कई अवसर प्रदान किये हैं. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए 35 वर्षीय बी. चंद्रकला का नाम पिछले कुछ दिनों से काफी प्रसिद्ध हुआ है. उत्तर प्रदेश की इस आईएएस ऑफिसर ने कम उम्र में ही बड़े-बड़े पैसे खाने वाले, भष्ट्राचार करने वाले अधिकारियों को कठोर कदम उठाकर अंकुश लगाया है. एक महिला अपने अनुशासन और मूल्यों से भ्रष्टाचार जैसी बीमारी को जड़ से उखाड़ने का कार्य भी कर सकती है, यह बी चंद्रकला ने सिद्ध कर दिखाया है.

ऐसे अनेक नाम हैं. लता मंगेशकर, कल्पना चावला, चंदा कोचर, पीवी. सिंधु, साक्षी मलिक, मिथिला पालकर, शरवरी जमेनिस, मल्लिका साराभाई, गौरी शिंदे, ऐसे विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रसिद्ध महिलाएँ हैं, जिन्होंने समाज को कुछ ना कुछ दिया है. समाज के विकास में कोई ना कोई महत्वपूर्ण योगदान दिया है. और उन्हीं के कारण आज भारतीय समाज का मूल्यों के साथ कोई भी समझौता किए बिना विकास हुआ है. ऐसी भारतीय नारियों के सामने भारतीय समाज सदैव नतमस्तक रहेगा.

– निहारिका पोल

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