विश्व को सहकार और सहयोग के साथ चलने की प्रेरणा केवल भारत ही दे सकता है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली (इंविसंकें). युवा विमर्श तीन दिवसीय सम्मेलन का शुभारम्भ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने किया. उन्होंने भारतीय जनसंचार स नई दिल्ली (इंविसंकें). युवा विमर्श तीन दिवसीय सम्मेलन का शुभारम्भ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने किया. उन्होंने भारतीय जनसंचार स Rating: 0
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विश्व को सहकार और सहयोग के साथ चलने की प्रेरणा केवल भारत ही दे सकता है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी

नई दिल्ली (इंविसंकें). युवा विमर्श तीन दिवसीय सम्मेलन का शुभारम्भ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने किया. उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान के सभागृह में ‘आधुनिक सभ्यता की चुनौतियां’ विषय पर कहा कि विज्ञान की आंख सीमित है. जहां विज्ञान रुकता है, वहां से अध्यात्म शुरु होता है. आधुनिक सिविलाइजेशन में विज्ञान द्वारा अर्जित भौतिक प्रगति की स्पर्धा में अध्यात्म को जीवन से निकाला जा रहा है जो चिंता का विषय बनता जा रहा है. पश्चिम द्वारा प्रायोजित आधुनिक सिविलाइजेशन ने दुनिया को एक बाजार बना दिया है, जिसमें व्यक्ति को अपने लाभ के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता. समाज प्रतिस्पर्धी बन गया है, प्रतिस्पर्धा सफलता के लिए जरूरी है. लेकिन इस कारण आज व्यक्ति समाज से अलग-थलग होता जा रहा है, दूसरों से अधिक अर्जित करने की लालसा से उसमें ईर्ष्या और द्वेष की भावना बढ़ती जा रही है. सूचना प्रौद्योगिकी ने जहां हमें हर जानकारी सुलभता से उपलब्ध कराई है, वहीं इससे व्यक्तिगत सम्बन्ध समाप्त होते जा रहे हैं. जिससे अवसाद और डिप्रेशन लोगों में बढ़ता जा रहा है.

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि हमें विज्ञान और अध्यात्म के बीच समन्वय बैठाने की आवश्यकता है. विचार करना होगा कि मनुष्य को इतनी सुनिधाएं देने वाला विज्ञान अवसाद कैसे दे रहा है. आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत अमेरिका में 1.6 करोड़ बच्चों के पास उनके मां-बाप नहीं हैं, 4.1 करोड़ बच्चों को वहां की सरकार पाल रही है. आधुनिक सभ्यता ने जिस उपभोक्तावाद को जन्म दिया है, उस कारण हमारी आवश्यकताएं असीमित हो गई हैं, अधिक पाने की चाहत ने मनुष्य को परिवार-कुटुम्ब से दूर कर दिया है. इन चुनौतियों से निकलने का मार्ग अध्यात्म पर आधारित भारतीय संस्कृति में ही है, जो सामूहिकता की भावना हमें देती है, प्रकृति से कम से कम लेना, आवश्यकताओं को सीमित रखकर भविष्य में सारे समाज के लिए संसाधन उपलब्ध रखना, यह हमारे ऋषियों ने बताया है. अर्थशास्त्र के रचयिता चाणक्य ने इसके पहले ही श्लोक में कहा है कि मैं इसे पृथ्वी में रहने वाले सभी मनुष्यों के लिए लिख रहा हूं, केवल भारत के लिए नहीं. अर्थात हम सारे विश्व को एक कुटुम्ब मानते हैं. इसलिए इस विश्व को जो आवश्यक है, वह सबके सहयोग और सहकार के साथ चलने की प्रेरणा भारत ही विश्व को दे सकता है, क्योंकि यह आध्यात्मिक देश है. सिविलाइजेशन का सही मार्ग चुनने के लिए हमें अब से लेकर पिछले 400 साल पहले मनुष्य द्वारा अपनाए गये विकास के मार्गों का आंकलन कर तय करना होगा कि हमारे लिए सिविलाइजेशन का कौन सा मार्ग उत्तम है. विज्ञान इस सारी सृष्टि को एक आनन्द का मार्ग दिखा सके, वह भारत का ही मार्ग होगा, विश्व इसकी प्रतीक्षा कर रहा है.

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