सुरेशराव केतकर संघरूप नहीं थे, संघ ही उनका जीवन था – सुरेश भय्या जी जोशी Reviewed by Momizat on . पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि सुरेशराव केतकर संघरूप नहीं थे, बल्कि संघ ही उनका जीवन था. जीवनाच्या अंतिम क् पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि सुरेशराव केतकर संघरूप नहीं थे, बल्कि संघ ही उनका जीवन था. जीवनाच्या अंतिम क् Rating: 0
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सुरेशराव केतकर संघरूप नहीं थे, संघ ही उनका जीवन था – सुरेश भय्या जी जोशी

IMG_4205पुणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि सुरेशराव केतकर संघरूप नहीं थे, बल्कि संघ ही उनका जीवन था. जीवनाच्या अंतिम क्षणापर्यंत ते संघ जगले. एक प्रखर तेज से चमकने वाले तेजस्वी व्यक्तित्व तथा आदर्श व्यक्तित्व के जो मानदंड हम मानते हैं, वे सारे गुण उनमें थे. सरकार्यवाह जी पुणे में केसरी वाडा स्थित लोकमान्य तिलक सभागार में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ प्रचारक एवं पूर्व सह सरकार्यवाह स्व. सुरेशराव केतकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे. मंच पर पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत संघचालक नानासाहेब जाधव तथा पुणे महानगर संघचालक रवींद्र वंजारवाडकर भी उपस्थित थे.

सरकार्यवाह जी ने स्व. सुरेशराव केतकर के विशेष गुणों के बारे में कहा कि सुरेशराव का जीवन अंतिम क्षण तक संघरूप था. व्यक्तिगत जीवन में सरलता की जो परिसीमा होती है, वह उनमें थी. सरलता ही उनके जीवन का तेजस्वी रूप था. उनके व्यवहार में कहीं भी कृत्रिमता नहीं थी. कठोर कर्मठता, सरल व्यवहार, सबके लिए आत्मीयता, नरम स्वभाव, इनके साथ अत्यंत कर्मठता से जीवन जीने वाले सुरेशराव का जीवन अत्यंत विलोभनीय था. वे सबको हमेशा उत्साहित करते रहते. हमेशा कुछ सीखने की उनकी दुर्दांत इच्छाशक्ति होती थी.

उन्होंने समय के अनुरूप बदलने वाले संघरचना के नए विषय आत्मसात किए. अंतिम क्षण तक उनकी सीखते रहने की मानसिकता कायम थी, इसकी याद दिलवाते हुए भय्या जी जोशी ने कहा कि “ये सारे बदलाव उन्होंने अपने स्वीकृत जीवनलक्ष्य के लिए, उसके प्रति अपनी निष्ठा के लिए सीख लिए थे और वह भी नेतृत्व पर अपार विश्वास रखकर. ‘विकसित भावे, अर्पित होउन जावे’ इन गीतों की पंक्तियों की तरह वे जीए.” इसके साथ ही स्व. सुरेशजी का चलना, बोलना, गणवेश, संचलन, विचार शक्ति आदि उनके व्यक्तित्व के अंग सबको आकर्षित IMG_4204 (1)करने वाले थे. गंभीर स्वभाव, मन में अत्यंत भावुकता, आत्मीयता आदि उनके स्वभाव की अन्य विशेषताएं थी. सुरेशजी के काम में कई बारीकियां थीं, नियोजन था. उन्होंने कहा कि “मैंने उन्हें सर्वप्रथम सन् 1969 में प्रथम वर्ष में देखा था. तब से मन ही मन लगता था कि हमें सुरेशजी जैसा ही होना चाहिए. उनके पारस स्पर्श के कारण कईयों का जीवन सोना बन गया.”

सरकार्यवाह जी ने कहा कि रुग्णावस्था में भी वे हमेशा संघ का ही विचार करते थे, यह अनुभव सभी कार्यकर्ताओं ने कई बार लिया था. “हम हमेशा कहते हैं कि संस्कार सीधे मन में गहरे तक जाना चाहिए, उसकी अनुभूति सुरेशजी की ओर देखकर, उनका अनुभव लेकर आती है. ऐसे व्यक्तित्वों का सान्निध्य प्राप्त होना, उन्हें समझना यह हमारा भाग्य है. चर्चा सुनाई देती है, कि जिनके पांव पर सर रखें, ऐसे पांव मिलना आजकल दुर्लभ हो गया है, लेकिन भाग्य से संघ में आज भी ऐसे पांव है जो ध्येय समर्पित व्यक्तियों के है और जहां विनम्र हुआ जा सकता है.” उन्होंने आह्वान किया कि सुरेशराव केतकर जिस मार्ग पर चले, उसी मार्ग पर चलने के लिए हमें प्रयासरत रहना चाहिए. इससे पूर्व श्रद्धांजलि सभा में संजय कुलकर्णी ने उनकी स्मृतियां संजोने वाला एक वीडियो प्रस्तुत किया. कार्यक्रम का सूत्रसंचालन सुधीर गाडे ने किया तथा शांतिमंत्र के साथ सभा का समापन हुआ.

हाथ में लिया हुआ काम अंत तक ले जाए बिना आराम नहीं…..

IMG_4209हाथ में लिया हुआ काम अंत तक ले जाए बिना आराम करते हुए मैंने उन्हें नहीं देखा, यह कहते हुए भय्याजी जोशी ने स्व. सुरेशराव केतकर के विषय में एक अविस्मरणीय किस्सा सुनाया. जो बिल्कुल जीवंत प्रतीत हो, जो सबको प्रेरणा दे, ऐसी डॉ. हेडगेवार जी की एक प्रतिमा नागपुर कार्यालय में स्थापित करने का निर्णय हुआ. इसकी जिम्मेदारी सुरेशराव केतकर पर सौंपी गई. उन्होंने इस प्रतिमा के लिए अथक कष्ट उठाते हुए नौ बार प्रतिमा के विभिन्न नमूने पूरे देश में यात्रा कर इकठ्ठा किए और सबको दिखाए. उस अवसर पर कईयों ने उन्हें पूछा कि इतनी भागदौड़ क्यों करते हो? तब उन्होंने कहा कि प्रतिमा ऐसी बननी चाहिए, जो सबको पसंद आए. जब तक प्रतिमा सबको परिपूर्ण न लगे, मैं इसके लिए प्रयास करता रहूँगा. यही अनुभव डॉ. हेडगेवार जी की जन्मशती के समय उन पर बनाई गई फिल्म ‘केशव – संघ निर्माता’ के समय हुआ था.’

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