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हम अपनी भाषा से प्रेम करें, और उसे विकृत न होने दें – डॉ. नरेन्द्र कोहली जी

भोपाल (विसंकें). प्रख्यात साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली जी ने कहा कि मातृभाषा हिन्दी के प्रति हीनता का भाव होने के कारण हम प्राचीन ज्ञान विरासत से अलग हो गए, भारतीयता से विमुख हो गए. हमें अपनी भाषा को सम्मान देना चाहिए. उन्होंने विद्यार्थियों को संकल्प दिलाया कि जब तक कोई मजबूरी न हो, तब तक देवनागरी लिपि में ही हिन्दी लिखें और अपनी भाषा को विकृत न होने दें. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में हिन्दी दिवस प्रसंग पर विशेष व्याख्यान में डॉ. नरेन्द्र जी ने हिन्दी भाषा के प्रति भारतीयों के व्यवहार को लेकर चिंता जताई. कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला जी ने की.

उन्होंने कहा कि तुर्क, अरबी और अफगानी हमलावरों ने भारत में सबसे पहले संस्कृत पाठशालाएं बंद कीं और फिर तक्षशिला एवं नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों को जलाकर भोजन पकाया. पुस्तकों के नष्ट होने से हमारा ज्ञान राख में मिल गया. ये सोच-विचार कर हमारे ज्ञान और भाषा को समाप्त करने के लिए किया गया था. संस्कृत भाषा हमसे छीन ली गई, जिसके कारण संस्कृत में रचा गया ज्ञान-विज्ञान भी हमसे छिन गया. संस्कृत में रचा गया साहित्य और ज्ञान हमारे सामने नहीं है. हमें यह तो पढ़ाया जाता है कि शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट ने किया, लेकिन हमारे पाठ्यक्रम में आर्यभट्ट के गणित को नहीं पढ़ाया जाता, क्योंकि वह संस्कृत में है.

270 वर्ष में दो प्रतिशत सीख पाए अंग्रेजी

नरेन्द्र कोहली जी ने कहा कि अंग्रेजों के 200 वर्ष के शासनकाल और स्वतंत्रता के बाद 70 वर्षों में हमें अंग्रेजी पढ़ाई गई. इसके बावजूद भारत में दो प्रतिशत से अधिक लोग अंग्रेजी नहीं जानते. हमने यह मान लिया कि भारत में कुछ है ही नहीं या फिर जो कुछ है, वह निम्न कोटि का है. इस मानसिकता के कारण हम अपनी भाषा से ही नहीं, वरन भारतीयता से भी विमुख हो गए. जब कमाल पाशा ने सत्ता संभाली तो उसने सबसे पहले तुर्की भाषा को अनिवार्य किया. माओ त्से तुंग ने चीन में चीनी भाषा को लागू किया और इसी तरह इजरायल ने लगभग समाप्त हो चुकी अपनी भाषा हिब्रू को जीवित किया. उन्होंने कहा कि हम सभी प्रकार के पत्र हिन्दी में ही लिखें, इसके लिए सरकारी आदेश की प्रतीक्षा क्यों करें? आज दुनिया में हिन्दी भाषा-भाषियों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन यह लोग अपनी भाषा में लिखते-पढ़ते नहीं हैं. जब हम हिन्दी में लिखेंगे-पढ़ेंगे नहीं, तब वह समृद्ध कैसे होगी? हमें संकल्प करना चाहिए कि अपनी भाषा से प्रेम करेंगे, सम्मान करेंगे और उसे विकृत नहीं होने देंगे. उन्होंने हिन्दी के संदर्भ में विद्यार्थियों की जिज्ञासा का समाधान किया. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रायोगिक तौर पर प्रकाशित समाचार पत्र ‘पहल’ के हिन्दी दिवस विशेषांक का भी विमोचन किया गया.

श्रेष्ठ भाषा का चुनाव करें

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला जी ने कहा कि यदि हम हिन्दी का वैभव लाने का संकल्प लें, तब धीरे-धीरे पत्रकारिता भी बदल जाएगी. हमें शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करना चाहिए. उसे संवारना और समृद्ध करना चाहिए. नये शब्द गढ़ना चाहिए. जनसंचार माध्यमों को समाज का अनुकरण नहीं, बल्कि नेतृत्व करना चाहिए. भाषा और विचार के क्षेत्र में भी जनसंचार माध्यमों को समाज को दिशा देनी चाहिए. हम श्रेष्ठता को चुनते हैं. इसलिए बोलचाल के नाम पर हिन्दी को बिगाड़ें नहीं, बल्कि शुद्ध हिन्दी शब्दों का उपयोग करें. दुनिया में सबसे अधिक श्रेष्ठ भाषा संस्कृत है और उसके निकट है हिन्दी. प्रो. कुठियाला ने कहा कि जनमानस यदि तय कर ले कि हिन्दी को बढ़ाना है, तब राजनीति स्वत: उसका अनुकरण करेगी. देश हित में अंग्रेजी और अंग्रेजियत से छुटकारा पाना है, उसके लिए हिन्दी और हिन्दीपन को लाना होगा.

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