हिन्दुओं का कातिल और मंदिरों को ध्वस्त करने वाला तानाशाह था टीपू Reviewed by Momizat on . जयंतियां हम मनाते हैं महान हस्तियों को याद करने के लिए, लेकिन टीपू सुल्तान की जयंती मनाना सिर्फ मुस्लिम वोटरों को लुभाना ही कांग्रेस का एकमात्र मकसद है. सेकुलर जयंतियां हम मनाते हैं महान हस्तियों को याद करने के लिए, लेकिन टीपू सुल्तान की जयंती मनाना सिर्फ मुस्लिम वोटरों को लुभाना ही कांग्रेस का एकमात्र मकसद है. सेकुलर Rating: 0
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हिन्दुओं का कातिल और मंदिरों को ध्वस्त करने वाला तानाशाह था टीपू

जयंतियां हम मनाते हैं महान हस्तियों को याद करने के लिए, लेकिन टीपू सुल्तान की जयंती मनाना सिर्फ मुस्लिम वोटरों को लुभाना ही कांग्रेस का एकमात्र मकसद है. सेकुलर और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा लिखी पाठ्यपुस्तकों में यही पढ़ाया जाता है कि टीपू सेकुलर, साम्राज्यवाद विरोधी और जनकल्याणकारी शासक था. उनकी मुख्य दलील होती है टीपू ऐसा शासक था, जिसने उपनिवेशवादी अंग्रेजों से युद्ध किया. अंग्रेज भी उसका लोहा मानते थे. इसलिए वह अठारहवीं सदी का स्वतंत्रता सेनानी था. अपने शासनकाल में उसने जनता की भलाई के लिए कई काम किए. पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का हवाला देते हुए ये लोग कहते हैं कि वह पहला ‘मिसाइलमैन’ था. इसी आधार पर टीपू को महानायक घोषित कर कर्नाटक सरकार उसकी जयंती मना रही है.

जिस टीपू को देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी कहा जाता है. दरअसल वह असल में देशद्रोही था, जिसने कई विदेशियों को भारत पर हमला करने के लिए न्योता दिया. टीपू पर बहस 1990 में भी हुई थी, जब संजय खान ने उस पर टीवी धारावाहिक बनाया था. उसमें भगवान गिडवानी के उपन्यास ‘स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ के आधार पर टीपू को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी और सेकुलर शासक के तौर पर चित्रित किया गया था. यह ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत था.

उस समय एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई थी, जिसमें टीपू का कच्चा चिट्ठा खोला गया था और कहा गया था कि यह धारावाहिक टीपू के बारे में ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत नहीं करता. तब सर्वोच्च न्यायालय ने संजय खान को हर कड़ी के पहले यह सूचना देने को कहा था कि यह धारावाहिक इतिहास पर आधारित नहीं है, वरन् ‘स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’ उपन्यास का नाट्य रूपांतरण है. वामपंथी और कथित सेकुलर इतिहासकारों को छोड़ दें तो बाकी सारे इतिहासकार यही मानते हैं कि टीपू अत्याचारी और मतान्ध शासक था.

ईसाई नेता अल्बान मेनेजेस ने कहा है कि टीपू ने 1784 में मंगलौर के मिलेग्रेस चर्च को तहस-नहस कर दिया था. टीपू ने अंग्रेजों के लिए जासूसी के शक में 60 हजार कैथोलिकों को बंदी भी बना लिया था और उन्हें मैसूर तक पैदल चलने के लिए मजबूर किया था, जिस वजह से 4 हजार कैथोलिकों की मौत हो गई थी.

कर्नाटक के अलावा केरल और तमिलनाडु भी टीपू के अत्याचारों का शिकार बने. मैसूर सल्तनत पर टीपू का शासन सन् 1782 से 1799 तक रहा और इस दौरान अंग्रेजों द्वारा शासित तमिलनाडु पर उसने कई बार चढ़ाई की थी. उस दौरान टीपू दुश्मन सेना के पकड़े गए सभी सैनिकों का कन्वर्जन करवाकर अपनी सेना में शामिल करता था. इसके अलावा टीपू के समय बड़ी संख्या में आम तमिलों को भी मुसलमान बनाया गया .

टीपू ने केरल के मालाबार क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर कन्वर्जन करवाया था और इसकी पुष्टि खुद उसके लिखे पत्रों से होती है.

19 जनवरी, 1790 को बुरदुज जमाउन खान को एक पत्र में टीपू ने लिखा है, ‘क्या आपको पता है कि हाल ही में मैंने मालाबार पर एक बड़ी जीत दर्ज की है और चार लाख से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में कन्वर्जन करवाया है?’19वीं सदी में ब्रिटिश सरकार में अधिकारी रहे लेखक विलियम लोगान ने अपनी किताब ‘मालाबार मैनुअल’ में लिखा है कि कैसे टीपू ने अपने 30,000 सैनिकों के दल के साथ कालीकट में तबाही मचाई थी. टीपू हाथी पर सवार था और उसके पीछे उसकी विशाल सेना चल रही थी. पुरुषों और महिलाओं को सरेआम फांसी दी गई. उनके बच्चों को उन्हीं के गले में बांध पर लटकाया गया.

टीपू विरोधियों का कहना है कि टीपू ने कर्नाटक के कूर्ग और मैंगलोर इलाके में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्या की थी और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया था. इस दावे की पुष्टि इतिहास भी करता है. 1788 में टीपू की सेना ने कूर्ग पर आक्रमण किया था और इस दौरान पूरे के पूरे गांव जला दिए गए थे. टीपू के एक दरबारी और जीवनी लेखक मीर हुसैन किरमानी ने इन हमलों के बारे में विस्तार से लिखा है. ये सारे तथ्य मौजूद होने के बावजूद टीपू के समर्थक कहते हैं कि उस जमाने में यह सब सामान्य बात थी. राजा जब एक-दूसरे के राज्यों पर कब्जा करते थे तो लूटपाट और अत्याचार करते ही थे. लेकिन इतिहास में इस बात के भरपूर प्रमाण हैं कि टीपू ने जानबूझकर गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जुल्म किए. टीपू ने मैसूर की गद्दी पर बैठने के बाद मैसूर को मुसलमान राज्य घोषित कर दिया.                         मुसलमान सुल्तानों की परम्परा के अनुसार टीपू ने एक आम दरबार में घोषणा की, ‘मैं सभी काफिरों को मुसलमान बनाकर रहूंगा.’ तुंरत ही उसने सभी हिन्दुओं को फरमान भी जारी कर दिया. टीपू ने अपने राज्य में लगभग 5 लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया. हजारों की संख्या में कत्ल कराए. टीपू के शब्दों में, ‘यदि सारी दुनिया भी मुझे मिल जाए, तब भी मैं हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने से नहीं रुकूंगा.(फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल).

कई जगहों पर उस पत्र का भी जिक्र मिलता है, जिसे टीपू ने सईद अब्दुल दुलाई और अपने एक अधिकारी जमान खान के नाम लिखा है. पत्र के अनुसार टीपू लिखता है, ‘पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह के करम से कालीकट के सभी हिन्दुओं को मुसलमान बना दिया है. केवल कोचिन स्टेट के सीमावर्ती इलाकों के कुछ लोगों का कन्वर्जन अभी नहीं कराया जा सका है. मैं जल्द ही इसमें भी कामयाबी हासिल कर लूंगा.’1964 में प्रकाशित किताब ‘लाइफ ऑफ टीपू सुल्तान’ का जिक्र भी जरूरी है. इसमें लिखा गया है कि उसने तब मालाबार क्षेत्र में एक लाख से ज्यादा हिन्दुओं और 70,000 से ज्यादा ईसाइयों को मुसलमान मत अपनाने के लिए मजबूर किया. इस किताब के अनुसार कन्वर्जन टीपू का असल मकसद था.

इन तथ्यों को सेकुलर इतिहासकार भी नकारते नहीं हैं, लेकिन वे कहते हैं कि अंग्रेज इतिहासकारों ने अपनी फूट डालो, राज करो की नीति के तहत इस तरह की बातें लिखी हैं. लेकिन जब उनसे कहा जाता है कि ऐसा ही टीपू के दरबारी इतिहासकारों ने भी लिखा है तो वे कहते हैं वे तो टीपू के कारनामों को बढ़ाचढ़ाकर दिखाना ही चाहते थे. टीपू के सेकुलर होने के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि टीपू ने कई मंदिरों को दान और जमीनें भी दीं, लेकिन एक तरफ लगभग आठ हजार मंदिरों को तोड़ना दूसरी तरफ चंद मंदिरों को अपने निहित स्वार्थ के कारण संरक्षण देना टीपू को सेकुलर तो नहीं बना सकता! ‘दी मैसूर गजेटिअर’ में लिखा है,’टीपू ने लगभग 1000 मंदिरों को ध्वस्त किया.’

टीपू के जमाने में केवल अंग्रेज ही नहीं, कई विदेशी ताकतों जैसे फ्रांस, डच, पुतर्गाली आदि ने भी भारत के कई इलाकों पर कब्जा किया हुआ था और ये ताकतें आपस में भी लड़ती रहती थीं. इनमें टीपू फ्रांसीसियों के साथ था. उसने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए फ्रांसीसियों के सहयोग से अत्याधुनिक सुसंगठित सेना खड़ी की थी. शुरुआत मे फ्रेंच लोगों ने उसका साथ दिया, लेकिन युद्ध के दौरान उसके द्वारा किए गए नरसंहार, जबरन कन्वर्जन और क्रूरतापूर्ण यातनाओं आदि अपराधों को देखकर वे स्तब्ध रह गए. टीपू के साथ लड़ने के लिए जो फ्रेंच अफसर भेजे गए थे उन्होंने लड़ने से इंकार कर दिया और वापस लौट गए. ऐसे पक्के ऐतिहासिक सबूत मिले हैं जिनके अनुसार उसने फ्रेंच शासकों के साथ मिलकर अंग्रेजों को भगाने और फिर उनके साथ भारत के बंटवारे की बात की. ऐसा भी जिक्र मिलता है कि उसने तब अफगान शासक जमान शाह को भारत पर हमला करने का निमंत्रण दिया, ताकि यहां इस्लाम को और बढ़ावा मिल सके.

टीपू ने अपनी तलवार पर भी खुदवाया था, ‘मेरे मालिक मेरी सहायता कर कि मैं संसार से काफिरों (गैर-मुसलमानों) को समाप्त कर दूं.’ ऐसे कितने और ऐतिहासिक तथ्य टीपू को एक मतान्ध, निर्दयी, और हिन्दुओं का हत्यारा साबित करते हैं.

टीपू ने हिन्दुओं पर अत्याचारों, कन्वर्जन के लिए कुर्ग, मलाबार के विभिन्न क्षेत्रों में अपने सेनानायकों को अनेक पत्र लिखे थे. लेकिन इतिहास की पुस्तकों से इन्हें गायब कर दिया गया.

(1) टीपू ने अब्दुल कादर को 22 मार्च 1788 को लिखा पत्र -‘12000 से अधिक हिन्दुओं को इस्लाम में कन्वर्ट किया गया. इनमें अनेक नम्बूदिरी थे. इस उपलब्धि का हिन्दुओं के बीच व्यापक प्रचार किया जाए, ताकि स्थानीय हिन्दुओं में भय व्याप्त हो और उन्हें इस्लाम में कन्वर्ट किया जाए, किसी भी नम्बूदिरी को छोड़ा न जाए.’

(2) 14 दिसम्बर 1788 को कालीकट के अपने सेनानायक को पत्र लिखा -‘मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन अली के साथ अपने दो अनुयायी भेज रहा हूं. उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बंदी बना लेना और यदि वे इस्लाम स्वीकार न करें तो उनकी हत्या कर देना. मेरा आदेश है कि 20 वर्ष से कम उम्र वालों को काराग्रह में डाल देना और शेष में से 5000 को पेड़ से लटकाकर मार डालना.’ (भाषा पोशनी-मलयालम जर्नल, अगस्त 1923)

(3) बदरुज्जमां खान को 19 जनवरी 1790 लिखा पत्र -‘क्या तुम्हें नहीं मालूम कि मैंने मलाबार में एक बड़ी विजय प्राप्त की है? चार लाख से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बना लिया गया. मैंने अब रमन नायर की ओर बढ़ने का निश्चय किया है ताकि उसकी प्रजा को इस्लाम में कन्वर्ट किया जाए. मैंने रंगपटनम वापस जाने का विचार त्याग दिया है.’

देश के मार्क्सवादी इतिहासकारों ने सेकुलरिज्म का झूठा ढोंग कर टीपू का ‘वीर’ और ‘देशभक्त पुरुष’ के रूप में वर्णन किया है. किन्तु सचाई यह है कि टीपू का सम्बन्ध इस राष्ट्र, इस मिट्टी से कभी नहीं रहा, जो उसका गृहस्थान था. वह केवल हिन्दू भूमि का एक मुस्लिम शासक था. जैसा उसने स्वयं कहा था-उसके जीवन का उद्देश्य अपने राज्य को दारुल इस्लाम (इस्लामी देश) बनाना था. टीपू ब्रिटिशों से अपने ताज की सुरक्षा के लिए लड़ा था, न कि देश को विदेशी गुलामी से मुक्त कराने के लिए.

(लेख के अंश पाञ्चजन्य की आर्काइव से लिए गए हैं)

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