13 फरवरी / जन्मदिवस – मुगलों के प्रतिकारक महाराजा सूरजमल जाट Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़े गौरव नई दिल्ली. मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़े गौरव Rating: 0
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13 फरवरी / जन्मदिवस – मुगलों के प्रतिकारक महाराजा सूरजमल जाट

Surajmal-Jatनई दिल्ली. मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़े गौरव से लिया जाता है. उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 को हुआ था. ये राजा बदनसिंह ‘महेन्द्र’ के दत्तक पुत्र थे. उन्हें पिता की ओर से वैर की जागीर मिली थी. वे शरीर से अत्यधिक सुडौल, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ थे. उन्होंने वर्ष 1733 में खेमकरण सोगरिया की फतहगढ़ी पर हमला कर विजय प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने वर्ष 1743 में उसी स्थान पर भरतपुर नगर की नींव रखी तथा वर्ष 1753 में वहां आकर रहने लगे. महाराजा सूरजमल की जयपुर के महाराजा जयसिंह से अच्छी मित्रता थी. जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधो सिंह में गद्दी के लिये झगड़ा हुआ. सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह के, जबकि उदयपुर के महाराणा जगत सिंह छोटे पुत्र माधो सिंह के पक्ष में थे.

मार्च 1747 में हुये संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई. आगे चलकर मराठे, सिसौदिया, राठौड़ आदि सात प्रमुख राजा माधो सिंह के पक्ष में हो गये. ऐसे में महाराजा सूरजमल ने वर्ष 1748 में 10,000 सैनिकों सहित ईश्वरी सिंह का साथ दिया और उसे फिर विजय मिली. इससे महाराजा सूरजमल का डंका सारे भारत में बजने लगा. मई 1753 में महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला पर अधिकार कर लिया. दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने फिर मराठों को भड़का दिया. अतः मराठों ने कई माह तक भरतपुर में उनके कुम्हेर किले को घेरे रखा. यद्यपि वे पूरी तरह उस पर कब्जा नहीं कर पाये और इस युद्ध में मल्हारराव का बेटा खांडेराव होल्कर मारा गया. आगे चलकर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की सहायता से मराठों और महाराजा सूरजमल में संधि करा दी.

उन दिनों महाराजा सूरजमल और जाट शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी. कई बार तो मुगलों ने भी सूरजमल की सहायता ली. मराठा सेनाओं के अनेक अभियानों में उन्होंने ने बढ़-चढ़कर भाग लिया, पर किसी कारण से सूरजमल और सदाशिव भाऊ में मतभेद हो गये. इससे नाराज होकर वे वापस भरतपुर चले गये. 14 जनवरी, 1761 में हुये पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा शक्तियों का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ. इसमें एक लाख में से आधे मराठा सैनिक मारे गये. मराठा सेना के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस क्षेत्र की उन्हें विशेष जानकारी थी. यदि सदाशिव भाऊ के महाराजा सूरजमल से मतभेद न होते, तो इस युद्ध का परिणाम भारत और हिन्दुओं के लिये शुभ होता.

इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने अपनी मित्रता निभाई. उन्होंने शेष बचे घायल सैनिकों के अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबंध किया. महारानी किशोरी ने जनता से अपील कर अन्न आदि एकत्र किया. ठीक होने पर वापस जाते हुये हर सैनिक को रास्ते के लिये भी कुछ धन, अनाज तथा वस्त्र दिये. अनेक सैनिक अपने परिवार साथ लाये थे. उनकी मृत्यु के बाद सूरजमल ने उनकी विधवाओं को अपने राज्य में ही बसा लिया. उन दिनों उनके क्षेत्र में भरतपुर के अतिरिक्त आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुड़गांव और मथुरा सम्मिलित थे.

मराठों की पराजय के बाद भी महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक और झज्जर को जीता. वीर की सेज समरभूमि ही है. 25 दिसम्बर, 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हुये युद्ध में गाजियाबाद और दिल्ली के मध्य हिंडन नदी के तट पर महाराजा सूरजमल ने वीरगति पायी. उनके युद्धों एवं वीरता का वर्णन सूदन कवि ने ‘सुजान चरित्र’ नामक रचना में किया है.

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