16 अक्तूबर / इतिहास स्मृति – बंग भंग के विरोध में अद्भुत रक्षाबन्धन Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में बंग भंग विरोधी आन्दोलन का बहुत महत्व है. इसमें न केवल बंगाल, अपितु पूरे भारत के देशभक्त नागरिकों ने एकजुट हो नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में बंग भंग विरोधी आन्दोलन का बहुत महत्व है. इसमें न केवल बंगाल, अपितु पूरे भारत के देशभक्त नागरिकों ने एकजुट हो Rating: 0
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16 अक्तूबर / इतिहास स्मृति – बंग भंग के विरोध में अद्भुत रक्षाबन्धन

नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में बंग भंग विरोधी आन्दोलन का बहुत महत्व है. इसमें न केवल बंगाल, अपितु पूरे भारत के देशभक्त नागरिकों ने एकजुट होकर अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर कर दिया था. उन दिनों देश के मुसलमान भी हिन्दुओं के साथ मिलकर स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे. अंग्रेज शासक प्रारम्भ से ही ‘बांटो और राज करो’ (divide & rule) की नीति पर काम करते थे. उन्होंने सोचा कि यदि इनमें फूट डाल दें, तो भारत पर लम्बे समय तक राज्य करते रहना सरल हो जाएगा. इसलिए प्रयोग के लिए उन्होंने बंगाल के मुस्लिम बहुल क्षेत्र को असम के साथ मिलाकर एक नया प्रान्त बनाने का षड्यन्त्र रचा. देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला के ‘वायसराय भवन’ से लार्ड कर्जन ने यह आदेश जारी किया कि 16 अक्तूबर, 1905 को यह राज्य अस्तित्व में आ जाएगा.

यह आदेश सुनते ही पूरा बंगाल आक्रोश से जल उठा. इसके विरोध में न केवल राजनेता, अपितु बच्चे, बूढ़े, महिला, पुरुष सब सड़कों पर उतर आये. उन दिनों बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था. उन्होंने इस अप्राकृतिक विभाजन को किसी कीमत पर लागू न होने देने की चेतावनी दे दी. समाचार माध्यम भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने इस बारे में विशेष लेख छापे. राष्ट्रीय नेताओं ने लोगों से विदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं के बहिष्कार की अपील की. जनसभाओं में एक वर्ष तक सभी सार्वजनिक पर्वों पर होने वाले उत्सव स्थगित कर राष्ट्रीय शोक मनाने की अपील की जाने लगी.

इन अपीलों का व्यापक असर हुआ. पंडितों ने विदेशी वस्त्र पहनने वाले वर-वधुओं के विवाह कराने से हाथ पीछे खींच लिए. नाइयों ने विदेशी वस्तुओं के प्रेमियों के बाल काटने और धोबियों ने उनके कपड़े धोने से मना कर दिया. इससे विदेशी सामान की बिक्री बहुत घट गयी. उसे प्रयोग करने वालों को हीन दृष्टि से देखा जाने लगा. ‘मारवाड़ी चैम्बर ऑफ कॉमर्स’ ने ‘मेनचेस्टर चैम्बर ऑफ कॉमर्स’ को तार भेजा कि शासन पर दबाव डालकर इस निर्णय को वापस कराइये, अन्यथा यहां आपका माल बेचना असंभव हो जाएगा.

योजना के क्रियान्वयन का दिन 16 अक्तूबर, 1905 पूरे बंगाल में शोक पर्व के रूप में मनाया गया. रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा अन्य प्रबुद्ध लोगों ने आग्रह किया कि इस दिन सब नागरिक गंगा या निकट की किसी भी नदी में स्नान कर एक दूसरे के हाथ में राखी बांधें. इसके साथ वे संकल्प लें कि जब तक यह काला आदेश वापस नहीं लिया जाता, वे चैन से नहीं बैठेंगे. 16 अक्तूबर को बंगाल के सभी लोग सुबह जल्दी ही सड़कों पर आ गये. वे प्रभात फेरी निकालते और कीर्तन करते हुए नदी तटों पर गये. स्नान कर सबने एक दूसरे को पीले सूत की राखी बांधी और आन्दोलन का मन्त्र गीत वन्दे मातरम् गाया. स्त्रियों ने बंगलक्ष्मी व्रत रखा. छह साल तक आन्दोलन चलता रहा. हजारों लोग जेल गये, पर कदम पीछे नहीं हटाये. लाल, बाल, पाल की जोड़ी ने इस आग को पूरे देश में सुलगा दिया.

इससे लन्दन में बैठे अंग्रेज शासक घबरा गये. ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम ने दिल्ली में दरबार कर यह आदेश वापस ले लिया. इतना ही नहीं उन्होंने वायसराय लार्ड कर्जन को वापस बुलाकर उसके बदले लार्ड हार्डिंग को भारत भेज दिया. और राखी के धागों से उत्पन्न एकता ने इस आन्दोलन को सफल बनाया.

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