16 जून / बलिदान दिवस – नलिनीकान्त बागची का बलिदान Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है, पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था. बंग नई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है, पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था. बंग Rating: 0
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16 जून / बलिदान दिवस – नलिनीकान्त बागची का बलिदान

Nalini-Kant-Bagchiनई दिल्ली. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है, पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था. बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था. इन्हीं क्रान्तिकारियों में एक थे, नलिनीकान्त बागची, जो सदा अपनी जान हथेली पर लिये रहते थे. क्रान्तिकारियों से घबराकर अंग्रेजों ने राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली में स्थापित की थी.

एक बार बागची अपने साथियों के साथ गुवाहाटी के एक मकान में रह रहे थे. सब लोग सारी रात बारी-बारी जागते थे, क्योंकि पुलिस उनके पीछे पड़ी थी. एक बार रात में पुलिस ने मकान को घेर लिया. जो क्रान्तिकारी जाग रहा था, उसने सबको जगाकर सावधान कर दिया. सबने निश्चय किया कि पुलिस के मोर्चा संभालने से पहले ही उन पर हमला कर दिया जाये.

निश्चय करते ही सब गोलीवर्षा करते हुए पुलिस पर टूट पड़े. इससे पुलिस वाले हक्के बक्के रह गये. वे अपनी जान बचाने के लिए छिपने लगे. इसका लाभ उठाकर क्रान्तिकारी वहां से भाग गये और जंगल में जा पहुंचे. वहां भूखे प्यासे कई दिन तक वे छिपे रहे, पर पुलिस उनका पीछा करती रही. जैसे तैसे तीन दिन बाद उन्होंने भोजन का प्रबन्ध किया. वे भोजन करने बैठे ही थे कि पहले से बहुत अधिक संख्या में पुलिस बल ने उन्हें घेर लिया.

वे समझ गये कि भोजन आज भी उनके भाग्य में नहीं है. अतः सब भोजन को छोड़कर फिर भागे, पर पुलिस इस बार अधिक तैयारी से थी. अतः मुठभेड़ चालू हो गयी. तीन क्रान्तिकारी वहीं मारे गये. तीन बच कर भाग निकले. उनमें नलिनीकान्त बागची भी थे. भूख के मारे उनकी हालत खराब थी. फिर भी वे तीन दिन तक जंगल में ही भागते रहे. इस दौरान एक जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया. उसका जहर भी उनके शरीर में फैलने लगा. फिर भी वे किसी तरह हावड़ा पहुंच गये.

हावड़ा स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े. सौभाग्यवश नलिनीकान्त का एक पुराना मित्र उधर से निकल रहा था. वह उन्हें उठाकर अपने घर ले गया. उसने मट्ठे में हल्दी मिलाकर पूरे शरीर पर लेप किया और कई दिन तक भरपूर मात्रा में मट्ठा उसे पिलाया. इससे कुछ दिन में नलिनी ठीक हो गये. ठीक होने पर नलिनी मित्र से विदा लेकर कुछ समय अपना हुलिया बदलकर बिहार में छिपे रहे, पर चुप बैठना उनके स्वभाव में नहीं था. अतः वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के पास ढाका आ गये.

लेकिन पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी. 15 जून को पुलिस ने उस मकान को भी घेर लिया, जहां से वे अपनी गतिविधियां चला रहे थे. उस समय तीन क्रान्तिकारी वहां थे. दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गयी. पास के मकान से दो पुलिस वालों ने इधर घुसने का प्रयास किया, पर क्रान्तिवीरों की गोली से दोनों घायल हो गये. क्रान्तिकारियों के पास सामग्री बहुत कम थी, अतः तीनों दरवाजा खोलकर गोली चलाते हुए बाहर भागे. नलिनी की गोली से पुलिस अधिकारी का टोप उड़ गया, पर उनकी संख्या बहुत अधिक थी. अन्ततः नलिनी गोली से घायल होकर गिर पड़े. पुलिस वाले उन्हें बग्घी में डालकर अस्पताल ले गये, जहां अगले दिन 16 जून, 1918 को नलिनीकान्त बागची ने भारत मां को स्वतन्त्र कराने की अधूरी कामना मन में लिये ही शरीर त्याग दिया.

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