1971 के युद्ध में जीते हिस्से को राजनीतिक असफलता के कारण खो दिया – नरेंद्र कुमार जी Reviewed by Momizat on . देहरादून (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार जी ने कहा कि हमने स्वतन्त्रता का उत्सव भौगोलिक आधार पर मनाया था. 1947 देहरादून (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार जी ने कहा कि हमने स्वतन्त्रता का उत्सव भौगोलिक आधार पर मनाया था. 1947 Rating: 0
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1971 के युद्ध में जीते हिस्से को राजनीतिक असफलता के कारण खो दिया – नरेंद्र कुमार जी

देहरादून (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र कुमार जी ने कहा कि हमने स्वतन्त्रता का उत्सव भौगोलिक आधार पर मनाया था. 1947 में अंग्रेजों ने भारत से स्वतंत्रता के जिस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराये थे, वह वास्तव में विभाजन का दस्तावेज था. नरेंद्र जी विश्व संवाद केन्द्र द्वारा आयोजित ‘आजादी के सत्तर साल, क्या खोया, क्या पाया ?’ स्मारिका ‘संवाद’ के विमोचन अवसर पर संबोधित कर रहे थे.

नरेन्द्र जी ने कहा कि 1971 के युद्ध में हमने एक हिस्सा जीता, लेकिन उसे राजनीतिक कारणों से खो दिया. नीतियां बनाते समय हमने गहराई से उस पर विचार नहीं किया. पश्चिमी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर हमने अपनी नीतियां बनायी. इसीलिए आज देश की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है. बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. एक ओर ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं खड़ी हैं तो दूसरी ओर झोपड़ पट्टी है. किसानों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है. अन्न की दृष्टि से हम आत्मनिर्भर अवश्य हुए  हैं, लेकिन किसानों की दुर्दशा पर आज भी रोना आता है. शिक्षा के अंग्रेजीकरण के कारण जेएनयू और हैदराबाद जैसी घटनाएं अक्सर देखने को मिल रही है.

कार्यक्रम में मंजू कटारिया जी द्वारा प्रस्तुत गीत के पश्चात् मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ. मंचासीन सभी अतिथियों द्वारा विश्व संवाद केन्द्र की गतिविधियों पर आधारित स्मारिका ‘संवाद’ का लोकार्पण किया गया. विश्व संवाद केन्द्र ने ‘आजादी के सत्तर साल क्या खोया, क्या पाया ?’ विषय पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात पर्यावरणविद् ‘मैती आन्दोलन’ के प्रणेता कल्याण सिंह जी रावत ‘मैती’ ने कहा कि इन सत्तर वर्षों में हमने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन जिन संस्कारों के द्वारा भारत का स्वभाविक निर्माण होना था, वह नहीं हुआ. भारत की आत्मा गांव में बसी है, लेकिन आज हमारे गांव वीरान पड़े हैं. लोगों में भ्रम की स्थिति है. पहले जिस हिमालय से घी, दूध की नदियाँ बहती थीं, वहां आज अभाव की जिन्दगी जीने को लोग मजबूर हैं. हमारी सरकारों ने इन सत्तर वर्षों में शहरी क्षेत्रों पर ही ध्यान केन्द्रित किया, जिस कारण गांव पूरी तरह उपेक्षित हो गए. हमारी शिक्षा पद्धति में आजादी के बाद आज भी कोई बदलाव नजर नहीं आता. सुदूर ग्रामीण क्षत्रों के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए गांव से शहरों की ओर पलायान कर रहे हैं, जो एक खराब स्थिति है. जबकि स्वतंत्रता के पश्चात् हमारे गांव स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर होने चाहिए थे.

कार्यक्रम के अध्यक्ष डी.ए.वी. (पी.जी.) कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. अशोक सक्सेना जी ने सत्तर वर्षों के घटनाक्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस दौरान हमने बहुत कुछ पाया भी है और खोया भी है. अन्त में उपस्थित अतिथियों का विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष सुरेन्द्र मित्तल जी ने आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम का संचालन स्मारिका के सम्पादक राजेन्द्र पन्त जी ने किया.

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