02 सितम्बर / बलिदान दिवस – अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त का बलिदान Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय भले ही कुछ नेता स्वयं लेते हों, पर वस्तुतः इसका श्रेय उन क्रान्तिकारी युवकों को है, जो अपनी जान नई दिल्ली. अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय भले ही कुछ नेता स्वयं लेते हों, पर वस्तुतः इसका श्रेय उन क्रान्तिकारी युवकों को है, जो अपनी जान Rating: 0
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02 सितम्बर / बलिदान दिवस – अनाथ बन्धु एवं मृगेन्द्र दत्त का बलिदान

anath-Bandhuनई दिल्ली. अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की स्वतन्त्रता का श्रेय भले ही कुछ नेता स्वयं लेते हों, पर वस्तुतः इसका श्रेय उन क्रान्तिकारी युवकों को है, जो अपनी जान हथेली पर लेकर घूमते थे. बंगाल ऐसे युवाओं का गढ़ था. ऐसे ही दो मित्र थे अनाथ बन्धु तथा मृगेन्द्र कुमार दत्त, जिनके बलिदान से शासकों को अपना निर्णय बदलने को विवश होना पड़ा.

उन दिनों बंगाल के मिदनापुर जिले में क्रान्तिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं. इससे परेशान होकर अंग्रेजों ने वहां जेम्स पेड्डी को जिलाधिकारी बनाकर भेजा. वह बहुत क्रूर अधिकारी था. छोटी सी बात पर 10-12 साल की सजा दे देता था. क्रान्तिकारियों ने शासन को चेतावनी दी कि वे इसके बदले किसी भारतीय को यहां भेजें, पर शासन तो बहरा था सो बात नहीं सुनी गई. अतः एक दिन जेम्स पेड्डी को गोली से उड़ा दिया गया. अंग्रेज इससे बौखला गये. अब उन्होंने पेड्डी से भी अधिक कठोर राबर्ट डगलस को भेजा. एक दिन जब वह अपने कार्यालय में बैठा फाइलें देख रहा था, तो अचानक दो युवक उसके सामने आये और उसे गोली मार दी. डगलस वहीं ढेर हो गया. दोनों में से एक युवक तो भाग गया, पर दूसरा प्रद्योत कुमार पकड़ा गया. शासन ने उसे फांसी की सजा दी.

दो जिलाधिकारियों की हत्या के बाद भी अंग्रेजों की आंख नहीं खुली. अबकी बार उन्होंने बीईजे बर्ग को भेजा. बर्ग सदा दो अंगरक्षकों के साथ चलता था. इधर क्रान्तिवीरों ने भी ठान लिया था कि इस जिले में किसी अंग्रेज जिलाधिकारी को नहीं रहने देंगे. बर्ग फुटबाल का शौकीन था और टाउन क्लब की ओर से खेलता था. 02 सितम्बर, 1933 को टाउन क्लब और मौहम्मदन स्पोर्टिंग के बीच मुकाबला था. खेल शुरू होने से कुछ देर पहले बर्ग आया और अभ्यास में शामिल हो गया. अभी बर्ग ने शरीर गरम करने के लिए फुटबाल में दो-चार किक ही मारी थी कि उसके सामने दो खिलाड़ी, अनाथ बन्धु प॰जा और मृगेन्द्र कुमार दत्त आकर खड़े हो गये. दोनों ने जेब में से पिस्तौल निकालकर बर्ग पर खाली कर दी. वह हाय कहकर धरती पर गिर पड़ा और वहीं मर गया.

यह देखकर बर्ग के अंगरक्षक दोनों पर गोलियाँ बरसाने लगे. इनकी पिस्तौल तो खाली हो चुकी थी, अतः जान बचाने के लिए दोनों दौड़ने लगे, पर अंगरक्षकों के पास अच्छे शस्त्र थे. दोनों मित्र गोली खाकर गिर पड़े. अनाथ बन्धु ने तो वहीं प्राण त्याग दिये. मृगेन्द्र को पकड़ कर अस्पताल ले जाया गया. अत्यधिक खून बह जाने के कारण अगले दिन वह भी चल बसा. घटना के बाद पुलिस ने मैदान को घेर लिया. हर खिलाड़ी की तलाशी ली गयी. निर्मल जीवन घोष, ब्रजकिशोर चक्रवर्ती और रामकृष्ण राय के पास भी भरी हुई पिस्तौलें मिलीं. ये तीनों भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य थे. यदि किसी कारण से अनाथ बन्धु और मृगेन्द्र को सफलता न मिलती, तो इन्हें बर्ग का वध करना था. पुलिस ने इन तीनों को पकड़ लिया और मुकदमा चलाकर मिदनापुर के केन्द्रीय कारागार में फांसी पर चढ़ा दिया.

तीन जिलाधिकारियों की हत्या के बाद अंग्रेजों ने निर्णय किया कि अब कोई भारतीय अधिकारी ही मिदनापुर भेजा जाये. अंग्रेज अधिकारियों के मन में भी भय समा गया था. कोई वहां जाने को तैयार नहीं हो रहा था. इस प्रकार क्रान्तिकारी युवकों ने अपने बलिदान से अंग्रेज शासन को झुका दिया.

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