24 फरवरी / बलिदान दिवस – लोकदेवता कल्ला जी राठौड़ का बलिदान Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. राजस्थान में अनेक वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है, जिससे उनकी छवि लोकदेवता के रूप में बन गयी है. कल्ला जी राठौड़ ऐसे ही एक महाम नई दिल्ली. राजस्थान में अनेक वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है, जिससे उनकी छवि लोकदेवता के रूप में बन गयी है. कल्ला जी राठौड़ ऐसे ही एक महाम Rating: 0
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24 फरवरी / बलिदान दिवस – लोकदेवता कल्ला जी राठौड़ का बलिदान

imagesनई दिल्ली. राजस्थान में अनेक वीरों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है, जिससे उनकी छवि लोकदेवता के रूप में बन गयी है. कल्ला जी राठौड़ ऐसे ही एक महामानव थे. उनका जन्म मेड़ता राजपरिवार में आश्विन शुक्ल 8, विक्रम संवत 1601 को हुआ था. इनके पिता मेड़ता के राव जयमल के छोटे भाई आसासिंह थे. भक्तिमती मीराबाई इनकी बुआ थीं. कल्ला जी की रुचि बचपन से सामान्य शिक्षा के साथ ही योगाभ्यास, औषध विज्ञान तथा शस्त्र संचालन में भी थी. प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से उन्होंने योग की शिक्षा प्राप्त की.

इसी समय मुगल आक्रमणकारी अकबर ने मेड़ता पर हमला किया. राव जयमल के नेतृत्व में आसासिंह तथा कल्ला जी ने अकबर का डटकर मुकाबला किया, पर सफलता न मिलते देख राव जयमल अपने परिवार सहित घेरेबन्दी से निकल कर चित्तौड़ पहुंच गये. राणा उदयसिंह ने उनका स्वागत कर उन्हें बदनौर की जागीर प्रदान की. कल्ला जी को रणढालपुर की जागीर देकर गुजरात की सीमा से लगे क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया. कुछ समय बाद कल्ला जी का विवाह शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा से तय हुआ. द्वाराचार के समय जब उनकी सास आरती उतार रही थी, तभी राणा उदयसिंह का सन्देश मिला कि अकबर ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया है, अतः तुरन्त सेना सहित वहां पहुंचें. कल्ला जी ने विवाह की औपचारिकता पूरी की तथा पत्नी से शीघ्र लौटने की बात कहकर चित्तौड़ कूच कर दिया.

महाराणा ने जयमल को सेनापति नियुक्त किया था. अकबर की सेना ने चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया था. मेवाड़ी वीर किले से निकलकर हमला करते और शत्रुओं को हानि पहुंचाकर फिर किले में आ जाते. कई दिनों के संघर्ष के बाद जब क्षत्रिय वीरों की संख्या बहुत कम रह गयी, तो सेनापति जयमल ने निश्चय किया कि अब अन्तिम संघर्ष का समय आ गया है. उन्होंने सभी सैनिकों को केसरिया बाना पहनने का निर्देश दिया. इस सन्देश का अर्थ स्पष्ट था. 23 फरवरी, 1568 की रात में चित्तौड़ के किले में उपस्थित सभी क्षत्राणियों ने जौहर किया और अगले दिन 24 फरवरी को मेवाड़ी वीर किले के द्वार खोल कर भूखे सिंह की भांति मुगल सेना पर टूट पड़े. भीषण युद्ध होने लगा.

राठौड़ जयमल के पांव में गोली लगी. उनकी युद्ध करने की तीव्र इच्छा थी, पर उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था. कल्ला जी ने यह देखकर जयमल के दोनों हाथों में तलवार देकर उन्हें अपने कन्धे पर  बैठा लिया. इसके बाद कल्ला जी ने अपने दोनों हाथों में भी तलवारें ले लीं. चारों तलवारें बिजली की गति से चलने लगीं. मुगल लाशों से धरती पट गयी. अकबर ने यह देखा, तो उसे लगा कि दो सिर और चार हाथ वाला कोई देवता युद्ध कर रहा है. युद्ध में वे दोनों बुरी तरह घायल हो गये. कल्ला जी ने जयमल को नीचे उतारकर उनकी चिकित्सा करनी चाही, पर इसी समय एक शत्रु सैनिक ने पीछे से हमला कर उनका सिर काट दिया. सिर कटने के बाद के बाद भी उनका धड़ बहुत देर तक युद्ध करता रहा. इस युद्ध के बाद कल्ला जी का दो सिर और चार हाथ वाला रूप जन-जन में लोकप्रिय हो गया. आज भी लोकदेवता के रूप में चित्तौड़गढ़ में भैंरोपाल पर उनकी छतरी बनी है.

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