26 फरवरी / पुण्यतिथि – एक जन्म में अनेक जन्मों का कारावास पाने वाले अप्रतिम क्रांतिकारी Reviewed by Momizat on . एक जन्म में अनेक जन्मों का कारावास पाने वाले अप्रतिम क्रांतिकारी, समर्पित समाज सुधारक, ओजस्वी वक्ता, कवि व अखंड भारत के स्वप्न दृष्टा विनायक दामोदर सावरकर जी की एक जन्म में अनेक जन्मों का कारावास पाने वाले अप्रतिम क्रांतिकारी, समर्पित समाज सुधारक, ओजस्वी वक्ता, कवि व अखंड भारत के स्वप्न दृष्टा विनायक दामोदर सावरकर जी की Rating: 0
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26 फरवरी / पुण्यतिथि – एक जन्म में अनेक जन्मों का कारावास पाने वाले अप्रतिम क्रांतिकारी

savarkar...एक जन्म में अनेक जन्मों का कारावास पाने वाले अप्रतिम क्रांतिकारी, समर्पित समाज सुधारक, ओजस्वी वक्ता, कवि व अखंड भारत के स्वप्न दृष्टा विनायक दामोदर सावरकर जी की पुण्यतिथि पर देश शत्-शत् नमन करता है.

सावरकर वे पहले कवि थे, जिन्होंने कलम-काग़ज़ के बिना जेल की दीवारों पर पत्थर के टुकड़ों से कवितायें लिखीं. कहा जाता है – उन्होंने अपनी रची दस हज़ार से भी अधिक पंक्तियों को प्राचीन वैदिक साधना के अनुरूप वर्षों स्मृति में सुरक्षित रखा, जब तक वह किसी न किसी तरह देशवासियों तक न पहुंच गई.

महान देशभक्त और क्रांतिकारी सावरकर ने अपना संपूर्ण जीवन देश के लिये समर्पित कर दिया. अपने राष्ट्रवादी विचारों से जहां सावरकर देश को स्वतंत्र कराने के लिये निरन्तर संघर्ष करते रहे. वहीं दूसरी ओर देश की स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन संघर्षों से घिरा रहा. सावरकर दुनिया के पहले राजनीतिक कैदी थे, जिनका मामला हेग के अंतराष्ट्रीय न्यायालय में चला था.

सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने क्रान्ति कार्यों के लिए दो-दो आजन्म कारावास की सजा दी, जो विश्व के इतिहास की पहली एवं अनोखी सजा थी.

सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में उसके विरूद्ध क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया था. उन्होंने सन् 1905 के बंग-भंग के बाद सन् 1906 में ‘स्वदेशी’ का नारा दे विदेशी कपड़ों की होली जलाई थी. वे भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें अपने विचारों के कारण बैरिस्टर की डिग्री खोनी पड़ी. वे पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले पहले भारतीय थे.

वे भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने सन् 1857 की लड़ाई को भारत का ‘स्वाधीनता संग्राम’ बताते हुए लगभग एक हज़ार पृष्ठों का इतिहास 1907 में लिखा. सावरकर भारत के पहले और दुनिया के एकमात्र लेखक थे, जिनकी किताब को प्रकाशित होने के पहले ही ब्रिटिश और ब्रिटिश साम्राज्य की सरकारों ने प्रतिबंधित कर दिया था. सावरकर ने ही वह पहला भारतीय झंडा बनाया था, जिसे जर्मनी में 1907 की अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम कामा ने फहराया था.

वीर सावरकर ने जेल में बंद सभी बंदियों को हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी. वे उन्हें पुस्तकालय की हिन्दी पुस्तकें और उनके सरल अनुवाद भी देने लगे. इस प्रकार बन्दियों के साथ-साथ जेल कर्मचारी, स्थानीय व्यापारी तथा उनके परिजन हिन्दी सीख गये. अतः सब ओर हिन्दी का व्यापक प्रचलन हो गया.

सावरकर जी के छूटने के बाद भी यह क्रम चलता रहा. यही कारण है कि आज भी केन्द्र शासित अन्दमान-निकोबार द्वीपसमूह में हिन्दी बोलने वाले सर्वाधिक हैं और वहां की अधिकृत राजभाषा भी हिन्दी ही है. जेल में वे कोल्हू पेरना, नारियल की रस्सी बँटना जैसे सभी कठोर कार्य करते थे. इसके बाद भी उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी जाती थीं.

हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्थान के प्रबल समर्थक वीर विनायक दामोदर सावरकर का देहावसान 26 फरवरी, 1966 को हुआ था.

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