26 सितम्बर / जन्मदिवस – कर्मयोगी पंडित सुन्दरलाल जी Reviewed by Momizat on . नई दिल्ली. भारत के स्वाधीनता आंदोलन के अनेक पक्ष थे. हिंसा और अहिंसा के साथ कुछ लोग देश तथा विदेश में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी जनजागरण कर रहे थे. अंग्रेज नई दिल्ली. भारत के स्वाधीनता आंदोलन के अनेक पक्ष थे. हिंसा और अहिंसा के साथ कुछ लोग देश तथा विदेश में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी जनजागरण कर रहे थे. अंग्रेज Rating: 0
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26 सितम्बर / जन्मदिवस – कर्मयोगी पंडित सुन्दरलाल जी

नई दिल्ली. भारत के स्वाधीनता आंदोलन के अनेक पक्ष थे. हिंसा और अहिंसा के साथ कुछ लोग देश तथा विदेश में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी जनजागरण कर रहे थे. अंग्रेज इन सबको अपने लिए खतरनाक मानते थे. 26 सितम्बर, 1886 को खतौली (जिला मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) में सुंदरलाल नामक एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया. खतौली में गंगा नहर के किनारे बिजली और सिंचाई विभाग के कर्मचारी रहते हैं. इनके पिता तोताराम श्रीवास्तव जी उन दिनों वहां उच्च सरकारी पद पर थे. उनके परिवार में प्रायः सभी लोग अच्छी सरकारी नौकरियों में थे.

मुजफ्फरनगर से हाईस्कूल करने के बाद सुंदरलाल जी प्रयाग के प्रसिद्ध म्योर कॉलेज में पढ़ने गये. वहां क्रांतिकारियों से सम्पर्क रखने के कारण पुलिस उन पर निगाह रखने लगी. गुप्तचर विभाग ने उन्हें भारत की एक शिक्षित जाति में जन्मा असाधारण क्षमता का युवक कहा, जो समय पड़ने पर तात्या टोपे और नाना फड़नवीस की तरह खतरनाक हो सकता है. 1907 में वाराणसी के शिवाजी महोत्सव में 22 वर्षीय सुन्दर लाल ने ओजस्वी भाषण दिया. यह समाचार पाकर कॉलेज वालों ने उसे छात्रावास से निकाल दिया. इसके बाद भी उन्होंने प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की. अब तक उनका संबंध लाला लाजपतराय, श्री अरविन्द घोष तथा रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों से हो चुका था. दिल्ली के चांदनी चौक में लार्ड हार्डिंग की शोभायात्रा पर बम फेंकने की योजना में सुंदरलाल जी भी सहभागी थे.

उत्तर प्रदेश में क्रांति के प्रचार हेतु लाला लाजपतराय के साथ सुंदरलाल जी ने भी प्रवास किया. कुछ समय तक उन्होंने सिंगापुर आदि देशों में क्रांतिकारी आंदोलन का प्रचार किया. इसके बाद उनका रुझान पत्रकारिता की ओर हुआ. उन्होंने पंडित सुंदरलाल के नाम से ‘कर्मयोगी’ पत्र निकाला. इसके बाद उन्होंने अभ्युदय, स्वराज्य, भविष्य और हिन्दी प्रदीप का भी सम्पादन किया. ब्रिटिश अधिकारी कहते थे कि पंडित सुन्दर लाल की कलम से शब्द नहीं बम-गोले निकलते हैं. शासन ने जब प्रेस एक्ट की घोषणा की, तो कुछ समय के लिए ये पत्र बंद करने पड़े. इसके बाद वे भगवा वस्त्र पहनकर स्वामी सोमेश्वरानंद के नाम से देश भर में घूमने लगे. इस समय भी क्रांतिकारियों से उनका सम्पर्क निरन्तर बना रहा और वे उनकी योजनाओं में सहायता करते रहे. 1921 से लेकर 1947 तक उन्होंने उन्होंने आठ बार जेल यात्रा की.

इतनी व्यस्तता और लुकाछिपी के बीच उन्होंने अपनी पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ प्रकाशित कराई. यद्यपि प्रकाशन के दो दिन बाद ही शासन ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया, पर तब तक इसकी प्रतियां पूरे भारत में फैल चुकी थी. इसका जर्मन, चीनी तथा भारत की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ. 1947 में स्वतंत्रता प्रप्ति के बाद गांधी जी के आग्रह पर विस्थापितों की समस्या के समाधान के लिए वे पाकिस्तान गये. 1962-63 में ‘इंडियन पीस काउंसिल’ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई देशों की यात्रा की. 95 वर्ष की आयु में 8 मई, 1981 को दिल्ली में हृदयगति रुकने से उनका देहांत हुआ. जब कोई उनके दीर्घ जीवन की कामना करता था, तो वे हंसकर कहते थे –

होशो हवास ताबे तबां, सब तो जा चुके

अब हम भी जाने वाले हैं, सामान तो गया.

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