31 दिसम्बर/जन्म-तिथि; श्रमिक हित को समर्पित रमण भाई शाह Reviewed by Momizat on . श्रमिकों के हित के लिये प्रदर्शन और आन्दोलन तो कई लोग करते हैं; पर ऐसे व्यक्तित्व कम ही हैं, जिन्होंने इस हेतु अच्छे वेतन और सुख-सुविधाओं वाली नौकरी ही छोड़ दी. श्रमिकों के हित के लिये प्रदर्शन और आन्दोलन तो कई लोग करते हैं; पर ऐसे व्यक्तित्व कम ही हैं, जिन्होंने इस हेतु अच्छे वेतन और सुख-सुविधाओं वाली नौकरी ही छोड़ दी. Rating: 0
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31 दिसम्बर/जन्म-तिथि; श्रमिक हित को समर्पित रमण भाई शाह

bhai shahश्रमिकों के हित के लिये प्रदर्शन और आन्दोलन तो कई लोग करते हैं; पर ऐसे व्यक्तित्व कम ही हैं, जिन्होंने इस हेतु अच्छे वेतन और सुख-सुविधाओं वाली नौकरी ही छोड़ दी. रमण भाई शाह ऐसी ही एक महान विभूति थे. रमण भाई का जन्म पुणे के पास ग्राम तलेगाँव दाभाड़े में श्री गिरधर शाह के घर में 31 दिसम्बर, 1926 को हुआ था. पुणे में पढ़ते समय ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आये और तृतीय वर्ष तक का शिक्षण लिया.

बी.एस-सी. कर वे दो वर्ष तक संघ के प्रचारक रहे. फिर उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और मुम्बई के एक प्रसिद्ध रबड़ उद्योग में नौकरी कर ली. यहाँ उन्होंने एक राष्ट्रवादी मजदूर यूनियन की स्थापना की. मजूदरों को अपने परिवार का सदस्य मानने के कारण यह यूनियन शीघ्र ही लोकप्रिय हो गयी.

1953 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना से भोपाल (मध्य प्रदेश) में भारतीय मजदूर संघ की स्थापना हुई. श्री दत्तोपन्त ठेंगड़ी को इस काम में लगाया गया. ठेंगड़ी जी ने उनकी रुचि और योग्यता देखकर उन्हें अपने साथ जोड़ लिया. इस प्रकार प्रारम्भ से ही उन्हें श्री ठेंगड़ी का सान्निध्य मिला.

जब मजदूर संघ का काम बढ़ने लगा, तो इसके लिये पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता हुई. ऐसे में रमण भाई ने सहर्ष अपनी नौकरी छोड़ दी और भारतीय मजदूर संघ के लिये समर्पित हो गये. इसके बाद उन्हें जब जैसा दायित्व दिया गया, उसके अनुसार वे पूरे मनोयोग से काम में लगे रहे. इस प्रकार वे दत्तोपन्त जी के दाहिने हाथ बन गये.

मजदूर संघ के काम के लिये रमण भाई को पूरे देश में प्रवास करना होता था. उनके कोई सन्तान भी नहीं थी. अतः उन्होंने अपने साले विपिन को अपने घर रखा, जिससे उनकी पत्नी पन्ना बेन को कष्ट न हो. 1960 में घरेलू सम्पत्ति के बँटवारे से रमण भाई को एक बड़ी राशि मिली; पर उन्होंने वह सब मजदूर संघ को दे दी. उन्होंने रेल में कभी प्रथम श्रेणी में यात्रा नहीं की. उनका मत था कि साधारण श्रेणी में ही यात्रा करने से ही देश के आम आदमी के जीवन को निकट से देखा और समझा जा सकता है.

रमण भाई यों तो मजदूर हित के लिये सदा संघर्षरत रहते थे; पर उन्हें प्रसिद्धि तब मिली, जब 20 अगस्त, 1963 को उन्होंने मुम्बई बन्द का नेतृत्व किया. 1972 में वे मजदूर संघ के तृतीय अखिल भारतीय अधिवेशन में हजारों कामगार महिलाओं को लेकर पहुँचे थे. मुम्बई में असंगठित रूप से घरेलू काम करने वाली महिलायें पहली बार इतनी बड़ी संख्या में एकत्र हुईं थीं. रमण भाई के इस प्रयास की सराहना अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुई.

रमण भाई ने मजदूर संघ में छोटे से लेकर बड़े तक अनेक दायित्व निभाये. वे अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष और फिर 1993 से 2002 तक अखिल भारतीय अध्यक्ष भी रहे. उनके अध्यक्ष काल में ही भारतीय मजदूर संघ भारत का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन घोषित हुआ.

दत्तोपन्त ठेंगड़ी के देहावसान के बाद रमण भाई ही मजदूर संघ के मार्गदर्शक रहे. उनकी सादगी, सरलता और मधुर स्वभाव के कारण विरोधी विचारों वाले मजदूर संगठनों के नेता भी उनसे विभिन्न विषयों पर परामर्श करने आते थे. श्रमिक क्षेत्र में उनकी भूमिका अजातशत्रु जैसी थी.

रमण भाई ने श्रमिकों के हित के लिये सैकड़ों प्रतिनिधि मंडलों में सहभागिता कर उचित निर्णय कराये. यह उनके लिये व्यक्तिगत हित से बढ़कर था. स्वास्थ्य ढीला होने पर उन्होंने भारतीय मजदूर संघ में अध्यक्ष का दायित्व छोड़ दिया और कार्यकारिणी के सदस्य के नाते काम करते रहे. एक अगस्त, 2007 को पुणे में ही उन्होंने अन्तिम साँस ली.

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