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संघ पर गांधी हत्या का आरोप , इतिहास का सबसे बड़ा झूठ

गांधी की हत्या से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान नाथूराम गोडसे ने अदालत में बयान दिया था -'हिन्दुओं के उत्थान के लिए काम करने के दौरान मुझे लगा कि हिन्दुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए देश की राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना जरूरी है. इसीलिए मैं संघ छोड़ हिन्दू महासभा में शामिल हो गया'. यहां गांधी के हत्यारे ने स्वयं ही खुद को आरएसएस से अलग कर हिन्दू महासभा से जोड़ा है. गांधी जी की हत्या उसने अकेले नहीं ...

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गुरु पूर्णिमा और संघ

अपने राष्ट्र और समाज जीवन में गुरुपूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है. व्यास महर्षि आदिगुरु हैं. उन्होंने मानव जीवन को गुणों पर निर्धारित करते हुए उन महान आदर्शों को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने रखा. विचार तथा आचार का समन्वय करते हुए, भारतवर्ष के साथ उन्होंने सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया. इसलिए भगवान वेदव्यास जगत् गुरु हैं. इसीलिए कहा है - 'व्यासो नारायणम् स्वयं'- इस दृष्टि से गुर ...

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गुरु पूर्णिमा – गुरु के प्रति आभार का दिन

19 जुलाई, 2016 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: । गुरु साक्षात् परम्ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम: ।। भारतीय संस्कृति में अनादिकाल से ही गुरु को विशेष दर्जा प्राप्त है. यहां गुरु-शिष्य परंपरा सदियों पुरानी है. हमारे यहां गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान प्राप्त है. गुरु को ईश्वर का साक्षात्कार करवाने वाला माना गया है. गुरु की महानता का परिचय संत कबीर के इस दोहे से हो जाता है गुरु गोविंद दोऊ खड़े, ...

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घन घमंड नभ गरजता घोरा

बरसात के सुख, दु:ख और संताप के अनेक पहलू हैं. छह ऋतुओं वाले हिन्दुस्तान में दूसरी ऋतुएं किसी एक तरह प्रभावित करती हो, लेकिन बरसात कई तरह से प्रभावित करती है. यही वजह है कि साहित्य में चाहे जो रहा हो, लोकगीतों में जितना महत्व बरसात को मिला है, किसी और ऋतु को नहीं मिला. उन कवियों के यहां भी जो लोक जीवन के करीब हैं. प्रकृति ने हमारे सांस्कृतिक जीवन में अति के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी. आषाढ़ बीतते-बीतते बरसात ...

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हम तो समाज को ही भगवान मानते हैं – श्रीगुरूजी

अनेकों बार कई कार्यकर्ताओं ने श्रीगुरुजी से वर्ण तथा जातिव्यवस्था के बारे में प्रश्न पूछे हैं. इन प्रश्नों के उत्तर में श्रीगुरुजी का वर्ण तथा जातिव्यवस्था के बारे में दृष्टिकोण बिल्कुल साफ हो जाता है. कुछ प्रश्न और श्रीगुरुजी द्वारा दिए गए उनके उत्तर इस प्रकार हैं - प्रश्न - यह हिंदू राष्ट्र है. इस सिद्धांत पर जो आपत्ति करते हैं, वे समझते हैं कि पुराने जमाने में जाति और वर्ण - व्यवस्था थी उसी को लाकर, उसके ...

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समाज हित पत्रकारिता का परम धर्म

नारद जयंति – 23 मई पुराणों में वर्णित विभिन्न ऐतिहासिक कथाओं में श्रेष्ठ मुनि नारद की भूमिका नवीनतम सूचनाओं के कुशल संवाहक व प्रभावी उपदेष्टा के रूप में सहज ही उभरती है. वर्तमान में जब सम्पूर्ण मानव जाति एक ओर सूचना क्रान्ति का आनन्द लेती प्रतीत होती है तो दूसरी ओर यह भी कटु सत्य है कि मीडिया आधारित सामाजिक संवाद दुख, निराशा और विवादों का जनक व संवाहक भी स्पष्ट तौर से दिखता है. पत्रकारों व मीडिया कर्मियों क ...

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सामाजिक समरसता व्यवहार की बात

हम सब जानते हैं सामाजिक व्यवस्था में ‘समता’ यह एक श्रेष्ठ तत्व है. भारत के संविधान में इसे प्राथमिकता दी गयी है. समानतायुक्त समाज रचना, विषमता निर्मूलन इन विषयों पर काफी लिखा जाता है, चर्चा होती है और इसी का आधार लेकर समाज में भेद भी निर्माण किये जाते हैं. समता तत्व को लेकर स्वामी विवेकानन्द जी के चिंतन में भगवान बुद्ध के उपदेश का आधार मिलता है. वे कहते हैं ‘‘आजकल जनतंत्र और सभी मनुष्यों में समानता इन विषयो ...

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कर्म करने की प्रेरणा देती है भगवद्गीता

(21 दिसंबर, गीता जयन्ती पर विशेष) “जब शंकाएं मुझ पर हावी होती हैं, और निराशाएं मुझे घूरती हैं, जब दिगंत में कोई आशा की किरण मुझे नजर नहीं आती, तब मैं गीता की ओर देखता हूं.” - महात्मा गांधी. संसार का सबसे पुराना दर्शन ग्रन्थ है भगवद्गीता. साथ ही साथ विवेक, ज्ञान एवं प्रबोधन के क्षेत्र में गीता का स्थान सबसे आगे है. यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, अपितु एक महानतम प्रयोग शास्त्र भी है. केवल पूजा घर में रखकर ...

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स्त्रियों का जीवन प्रकाशित करना, यही सच्ची दीपावली

जैसे ही आकाश में नीले काले मेघ गरजने लगते हैं, सम्पूर्ण सृष्टि रोमांचित हो उठती  है. धरती गाने लगती है. और फिर निर्मिती का वह आनंद चारों दिशाओं में फैलने लगता है. शस्य श्यामला धरती हरयाली साड़ी पहनकर वनस्पति, पशु-पक्षी सहित मानव जीवन को पुलकित, उल्लासित कर देती है. सृष्टि का यह आनंद उत्सव हर सजीव को समृद्ध बना देता है. सृजन के इस गान में निसर्गप्रिय भारतीय समाज अपना स्वर मिला लेता है. धरती मैया की प्रत्येक ...

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समस्याओं का हल साधनों में नहीं साधना में निहित है

विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है. यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की, भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है. भारतीय संस्कृति में त्यौहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है. प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है. लोग त्यौहार तो हर्षोल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं, किंतु उसमें निहित संदेश के प् ...

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